आज जब ‘सच्चाई’ और ‘सुविधा’ के बीच पत्रकारिता की परिभाषा धुंधली होती जा रही है, तब पत्रकारिता जगत के उस दैदीप्यमान नक्षत्र को याद करना अनिवार्य हो जाता है जिसने अपनी कलम को ही क्रांति का हथियार बना लिया था। हम बात कर रहे हैं ‘प्रताप’ के संपादक और अमर बलिदानी गणेश शंकर विद्यार्थी की।
1. निर्भीकता: जब कलम सत्ता से नहीं डरी
विद्यार्थी जी का मानना था कि पत्रकार का धर्म केवल सूचना देना नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना है। उन्होंने कानपुर से निकलने वाले अपने अखबार ‘प्रताप’ के माध्यम से किसानों, मजदूरों और दलितों के हक की लड़ाई लड़ी।
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आदर्श: उन्होंने कभी विज्ञापन या सत्ता के दबाव में अपनी हेडलाइन नहीं बदली।
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आज की प्रासंगिकता: आज के दौर में जहाँ ‘फेक न्यूज’ और ‘पेड न्यूज’ का बोलबाला है, विद्यार्थी जी का जीवन सिखाता है कि पत्रकारिता का असली मूल्य उसकी निष्पक्षता में है।
2. सामाजिक समरसता और सर्वोच्च बलिदान
विद्यार्थी जी केवल शब्दों के जादूगर नहीं थे, वे कर्मवीर थे। 1931 के कानपुर दंगों के दौरान जब शहर सांप्रदायिकता की आग में जल रहा था, तब वे निहत्थे लोगों की जान बचाने निकल पड़े।
“मेरा धर्म मानवता है और मेरी जाति भारतीयता।” — गणेश शंकर विद्यार्थी
इसी मानवता की रक्षा करते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दे दी।
3. युवा क्रांतिकारियों के मार्गदर्शक
विद्यार्थी जी का कार्यालय केवल एक अखबार का दफ्तर नहीं, बल्कि क्रांतिकारियों का ठिकाना था। भगत सिंह को ‘बलवंत’ नाम से ‘प्रताप’ में शरण देना और उन्हें लेखन के लिए प्रेरित करना, विद्यार्थी जी की दूरदर्शिता को दर्शाता है। उन्होंने पत्रकारिता को राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता संग्राम का आधार स्तंभ बनाया।
4. मातृभूमि समाचार और विद्यार्थी जी के मूल्य
गणेश शंकर विद्यार्थी जी के आदर्शों पर चलना कांटों की राह पर चलने जैसा है, लेकिन यही वह मार्ग है जो समाज को सही दिशा दिखाता है। मातृभूमि समाचार का संकल्प भी वही है:
- सांस्कृतिक गौरव की रक्षा करना।
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तथ्यों के साथ समझौता न करना।
हमारी जिम्मेदारी
गणेश शंकर विद्यार्थी केवल एक नाम नहीं, एक विचार हैं। आज उनकी विरासत को जीवित रखने का अर्थ है— निडर होकर सच लिखना और समाज में जहर घोलने वाली ताकतों का विरोध करना। सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब कलम किसी स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए चले।
– सारांश कनौजिया, संपादक
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