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मौनी अमावस्या 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और मौन व्रत के पीछे का गहरा आध्यात्मिक रहस्य

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नई दिल्ली. माघ मास की अमावस्या, जिसे मौनी अमावस्या के नाम से जाना जाता है, हिंदू धर्म में आध्यात्मिक साधना के लिए सबसे महत्वपूर्ण तिथियों में से एक मानी जाती है। वर्ष 2026 में यह पर्व विशेष शुभ योगों के साथ आ रहा है।

🗓️ मौनी अमावस्या 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त

हिंदू पंचांग के अनुसार, माघ अमावस्या की तिथि 18 जनवरी 2026 को पड़ रही है। उदयातिथि की मान्यता के कारण इसी दिन मुख्य स्नान और दान के कार्य किए जाएंगे।

विवरण समय
अमावस्या तिथि प्रारंभ 18 जनवरी 2026, रात्रि 12:03 बजे से
अमावस्या तिथि समाप्त 19 जनवरी 2026, रात्रि 01:21 बजे तक
ब्रह्म मुहूर्त (स्नान के लिए श्रेष्ठ) सुबह 05:27 से 06:27 तक
अभिजीत मुहूर्त (पूजा के लिए) दोपहर 12:10 से 12:54 तक

विशेष योग: इस वर्ष मौनी अमावस्या पर ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ और ‘शिववास योग’ का निर्माण हो रहा है, जो साधना और सिद्धियों के लिए अत्यंत फलदायी है। साथ ही, मकर राशि में सूर्य और चंद्रमा की युति एक विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करेगी।

🧘 मौन रखने के आध्यात्मिक और मानसिक लाभ

‘मौनी’ शब्द की उत्पत्ति ‘मुनि’ से हुई है। इस दिन मौन व्रत रखने का अर्थ केवल चुप रहना नहीं, बल्कि अपनी ऊर्जा को अंतर्मुखी करना है। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:

  1. वाणी की शुद्धि: दिन भर मौन रहने से हम अनावश्यक बोलने और नकारात्मक शब्दों के प्रयोग से बचते हैं, जिससे ‘वाक सिद्धि’ की शक्ति बढ़ती है।

  2. मानसिक शांति और एकाग्रता: जब हम बाहरी जगत से संवाद बंद करते हैं, तो मन के विचार शांत होने लगते हैं। यह ध्यान (Meditation) में गहराई तक जाने का सबसे उत्तम समय है।

  3. इंद्रिय नियंत्रण: शास्त्रों के अनुसार, जिह्वा (जीभ) पर नियंत्रण पाने से अन्य इंद्रियों को वश में करना आसान हो जाता है। मौन व्रत आत्म-संयम का एक कठिन लेकिन प्रभावी अभ्यास है।

  4. ऊर्जा का संरक्षण: हमारी ऊर्जा का एक बड़ा हिस्सा बोलने में व्यय होता है। मौन रहने से संचित ऊर्जा का उपयोग शारीरिक और मानसिक हीलिंग (Healing) के लिए किया जा सकता है।

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✨ मौनी अमावस्या का महत्व और परंपराएं

  • अमृत स्नान: मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों, विशेषकर गंगा का जल अमृत के समान हो जाता है। प्रयागराज के संगम तट पर इस दिन सबसे बड़ा ‘शाही स्नान’ होता है।

  • पितृ तर्पण: अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित है। इस दिन काले तिल से पितरों का तर्पण करने से ‘पितृ दोष’ से मुक्ति मिलती है और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

  • दान का फल: इस दिन तिल, गुड़, गर्म कपड़े और अन्न का दान करना अक्षय पुण्य देता है। गुप्त दान (बिना बताए किया गया दान) इस दिन विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।

📝 इस दिन क्या करें? (पूजा विधि)

  • सुबह सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी या घर में ही पानी में गंगाजल डालकर स्नान करें।

  • स्नान के समय और पूरे दिन संभव हो तो मौन धारण करें।

  • भगवान विष्णु और शिव की संयुक्त रूप से पूजा करें।

  • तुलसी के पौधे की 108 बार परिक्रमा करें।

  • संध्या के समय घर के दक्षिण कोने में एक दीपक जलाएं (पितरों के निमित्त)।

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