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यूएई के बाद क्या इराक भी छोड़ेगा ओपेक? कच्चे तेल के बाजार में भारी उथल-पुथल

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बगदाद । गुरुवार, 25 जून 2026 

वैश्विक तेल बाजार और कच्चे तेल को नियंत्रित करने वाली सबसे बड़ी संस्था ओपेक (OPEC) में एक बार फिर इतिहास की सबसे बड़ी टूट की आहट सुनाई दे रही है। 1 मई 2026 को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) द्वारा खुद को ओपेक से अलग करने के बाद, अब संगठन का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश इराक भी इस रास्ते पर चलने की योजना बना रहा है।

अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने इराकी सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट दी है कि यदि ओपेक इराक के तेल उत्पादन कोटे (Oil Production Quota) को नहीं बढ़ाता है, तो बगदाद इस 66 वर्ष पुराने संगठन से बाहर निकलने पर गंभीर विचार कर सकता है। हालांकि, बाजार में हड़कंप मचने के बाद इराक के तेल मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल आधिकारिक तौर पर बाहर निकलने का कोई प्रस्ताव नहीं है, लेकिन वे कोटा समीक्षा के लिए दबाव बनाना जारी रखेंगे।

ओपेक (OPEC) से आखिर क्या चाहता है इराक?

इराक सरकार के आधिकारिक सूत्रों और तेल मंत्रालय के प्रवक्ताओं के अनुसार, देश के सामने इस समय एक बड़ा आर्थिक संकट है। इराक की मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:

  1. 7 मिलियन बैरल प्रतिदिन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य: इराक आने वाले समय में अपने तेल उत्पादन को बढ़ाकर 7 मिलियन (70 लाख) बैरल प्रतिदिन करना चाहता है। इराक अपनी पूरी तेल निर्यात क्षमता को बहाल करने के लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में निवेश कर रहा है।

  2. मौजूदा कोटे में भारी विसंगति: वर्तमान में ओपेक के नियमों के तहत इराक को केवल 4.3 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल बेचने की अनुमति है। इराक का तर्क है कि दशकों के युद्ध, प्रतिबंधों और हालिया क्षेत्रीय संघर्षों (जैसे ईरान युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट) के कारण उसकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।

  3. आर्थिक भरपाई की मांग: ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से इराक का निर्यात घटकर महज 1 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया था। अब युद्ध समाप्त होने के बाद, इराक ज्यादा से ज्यादा तेल बेचकर राजस्व कमाना चाहता है ताकि देश का पुनर्निर्माण किया जा सके।

इराक के बाहर निकलने से दुनिया पर क्या असर होगा?

यदि इराक ओपेक से बाहर निकलता है, तो इसके वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक परिणाम बेहद गंभीर होंगे:

1. ओपेक के वजूद को सबसे बड़ा झटका

इराक ओपेक का केवल एक सदस्य नहीं है, बल्कि वह उन 5 संस्थापक देशों में से एक है जिन्होंने 1960 में इराक की राजधानी बगदाद में ही इस संस्था की नींव रखी थी। सऊदी अरब के बाद इराक ओपेक का दूसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यूएई के बाद यदि इराक भी अलग होता है, तो ओपेक का तेल बाजार पर एकाधिकार और नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो सकता है।

2. कच्चे तेल की कीमतों में भारी गिरावट (Oil Price Crash)

जैसे ही इराक ओपेक के कोटे के बंधनों से मुक्त होगा, वह बाजार में स्वतंत्र रूप से तेल की आपूर्ति बढ़ा देगा। बाजार में तेल की अधिकता (Oversupply) होते ही कच्चे तेल की कीमतें धड़ाम से गिर सकती हैं। रिपोर्ट आते ही वैश्विक बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें गिरकर $73 प्रति बैरल और WTI क्रूड $70 से नीचे आ गया है।

3. अन्य देशों का भी हो सकता है मोहभंग

स्वतंत्र तरीके से तेल बेचना और अपनी मर्जी से कीमतें तय करना कई देशों के हित में है। इराक और यूएई की राह पर चलते हुए ओपेक और ओपेक प्लस (OPEC+) के कई अन्य छोटे देश भी इस गठबंधन से खुद को अलग कर सकते हैं।

क्या सऊदी अरब बचा पाएगा ओपेक को?

विशेषज्ञों का मानना है कि इराक की यह धमकी ओपेक और उसके कर्ता-धर्ता सऊदी अरब के खिलाफ एक ‘रणनीतिक चाल’ (Bargaining Chip) भी हो सकती है, ताकि जुलाई की आगामी बैठकों में उसे रियायत मिल सके। ओपेक ने पहले ही एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय कंसल्टिंग फर्म के माध्यम से देशों की अधिकतम उत्पादन क्षमता का आकलन शुरू कर दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सऊदी अरब इराक को रोकने के लिए उसके कोटे में रियायत देता है या तेल बाजार का यह सबसे पुराना कार्टेल बिखर जाता है।

महत्वपूर्ण बाहरी कड़ियाँ (Relevant Links from Matribhumi Samachar)

इस विषय पर और अधिक गहराई से समझने और वैश्विक व्यापार के बदलते नियमों की नवीनतम जानकारी के लिए, आप Matribhumi Samachar के इन अंग्रेजी लेखों को पढ़ सकते हैं:

  • वैश्विक आर्थिक बदलावों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर नवीनतम विश्लेषण के लिए:

    Matribhumi Samachar – Business & Economy

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