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बड़े मन ने बनाया ‘महामना’

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– डॉ घनश्याम बादल

25 दिसम्बर 1861 को प्रयाग में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में जन्मे प्रखर हिंदू व काशी विश्वविद्यालय के संस्थापक भारत रत्न पंडित मदनमोहन मालवीय यूं ही ‘महामना’ के नाम से नहीं जानते बल्कि अपने बड़े मन व सोच ने उन्हे यह नाम दिलाया है ।

इसलिए कहलाए मालवीय:

पिता ब्रजनाथ और माता भूनादेवी मालवा के मूल निवासी थे इसीलिए ‘मालवीय’ कहलाए । मालवीय जी के लिए जितना आदर शिक्षित वर्ग में था उतना ही जन साधारण में भी रहा । उनकी विद्वता असाधारण थी अैर विनम्रता एवम् शालीनता उनमें कूट-कूटकर भरी थी। अपने समय के सर्वश्रेष्ठ वक्ता संस्कृत, हिंदी तथा अंग्रेजी में निष्णात महामना का जीवन विद्यार्थियों के लिए एक महान प्रेरणा स्रोत रहा है । जब किसी नेता के पास जनसाधारण की पहुँच सरल नहीं थी, तब मालवीय जी के पास लोग उनके साथ मित्र की तरह बात कर सकते थे ।

मेधावी बाल मालवीय:

सात वर्ष के मदनमोहन को धर्मज्ञानोपदेश पाठशाला के देवकीनंदन मालवीय माघ मेले में ले जाकर मोढ़े पर खड़ा करके व्याख्यान दिलाते थे। क्या आश्चर्य कि कांग्रेस के द्वितीय अधिवेशन में अंग्रेजी के प्रथम भाषण से ही प्रतिनिधियों को मंत्रमुग्ध कर देने वाले मालवीय देश के सर्वश्रेष्ठ हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के व्याख्यान वाचस्पतियों में इतने प्रसिद्ध हुए।

चरित्रनिर्माण पर बल:

महामना मालवीय का मानना था कि व्यक्ति और समाज के अभ्युदय के लिए बौद्धिक विकास से भी अधिक महत्वपूर्ण है चरित्र का निर्माण और उसका विकास। मात्र औद्योगिक प्रगति से ही कोई देश खुशहाल, समृद्ध और गौरवशाली राष्ट्र नहीं बन सकता। अतः युवाओं का चरित्र निर्माण उनका एक प्रमुख लक्ष्य था। उनका मानना था कि उच्च शिक्षा द्वारा केवल अभियंता, चिकित्सक, विधिवेत्ता, वैज्ञानिक और कुशल व्यापारी तथा विद्वान ही तैयार नहीं किए जाएं, बल्कि ऐसे व्यक्तियों का निर्माण किया जाए, जिनका चरित्र उज्ज्वल हो, जो कर्तव्य परायण और मूल्य निष्ठा से ओतप्रोत हों। इसी लक्ष्या को लेकर उन्हाने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी ।

बहुआयामी शिक्षा के हामी :

मालवीयजी ने बहुआयामी शिक्षा को परम आवश्यक माना और भारत को अशिक्षा तथा अज्ञान के अंधकार से निकालने का संकल्प किया। शिक्षा को महामना ने राष्ट्र निर्माण की अनिवार्य शर्त के रूप में देखा- एक ऐसी शिक्षा, जो समन्वयकारी हो और कल्याण करती हो। मालवीयजी शिक्षा को सबसे महत्वपूर्ण और मजबूत ‘चेंज एजेंट’ के रूप में मानते थे। उन्होंने राष्ट्र निर्माण की संकल्पना में प्रजातांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय सहमति को सदैव उच्चतम वरीयता दी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय मालवीयजी की देशभक्ति और प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का जीवंत उदाहरण है।

शिक्षा को बनाया माध्यम :

उनका कहना था कि शिक्षा की प्रासंगिकता और गुणवत्ता उसकी रोजगार परायणता को लेकर हैं, रचनाधर्मिता और मानवीयता उसका लक्ष्य हैं। आज के युवा और उनके पालक सर्वश्रेष्ठ उच्च शिक्षा की चाहत रखते हैं। ऐसी शिक्षा, जो कि युवाओं में वांछित ज्ञान, कौशल और दक्षता का विकास करे, उन्हें सही मायने में शिक्षित और संस्कारित बनाए, उनमें सही और गलत को समझने का नजरिया विकसित करे, उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने योग्य बनाए, उन्हें सदी की कसौटी पर खरा उतरने योग्य बनाए, उनमें प्रतिस्पर्धात्मक विश्व-रंगमंच पर सफल होने के लिए आवश्यक गुणों और क्षमताओं का विकास करे।आज भी शिक्षा के बारे में उनकी सोच प्रासांगिक है ।

