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सऊदी अरब और UAE के बीच युद्ध का खतरा: यमन में सऊदी का हवाई हमला, 24 घंटे में सेना हटाने का अल्टीमेटम

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रियाद. यमन का गृहयुद्ध अब एक खतरनाक मोड़ पर आ गया है जहाँ दो पूर्व सहयोगी—सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE)—एक-दूसरे के आमने-सामने खड़े नजर आ रहे हैं। मंगलवार को सऊदी अरब के नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन ने यमन के मुकल्ला बंदरगाह (Mukalla Port) पर भीषण हवाई हमले किए। सऊदी अरब का दावा है कि उसने उन हथियारों और बख्तरबंद वाहनों को निशाना बनाया है जो UAE से जहाजों के जरिए अलगाववादी गुटों के लिए भेजे गए थे।

प्रमुख घटनाक्रम: 24 घंटे का अल्टीमेटम

तनाव की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सऊदी समर्थित यमन की प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल (PLC) के प्रमुख रशाद अल-अलीमी ने एक बड़ा कदम उठाते हुए:

  • UAE के साथ रक्षा समझौता रद्द कर दिया है।

  • UAE की सेना को 24 घंटे के भीतर यमन छोड़ने का आदेश दिया है।

  • यमन में 90 दिनों के आपातकाल की घोषणा कर दी गई है।

  • हवाई, जमीनी और समुद्री सीमा पर 72 घंटे का पूर्ण प्रतिबंध (Blockade) लगा दिया गया है।

सऊदी का हवाई हमला और आरोप

सऊदी प्रेस एजेंसी (SPA) के अनुसार, सऊदी वायुसेना ने मुकल्ला बंदरगाह पर उन दो जहाजों से उतारे गए हथियारों को नष्ट कर दिया जो UAE के फुजैराह बंदरगाह से आए थे। सऊदी अरब का आरोप है कि इन जहाजों ने अपना ट्रैकिंग सिस्टम (AIS) बंद कर रखा था और वे दक्षिणी अलगाववादी गुट ‘सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल’ (STC) को सैन्य सहायता पहुंचा रहे थे। सऊदी अरब ने UAE के इस कदम को “अत्यंत खतरनाक” और अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया है।

विवाद की जड़: तेल समृद्ध क्षेत्र पर कब्जा

यह विवाद तब शुरू हुआ जब दिसंबर 2025 की शुरुआत में UAE समर्थित STC के लड़ाकों ने तेल समृद्ध हदरमौत और अल-महरा प्रांतों पर कब्जा कर लिया। ये इलाके सऊदी अरब की सीमा से लगे हैं और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण हैं। सऊदी अरब ने इसे यमन की स्थिरता के खिलाफ ‘एकतरफा कार्रवाई’ करार दिया है।

युद्ध का मंडराता खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि यमन अब खाड़ी के इन दो शक्तिशाली देशों के बीच ‘प्रॉक्सी वॉर’ (छद्म युद्ध) का मैदान बन गया है। जहाँ सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार का समर्थन कर रहा है, वहीं UAE अलगाववादी ताकतों के साथ खड़ा है। यदि 24 घंटे के अल्टीमेटम के बाद UAE अपनी सेना और समर्थन वापस नहीं लेता है, तो दोनों देशों के बीच सीधा सैन्य टकराव होने की संभावना बढ़ गई है।

संयुक्त राष्ट्र (UN):

महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनों देशों से “अधिकतम संयम” बरतने की अपील की है। UN को डर है कि यदि दो प्रमुख खाड़ी शक्तियां आपस में भिड़ती हैं, तो यमन में पिछले एक दशक से जारी मानवीय संकट और भी भयावह हो जाएगा।

अमेरिका:

वाशिंगटन के लिए यह स्थिति बेहद पेचीदा है क्योंकि सऊदी और UAE दोनों ही अमेरिका के प्रमुख रणनीतिक साझेदार हैं। अमेरिकी विदेश विभाग ने एक बयान जारी कर कहा है कि वे रियाद और अबू धाबी के साथ संपर्क में हैं ताकि तनाव को कूटनीतिक तरीके से सुलझाया जा सके।

ईरान की स्थिति:

क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी ईरान इस स्थिति पर पैनी नजर रखे हुए है। विश्लेषकों का मानना है कि ‘अरब गठबंधन’ में फूट पड़ने से हूती विद्रोहियों (Houthi rebels) को यमन में अपनी पकड़ और मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

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यह भी पढ़ें : 1857 का स्वातंत्र्य समर : कारण से परिणाम तक

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