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नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सावरकर की ऐतिहासिक मुलाकात: आज़ाद हिंद फौज के निर्माण की रणनीतिक नींव

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आजाद हिंद फौज का ऐतिहासिक दृश्य व सावरकर सदन, मुंबई का चित्र

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जो भले ही लंबे समय तक सार्वजनिक विमर्श से दूर रही हों, लेकिन उनका प्रभाव राष्ट्र की नियति तय करता है। ऐसी ही एक ऐतिहासिक घटना थी नेताजी सुभाष चंद्र बोस और विनायक दामोदर सावरकर की 22 जून 1940 की मुलाकात, जिसने आगे चलकर आजाद हिंद फौज (INA) के गठन और ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष की दिशा को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।

हालाँकि दोनों की वैचारिक पृष्ठभूमि अलग-अलग थी, लेकिन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता, औपनिवेशिक शासन का अंत और सशस्त्र क्रांति के प्रति उनका संकल्प उन्हें एक साझा रणनीतिक धरातल पर ले आया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

1940 का भारत राजनीतिक और वैश्विक उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा था।

  • द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हो चुका था
  • ब्रिटिश साम्राज्य कई मोर्चों पर दबाव में था
  • भारत में राजनीतिक आंदोलन के साथ-साथ क्रांतिकारी गतिविधियाँ भी तेज़ हो रही थीं
  • नेताजी कांग्रेस नेतृत्व से असंतुष्ट होकर ‘फॉरवर्ड ब्लॉक’ की स्थापना कर चुके थे

इसी दौर में नेताजी का लक्ष्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से औपनिवेशिक सत्ता को चुनौती देना था।

ऐतिहासिक मुलाकात: 22 जून 1940

यह महत्वपूर्ण मुलाकात 22 जून 1940 को मुंबई स्थित ‘सावरकर सदन’ में हुई।
यह बैठक केवल औपचारिक भेंट नहीं, बल्कि रणनीतिक विमर्श थी, जिसने आगे चलकर नेताजी की वैश्विक योजना को आकार दिया।

सावरकर के प्रमुख रणनीतिक सुझाव

  • नेताजी को भारत में गिरफ्तार होने के बजाय विदेश जाकर ब्रिटेन के विरोधी देशों से सहयोग लेने की सलाह
  • विशेष रूप से जापान और जर्मनी के साथ सामरिक गठजोड़ की संभावना पर चर्चा
  • रास बिहारी बोस के जापान में चल रहे प्रयासों की जानकारी
  • युद्धबंदी भारतीय सैनिकों को संगठित कर एक राष्ट्रीय सेना (National Army) के निर्माण का सुझाव

यहीं से नेताजी की अंतरराष्ट्रीय रणनीति और भारत से बाहर जाकर स्वतंत्रता संग्राम को वैश्विक मंच देने की योजना को दिशा मिली।

‘आजाद हिंद फौज’ के पीछे सावरकर की सैन्यीकरण रणनीति

सावरकर का मानना था कि:

“केवल राजनीतिक आंदोलन से साम्राज्य नहीं गिरते, इसके लिए सैन्य शक्ति आवश्यक होती है।”

“Militarize the Hindus” की अवधारणा

सावरकर ने भारतीय युवाओं से ब्रिटिश सेना में भर्ती होने का आह्वान किया।
इसका उद्देश्य ब्रिटिश सत्ता का समर्थन नहीं, बल्कि:

  • सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त करना
  • युद्ध कौशल सीखना
  • भविष्य के स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रशिक्षित जनशक्ति तैयार करना

INA को मिला मजबूत आधार

जब नेताजी ने सिंगापुर में आजाद हिंद फौज (INA) की कमान संभाली, तब उन्हें बड़ी संख्या में ऐसे भारतीय सैनिक मिले जो पहले से सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके थे।

इतिहासकारों का मत है कि:

  • यही प्रशिक्षित सैनिक INA की रीढ़ बने
  • 25 जून 1944 को आजाद हिंद रेडियो पर नेताजी ने स्वयं सावरकर के सैन्यीकरण प्रयासों के लिए सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त किया था
  • यह तथ्य दोनों नेताओं के वैचारिक संवाद और रणनीतिक सहयोग की ऐतिहासिक पुष्टि करता है

नेताजी और सावरकर: वैचारिक भिन्नता, रणनीतिक समानता

पहलू नेताजी सुभाष चंद्र बोस विनायक दामोदर सावरकर
विचारधारा समाजवादी, समावेशी राष्ट्रवाद हिंदुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
लक्ष्य पूर्ण स्वराज पूर्ण स्वराज
रणनीति कूटनीति + सशस्त्र विद्रोह सैन्यीकरण + सशस्त्र क्रांति
दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय सहयोग सैन्य शक्ति निर्माण

परस्पर सम्मान

वैचारिक मतभेदों के बावजूद दोनों नेताओं के बीच गहरा सम्मान था।
सावरकर ने नेताजी को “देशभक्तों का देशभक्त” कहा था।

साझा रणनीतिक दृष्टिकोण

दोनों इस सिद्धांत में विश्वास करते थे:

“दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है।”

इसी आधार पर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध धुरी राष्ट्रों (Axis Powers) के साथ रणनीतिक सहयोग को सही ठहराया गया।

ऐतिहासिक प्रभाव और निष्कर्ष

22 जून 1940 की यह मुलाकात केवल एक व्यक्तिगत संवाद नहीं थी, बल्कि यह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का रणनीतिक मोड़ थी।

  • सावरकर ने वैचारिक और सैन्य आधार तैयार किया
  • नेताजी ने उसे वैश्विक स्तर पर क्रियान्वित किया
  • परिणामस्वरूप INA का गठन हुआ
  • ब्रिटिश साम्राज्य की सैन्य और मनोवैज्ञानिक शक्ति को गंभीर चुनौती मिली

यह कहना ऐतिहासिक रूप से उचित है कि:
सावरकर का सैन्यीकरण सिद्धांत और नेताजी का अंतरराष्ट्रीय अभियान एक-दूसरे के पूरक बनकर भारत की स्वतंत्रता की नींव बने।

“इतिहास में यह मुलाकात केवल संवाद नहीं, बल्कि भारत की मुक्ति यात्रा का रणनीतिक टर्निंग पॉइंट है।”

– सारांश कनौजिया, संपादक

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