धार्मिक मगर उदार:

‘सिर जाय तो जाय प्रभु मेरो धर्म न जाय’ मालवीय जी का व्रत था यह आदर्श उन्हें बचपन में पितामह प्रेमधर चतुर्वेदी से मिला । उन्होंने हिंदू संगठन का शक्तिशाली आंदोलन चलाया और स्वयं अनुदार सहधर्मियों के तीव्र प्रतिवाद झेलते हुए कलकत्ता, काशी, प्रयाग और नासिक में भंगियों को धर्मोपदेश और मंत्रदीक्षा दी।

बहुमुखी संपादक :

कालाकांकर के देशभक्त राजा रामपाल सिंह के अनुरोध पर मालवीय जी ने उनके हिंदी अंग्रेजी अखबार हिन्दुस्तान का 1887 से संपादन करके दो ढाई साल तक जनता को जगाया। उन्होंने ‘इंडियन ओपीनियन’ के संपादन में भी हाथ बँटाया और 1907 में साप्ताहिक ‘अभ्युदय’ को निकालकुछ समय तक संपादित किया, एवं सरकार समर्थक ‘पायोनियर’ के समकक्ष 1909 में ‘दैनिक लीडर’ प्रकाषित कर लोकमत निर्माण किया तथा दूसरे वर्ष ‘मर्यादा’ पत्रिका प्रकाशित कराई। बाद में उन्होंने 1924 ई0 में दिल्ली के ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ को सुव्यवस्थित किया तथा सनातन धर्म और लाहौर से विश्वबंधु, पत्रों को प्रकाशित कराया।

सांस्कृतिक जागरण के संवाहक :

महामना मालवीय जी ने शिक्षा के प्रसार और इसे नया स्वरूप प्रदान करने पर इतना बल दिया, क्योंकि वह इसे सांस्कृतिक जागरण का प्रधान अंश मानते थे। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में भारत में जो सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा था, मालवीय जी उससे प्रभावित हुए। उनकी वाणी में, विचारों में और मान्यताओं में उस सांस्कृतिक उत्थान की झलक मिलती है। उन्होंने विशेष रूप से भारत की सांस्कृतिक धरोहर की ओर देखा, उसके गौरवमय इतिहास से प्रेरणा ग्रहण की और भारतीय के प्रति अनुराग जगाने का सदैव कार्य किया। इसी दृष्टि से उन्होंने भारतीय भाषाओं को विकसित करने तथा संस्कृत के अधिकाधिक प्रयोग पर बल दिया।

गीता बनी मार्गदर्शक :

मालवीय जी का विश्वास था कि राष्ट्र की उन्नति तभी संभव है, जब वहाँ के निवासी सुशिक्षित हों। बिना शिक्षा के मनुष्य पशुवत् माना जाता है। मालवीय जी नगर-नगर की गलियों तथा गाँवों में शिक्षा का प्रचार-प्रसार में जुटे थे। वे जानते थे की व्यक्ति अपने अधिकारों को तभी भली भाँति समझ सकता है, जब वह शिक्षित हो। संसार के जो राष्ट्र आज उन्नति के शिखर पर हैं, वे शिक्षा के कारण ही हैं। विद्यार्थियों की जितनी सहायता कर सकते थे , मालवीय जी करते रहते थे। वे नियमित रूप से प्रति सप्ताह रविवार को गीता प्रवचन में जाते थे पर वहाँ उसके प्रति विद्यार्थियों की पर्याप्त अभिरूचि न देखकर दुःखी होते थे।

तन मन और ईश्वर देश :

वे अक्सर शिवाजी हॉल जाते, कसरती नवयुवकों के हृष्ट-पुष्ट शरीर को देखकर प्रसन्न होते, उन्हें आशीर्वाद देते थे। ईश्वरभक्ति का देशभक्ति में अवतरण तथा देशभक्ति की ईश्वरभक्ति में परिपक्वता उनके व्यक्तित्व का विशिष्ट सदगुण था। उनकी धारणा थी कि ‘मनुष्य के पशुत्व को ईश्वरत्व में परिणत करना ही धर्म है। मनुष्यता का विकास ही ईश्वरत्व और ईश्वर है और निष्काम भाव से प्राणी मात्र की सेवा ही ईश्वर की सच्ची आराधना है। मालवीय जी विद्यार्थियों से कहा करते थे “विद्यार्थियों तुम ईश्वर का ज्ञान चाहते हो, तो अपने मन को पवित्र कर मेरी बातों को सुनो।”

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.

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