नई दिल्ली। मंगलवार, 11 अगस्त 2026
संसद के मानसून सत्र में Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 (विदेश अंशदान नियमन संशोधन विधेयक, 2026) को लेकर सरकार और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक घमासान चरम पर पहुंच गया है। एक ओर जहां कांग्रेस, NCP (SP) और अन्य विपक्षी दल इस विधेयक को मौजूदा स्वरूप में तुरंत वापस लेने की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार की ओर से संकेत मिले हैं कि गतिरोध दूर करने के लिए विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee – JPC) के पास विचार-विमर्श के लिए भेजा जा सकता है।
संसद की हालिया कार्यवाही और लोकसभा के दैनिक एजेंडे में इस विधेयक को तत्काल सूचीबद्ध न किए जाने से यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार FCRA संशोधन पर किसी भी जल्दबाजी के बजाय सतर्कता और विचार-विमर्श की राह अपना रही है।
क्या है FCRA Amendment Bill 2026 और क्यों हो रहा है बवाल?
Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010 (FCRA) भारत में गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं द्वारा प्राप्त किए जाने वाले विदेशी चंदे को विनियमित करता है। 2026 के प्रस्तावित संशोधन का मुख्य उद्देश्य विदेशी अंशदान के दुरुपयोग को रोकना, पारदर्शिता बढ़ाना और राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करना है।
हालांकि, इस विधेयक के कुछ नए प्रावधानों को लेकर गंभीर आपत्तियां उठाई जा रही हैं:
-
नियुक्त प्राधिकरण (Designated Authority) द्वारा संपत्तियों का अधिग्रहण: यदि किसी NGO या संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द होता है, समाप्त (expire) होता है या नवीनीकृत नहीं हो पाता, तो विदेशी चंदे से बनाई गई उसकी तमाम चल-अचल संपत्तियां सरकार द्वारा नियुक्त ‘डिजिटेड अथॉरिटी’ के नियंत्रण में चली जाएंगी।
-
सजा की अवधि में बदलाव: विधेयक में FCRA नियमों के उल्लंघन के लिए अधिकतम कारावास की अवधि को 5 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष करने और जुर्माने को तर्कसंगत बनाने का प्रस्ताव है।
-
जांच के लिए पूर्व अनुमति: राज्य पुलिस या जांच एजेंसियों को FCRA उल्लंघनों की जांच शुरू करने से पहले केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य किया गया है।
विपक्ष की मांग: “मौजूदा स्वरूप में बिल वापस लिया जाए”
कांग्रेस समेत विभिन्न विपक्षी दलों का तर्क है कि यह विधेयक नागरिक समाज (Civil Society) और सामाजिक-शैक्षणिक कार्य करने वाले संगठनों की स्वायत्तता पर सीधा प्रहार करता है।
NCP (SP) की वरिष्ठ सांसद सुप्रिया सुले और अन्य नेताओं ने मांग की है कि:
-
सरकार या तो इस विधेयक को पूरी तरह वापस ले।
-
अथवा इसे विस्तृत संसदीय जांच और सभी हितधारकों की राय के लिए JPC को सौंपे।
विपक्ष का कहना है कि अगर किसी NGO का नवीनीकरण केवल प्रशासनिक देरी या मामूली तकनीकी कारणों से रुक जाता है, तो उसकी दशकों की निर्मित संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण होना असंवैधानिक और अनुचित है।
सरकार के सामने दो विकल्प
संसदीय गतिरोध के बीच केंद्र सरकार के पास मुख्य रूप से दो रास्ते दिखाई दे रहे हैं:
-
संसद में सीधे चर्चा और पारित कराने की कोशिश: हालांकि विपक्ष के कड़े रुख के कारण यह रास्ता टकराव बढ़ा सकता है।
-
JPC को मामला सौंपना: विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजकर सभी पक्षों और विशेषज्ञों की सिफारिशों के आधार पर एक संतुलित मसौदा तैयार करना।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए दूसरे विकल्प यानी JPC जांच की संभावना अधिक मजबूत दिखाई दे रही है।
बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ Section)
Q1. FCRA Amendment Bill 2026 क्या है?
उत्तर: यह Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010 में संशोधन का प्रस्तावित विधेयक है, जो विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों और उनकी संपत्तियों के प्रबंधन को सख्त करने के लिए लाया गया है।
Q2. बिल में ‘Designated Authority’ का क्या काम होगा?
उत्तर: यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द, निरस्त या समाप्त हो जाता है, तो यह प्राधिकरण विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का प्रबंधन, जब्ती या हस्तांतरण करेगा।
Q3. विपक्षी दल इस बिल का विरोध क्यों कर रहे हैं?
उत्तर: विपक्ष का आरोप है कि यह कानून NGOs और नागरिक समाज संगठनों पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण स्थापित करेगा और प्रशासनिक देरी पर भी संपत्तियों के अधिग्रहण का जोखिम रहेगा।
Q4. JPC (संयुक्त संसदीय समिति) क्या करेगी?
उत्तर: JPC सत्ता पक्ष और विपक्ष के सांसदों की एक समिति होती है जो बिल के एक-एक प्रावधान का गहन अध्ययन करती है और अपनी सिफारिशें संसद को प्रस्तुत करती है।
अस्वीकरण (Disclaimer)
यह लेख उपलब्ध संसदीय रिपोर्टों, आधिकारिक घटनाक्रमों और समाचार स्रोतों पर आधारित है। FCRA संशोधन विधेयक 2026 से जुड़े अंतिम कानूनी बदलाव संसद में इसके पारित होने अथवा JPC की अंतिम सिफारिशों के बाद ही प्रभावी होंगे।
Matribhumisamachar


