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मद्रास हाईकोर्ट के गोहत्या प्रतिबंध आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची तमिलनाडु सरकार, दी ये बड़ी दलीलें

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चेन्नई । बुधवार, 1 जुलाई 2026

तमिलनाडु में गोहत्या और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के मद्रास हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ राज्य की सरकार ने अब देश की शीर्ष अदालत (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया है। पशुपालन विभाग के सचिव की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की गई है। हालांकि, तकनीकी कमियों के कारण यह याचिका फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की ‘डिफेक्ट लिस्ट’ में शामिल है और इस पर सुनवाई की अंतिम तारीख तय होना अभी बाकी है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है, मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा था और तमिलनाडु सरकार ने अपनी याचिका में क्या दलीलें दी हैं।

मद्रास हाईकोर्ट का क्या था आदेश? (27 मई 2026)

यह विवाद तब शुरू हुआ जब मद्रास हाईकोर्ट की अवकाशकालीन पीठ (Justice G.R. Swaminathan और Justice V. Lakshminarayanan) ने 27 मई 2026 को ‘इन्दु मक्कल काची’ के युवा विंग सचिव के. सूर्य प्रसांत की जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए एक बड़ा आदेश जारी किया।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि बकरीद (ईद-उल-अज़्हा) के दौरान कोयंबटूर सहित राज्य के कई हिस्सों में गैर-अधिकृत या अस्थायी शेड बनाकर गायों और बछड़ों की कुर्बानी दी जा रही है। उन्होंने मांग की थी कि सार्वजनिक या अनधिकृत स्थानों पर पशुओं के वध को रोका जाए।

हालाँकि, हाईकोर्ट ने इस मांग से आगे बढ़कर पूरे तमिलनाडु में गाय और बछड़े की हत्या पर तत्काल प्रभाव से पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दे दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा:

  1. संविधान का अनुच्छेद 48: राज्य का यह संवैधानिक दायित्व है कि वह गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू या भारवाही पशुओं के वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाए।

  2. 1976 का सरकारी आदेश (GO): कोर्ट ने राज्य सरकार के 1976 के एक पुराने आदेश का हवाला दिया, जिसमें बूचड़खानों में गायों और बछियों की हत्या पर रोक की बात कही गई थी। कोर्ट ने इसे कानून के समान प्रभावी माना।

  3. बकरीद और सामान्य दिन: अदालत ने साफ किया कि मुख्य सचिव और अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) यह सुनिश्चित करें कि बकरीद की पूर्व संध्या ही नहीं, बल्कि किसी भी अन्य दिन राज्य में कहीं भी गाय या बछड़े की हत्या न हो।

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्यों दी चुनौती? (मुख्य सुधार और दलीलें)

तमिलनाडु सरकार का कहना है कि हाईकोर्ट का यह आदेश राज्य में लागू वैधानिक और कानूनी प्रावधानों के विपरीत है। सरकार ने अपनी याचिका में निम्नलिखित मजबूत कानूनी बिंदु उठाए हैं:

1. तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 (कानून में पूर्ण प्रतिबंध नहीं)

राज्य सरकार ने दलील दी है कि तमिलनाडु एनिमल प्रिजर्वेशन एक्ट, 1958 (Tamil Nadu Animal Preservation Act, 1958) की धारा 4 के तहत राज्य में गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध (Blanket Ban) नहीं है। इस कानून के तहत यदि कोई पशु:

  • 10 वर्ष से अधिक आयु का हो चुका है,

  • काम करने या खेती के काम के लिए अनुपयुक्त है,

  • या बच्चे पैदा करने (प्रजनन) के काबिल नहीं बचा है,

तो सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) द्वारा जारी प्रमाण पत्र (Certificate) के आधार पर उसके वध की अनुमति दी जा सकती है। सरकार का कहना है कि हाईकोर्ट का फैसला इस अधिनियम की मूल भावना के खिलाफ है।

2. याचिका की मांग से आगे बढ़ा हाईकोर्ट

सरकार का कहना है कि मूल जनहित याचिका (PIL) में केवल यह मांग की गई थी कि पशुओं का वध केवल अधिकृत बूचड़खानों (Authorized Slaughter Houses) में ही होना चाहिए, न कि सार्वजनिक या अस्थायी जगहों पर। लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका के दायरे से बाहर जाकर पूरे राज्य में पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया, जिसकी मांग याचिकाकर्ता ने भी नहीं की थी।

3. अन्य नियमों का हवाला

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात को पुख्ता करने के लिए कई अन्य केंद्रीय और राज्य स्तरीय अधिनियमों का हवाला दिया है, जिनमें शामिल हैं:

  • प्रिवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टू एनिमल्स एक्ट, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960)

  • प्रिवेंशन ऑफ क्रुएलिटी टू एनिमल्स (स्लॉटर हाउस) रूल्स, 2001

  • तमिलनाडु अर्बन लोकल बॉडीज एक्ट, 1998 और इसके तहत बने 2023 के नियम।

सरकार का कहना है कि ये सभी कानून पशु वध को नियमित और नियंत्रित (Regulate) करने के लिए बनाए गए हैं, न कि पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के लिए। राज्य सरकार के मुताबिक, पूर्ण पाबंदी का आदेश देकर हाईकोर्ट ने विधायी कानून के ऊपर अपना न्यायिक कानून थोपने का प्रयास किया है।

आगे क्या होगा?

चूँकि तमिलनाडु सरकार की यह विशेष अनुमति याचिका (SLP) अभी सुप्रीम कोर्ट की डिफेक्ट लिस्ट में है, इसलिए जैसे ही राज्य सरकार की कानूनी टीम इसकी तकनीकी कमियों को दूर कर लेगी, यह मामला देश के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष लिस्टिंग के लिए आएगा। इसके बाद ही तय होगा कि सुप्रीम कोर्ट मद्रास हाईकोर्ट के इस दूरगामी आदेश पर रोक लगाता है या इसे बरकरार रखता है।

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