कोलकाता । गुरुवार, 11 जून 2026
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के ऐतिहासिक नतीजों (जिसमें 15 साल बाद सत्ता परिवर्तन हुआ है) के बाद से ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने इतिहास के सबसे भीषण आंतरिक संकट के दौर से गुजर रही है। पिछले एक सप्ताह के भीतर पार्टी के शीर्ष नेताओं की नाराजगी, संसद से लगातार होते इस्तीफे और विधायकों व लोकसभा सांसदों के एक बड़े धड़े की बागी गतिविधियों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व के सामने अब तक की सबसे बड़ी दीवार खड़ी कर दी है।
कोयल मल्लिक के इस्तीफे की खबर: असमंजस
राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा हलचल राज्यसभा सांसद और प्रसिद्ध अभिनेत्री कोयल मल्लिक के इस्तीफे की खबरों को लेकर है। रिपोर्टों के अनुसार, शुरुआती दौर में कोयल मल्लिक के इस्तीफे को लेकर काफी असमंजस की स्थिति बनी हुई थी और कयास लगाए जा रहे थे कि उन्होंने शीर्ष नेतृत्व के फैसलों से असंतुष्ट होकर पद छोड़ा है।
महत्वपूर्ण तथ्य: हालांकि अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी के बाकी बागी नेताओं की तरह कोयल मल्लिक ने खुलकर नेतृत्व की आलोचना नहीं की है, लेकिन लगातार हो रहे संगठनात्मक बिखराव के बीच उनके इस्तीफे ने उच्च सदन (राज्यसभा) में टीएमसी के संख्याबल को तगड़ा नुकसान पहुँचाया है।
छह दिनों में तीन बड़े झटके: राज्यसभा में सिमटती ताकत
संसद के उच्च सदन में टीएमसी की आवाज कमजोर होती जा रही है। पिछले 6 दिनों के भीतर तीन प्रमुख राज्यसभा सांसदों ने पार्टी और अपने पद को अलविदा कह दिया है:
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सुखेंदु शेखर रॉय: चुनाव परिणाम आते ही पार्टी से दूरी बनाने वाले वे पहले सबसे वरिष्ठ सांसद बने। 13 वर्षों तक राज्यसभा में टीएमसी के चीफ व्हिप रहे सुखेंदु शेखर ने न सिर्फ इस्तीफा दिया, बल्कि सार्वजनिक मंचों से पार्टी की चुनावी रणनीति और आंतरिक तानाशाही की तीखी आलोचना की।
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सुष्मिता देव: राष्ट्रीय स्तर पर टीएमसी का प्रमुख चेहरा रहीं सुष्मिता देव ने भी पार्टी की संगठनात्मक प्राथमिकताओं पर नाराजगी जताते हुए इस्तीफा दे दिया है।
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प्रकाश चिक बराइक: 11 जून को अलीपुरद्वार के प्रमुख नेता प्रकाश चिक बराइक ने भी राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने राज्य में आई नई राजनीतिक व्यवस्था और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली सरकार के साथ मिलकर बंगाल के विकास के लिए काम करने की इच्छा प्रकट की है।
📊 संसदीय समीकरण: इन ताबड़तोड़ इस्तीफों के बाद राज्यसभा में टीएमसी के सदस्यों की संख्या घटकर मात्र 10 रह गई है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में पार्टी का प्रभाव काफी कम हो गया है।
‘बागी खेमा’ सक्रिय: लोकसभा और विधानसभा में बड़ी टूट की आशंका
पार्टी के भीतर सिर्फ असंतोष नहीं है, बल्कि एक समानांतर गुट पूरी तरह सक्रिय हो चुका है। इस बागी खेमे में कई कद्दावर नाम शामिल हैं:
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विधानसभा में बगावत: सूत्रों के मुताबिक, टीएमसी के बचे हुए 80 विधायकों में से करीब 64 विधायक पूर्व कम्युनिस्ट नेता और अब टीएमसी के बागी चेहरा बने ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा के संपर्क में हैं। यह गुट ममता बनर्जी द्वारा तय किए गए आधिकारिक नेता के बजाय ऋतब्रत बनर्जी को सदन में विपक्ष का नेता बनाने पर अड़ा हुआ है।
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लोकसभा में हलचल: दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि काकोली घोष दस्तीदार, सायोनी घोष और माला रॉय जैसे वरिष्ठ चेहरों के नेतृत्व में टीएमसी के 28 में से करीब 19 लोकसभा सांसद एक अलग धड़ा (Fraction) बनाने की तैयारी में हैं, जो केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए (NDA) सरकार को बाहर से समर्थन दे सकता है।
ममता बनर्जी के सामने दो मोर्चों पर अस्तित्व की लड़ाई
2026 के चुनावी झटके ने टीएमसी को दोहरे संकट में डाल दिया है। एक तरफ जहां पार्टी को राज्य की सत्ता गंवाने के बाद सड़क पर उतरकर नए सिरे से विपक्ष की भूमिका में खुद को स्थापित करना है, वहीं दूसरी तरफ पार्टी को पूरी तरह से विभाजित (Split) होने से बचाना है।
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यदि ममता बनर्जी ने जल्द ही अपनी संगठनात्मक शैली में बदलाव नहीं किया और नाराज नेताओं को नहीं मनाया, तो टीएमसी का यह आंतरिक संकट पार्टी को एक क्षेत्रीय दल से समेटकर हाशिए पर धकेल सकता है।
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