सिएटल । सोमवार, 6 जुलाई 2026
फीफा विश्व कप 2026 के प्री-क्वार्टर फाइनल (राउंड ऑफ 16) मुकाबलों के बीच एक अभूतपूर्व विवाद ने फुटबॉल जगत को हिलाकर रख दिया है। अमेरिकी टीम के स्टार स्ट्राइकर फोलारिन बालोगुन (Folarin Balogun) पर लगा एक मैच का स्वचालित प्रतिबंध (Automatic Ban) हटाने के फीफा के फैसले ने खेल की निष्पक्षता और स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह विवाद तब और गहरा गया जब खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया कि उन्होंने इस मामले को लेकर फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो से सीधे बात की थी।
क्या था पूरा मामला?
बुधवार, 1 जुलाई 2026 को खेले गए राउंड ऑफ 32 के मुकाबले में अमेरिका ने बोस्निया और हर्जेगोविना को 2-0 से शिकस्त दी थी। इस मैच में बालोगुन ने 45वें मिनट में शानदार गोल दागा था, लेकिन मैच के 64वें मिनट में बोस्निया के डिफेंडर तारिक मुहारेमोविच के टखने पर पैर रखने के कारण रेफरी राफेल क्लॉस ने वीडियो असिस्टेंट रेफरी (VAR) समीक्षा के बाद बालोगुन को सीधे रेड कार्ड दिखा दिया था।
फीफा के सामान्य नियमों (अनुच्छेद 66.4) के तहत सीधे रेड कार्ड मिलने पर खिलाड़ी पर अगले मैच का स्वचालित प्रतिबंध लग जाता है, जिसके कारण बालोगुन सोमवार रात बेल्जियम के खिलाफ होने वाले नॉकआउट मैच से बाहर हो चुके थे।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इन्फैन्टिनो की बातचीत
विवाद की असली वजह इस फैसले के पीछे की राजनीतिक हलचल है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बात करते हुए साफ कहा कि उन्होंने फीफा अध्यक्ष जियानी इन्फैन्टिनो को फोन करके इस फैसले की समीक्षा करने को कहा था। ट्रंप ने कहा,
“मैंने वह खेल देखा था, वह कोई फाउल नहीं था। दो बेहतरीन एथलीट पूरी रफ्तार से दौड़ रहे थे और आपस में टकरा गए। रेफरी का फैसला हैरान करने वाला था। मैंने इन्फैन्टिनो से बात की क्योंकि बालोगुन ने कुछ गलत नहीं किया था।”
इस बातचीत के ठीक बाद फीफा की अनुशासन समिति ने फीफा अनुशासन संहिता के अनुच्छेद 27 का हवाला देते हुए बालोगुन के एक मैच के निलंबन को एक साल की परिवीक्षा अवधि (Probationary Period) के लिए स्थगित कर दिया। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि बालोगुन सोमवार को सिएटल स्टेडियम में बेल्जियम के खिलाफ खेलने के लिए पूरी तरह उपलब्ध हैं।
UEFA और बेल्जियम फुटबॉल एसोसिएशन ने जताई कड़ी आपत्ति
फीफा के इस ‘अभूतपूर्व’ फैसले के बाद यूरोपीय फुटबॉल की सर्वोच्च संस्था UEFA ने फीफा पर तीखा हमला बोला है। UEFA ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा:
“फोलारिन बालोगुन के रेड कार्ड प्रतिबंध को टालने का फीफा का फैसला एक ‘रेड लाइन’ (लक्ष्मण रेखा) को पार करना है। फुटबॉल नियमों पर चलता है जो निष्पक्ष और पारदर्शी प्रतिस्पर्धा का आधार हैं। रेड कार्ड के बाद एक मैच का निलंबन अनिवार्य है, यह कोई विवेकाधीन विकल्प नहीं है। जब नियमों के रक्षक ही इसकी गारंटी नहीं देंगे, तो खेल की अखंडता खतरे में पड़ जाएगी।”
वहीं, रॉयल बेल्जियन फुटबॉल एसोसिएशन (RBFA) ने भी इस फैसले पर घोर आश्चर्य व्यक्त किया है। बेल्जियम महासंघ ने कहा कि वे टूर्नामेंट में फेयर-प्ले के सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने सभी कानूनी विकल्पों की जांच कर रहे हैं। फुटबॉल पंडितों का भी मानना है कि इस फैसले से एक गलत मिसाल कायम होगी, जहां राजनीतिक रसूख वाले देशों के दबाव में आकर नियमों को बदला जा सकता है।
क्रिस्टियानो रोनाल्डो और गैरिंचा के उदाहरणों से तुलना
इस विवाद के बीच खेल इतिहास के कुछ पुराने फैसलों की भी चर्चा हो रही है। इस तरह के फैसले को कुछ जानकार ‘रोनाल्डो रूल’ से जोड़कर देख रहे हैं, जब पुर्तगाल के क्रिस्टियानो रोनाल्डो के मामले में भी अनुच्छेद 27 का इस्तेमाल हुआ था। वहीं साल 1962 के विश्व कप में ब्राजील के दिग्गज गैरिंचा को भी राजनीतिक दबाव के बाद फाइनल खेलने की अनुमति दी गई थी, हालांकि उस समय भौतिक रेड कार्ड का नियम लागू नहीं था।
इस पूरे घटनाक्रम ने फीफा की स्वतंत्रता को कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब देखना यह होगा कि सोमवार रात सिएटल के मैदान पर जब अमेरिका और बेल्जियम की टीमें आमने-सामने होंगी, तो इस भारी विवाद का असर खिलाड़ियों के प्रदर्शन पर क्या पड़ता है।
Matribhumisamachar


