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सिंधु घाटी सभ्यता का अंत: युद्ध नहीं, जलवायु परिवर्तन और ‘सूखा’ बना पतन का कारण

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नई दिल्ली. दुनिया की सबसे विकसित और प्राचीनतम शहरी सभ्यताओं में से एक, सिंधु घाटी सभ्यता के पतन को लेकर एक नई रिसर्च सामने आई है। अब तक कई इतिहासकारों का मानना था कि आर्यों के आक्रमण या भीषण युद्ध ने इस सभ्यता को मिटा दिया था, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययनों (Modern Research) ने इस थ्योरी को काफी हद तक नकार दिया है। नई स्टडी में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और नदियों के मार्ग बदलने को मुख्य कारण माना गया है।

नई रिसर्च के मुख्य बिंदु: क्यों हुआ पतन?

हाल ही में भू-वैज्ञानिकों और पुरातत्वविदों द्वारा किए गए अध्ययनों में पतन के निम्नलिखित कारणों पर जोर दिया गया है:

  • 200 साल का भीषण सूखा: ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ जैसे जर्नल्स में प्रकाशित शोध के अनुसार, लगभग 4,200 साल पहले इस क्षेत्र में मानसून का पैटर्न अचानक बदल गया था। इसके परिणामस्वरूप यहाँ लगभग 200 वर्षों तक बेहद कम बारिश हुई, जिससे कृषि व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई।

  • नदियों का रास्ता बदलना: सिंधु और उसकी सहायक नदियों (जैसे सरस्वती) ने टेक्टोनिक प्लेटों में हलचल के कारण अपना रास्ता बदल लिया। पानी की कमी के कारण धोलावीरा, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे बड़े शहरों के लोग पलायन करने को मजबूर हो गए।

  • शहरीकरण का अंत और पलायन: रिसर्च बताती है कि सभ्यता अचानक खत्म नहीं हुई, बल्कि धीरे-धीरे लोग शहरों को छोड़कर ग्रामीण इलाकों (पूर्व और दक्षिण की ओर, जैसे गंगा के मैदान) की तरफ बसने लगे। इससे उनकी विकसित शहरी जीवनशैली और लिपि का अंत हो गया।

  • बीमारियां और महामारी: कुछ शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि जलवायु परिवर्तन और जल संकट के कारण हैजा और तपेदिक (TB) जैसी संक्रामक बीमारियां फैलीं, जिसने जनसंख्या को काफी कम कर दिया।

युद्ध की थ्योरी क्यों हुई कमजोर?

शुरुआती खोजों के दौरान मोहनजोदड़ो में मिले नरकंकालों के आधार पर ‘विदेशी आक्रमण’ की बात कही गई थी। लेकिन नई डीएनए (DNA) जांच और फॉरेंसिक विश्लेषण में चोट के निशान युद्ध के बजाय बीमारियों या कुपोषण के पाए गए हैं। साथ ही, किसी भी खुदाई में बड़े पैमाने पर हथियारों के भंडार नहीं मिले हैं, जो भीषण युद्ध की पुष्टि कर सकें।

निष्कर्ष

वैज्ञानिकों का कहना है कि सिंधु घाटी सभ्यता का अंत किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई प्राकृतिक बदलावों के एक साथ होने से हुआ। विशेष रूप से अनुकूल जलवायु का खत्म होना इस महान सभ्यता के पतन की सबसे बड़ी वजह बनी। यह रिसर्च हमें आज के दौर में भी जलवायु परिवर्तन के खतरों के प्रति सचेत करती है।

सिंधु घाटी सभ्यता के इंजीनियरों ने आज से लगभग 5000 साल पहले ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल किया था, जिन्हें आज के दौर में ‘स्मार्ट सिटी’ (Smart City) का आधार माना जाता है। उनकी समझ इतनी उन्नत थी कि वे कुदरत के साथ तालमेल बिठाकर रहना जानते थे।

हड़प्पा कालीन इंजीनियरिंग: आधुनिक दुनिया के लिए एक सबक

ग्रिड प्रणाली और शहरी नियोजन (Urban Planning)

सिंधु घाटी के शहर किसी बेतरतीब बस्ती की तरह नहीं, बल्कि आधुनिक न्यूयॉर्क या चंडीगढ़ की तरह ग्रिड सिस्टम पर आधारित थे।

  • समकोण सड़कें: सभी सड़कें एक-दूसरे को 90 डिग्री के कोण पर काटती थीं।

  • हवा का प्रबंधन: सड़कों का निर्माण इस तरह किया गया था कि प्राकृतिक हवा चलने पर गलियां अपने आप साफ हो जाती थीं।

दुनिया की पहली जल निकासी प्रणाली (Advanced Drainage System)

हड़प्पावासी स्वच्छता के मामले में आज के कई आधुनिक शहरों से भी आगे थे।

  • ढकी हुई नालियां: हर घर की नाली एक मुख्य बड़ी नाली से जुड़ी होती थी, जो पूरी तरह से ईंटों और पत्थरों से ढकी रहती थी।

  • इंस्पेक्शन चैंबर (मैनहोल): नालियों की सफाई के लिए जगह-जगह ‘मैनहोल’ बनाए गए थे, जो यह दर्शाता है कि वे नियमित रख-रखाव के महत्व को समझते थे।

ईंटों का मानकीकरण (Standardized Bricks)

आज हम निर्माण में जिस आकार की ईंटों का उपयोग करते हैं, उसका सटीक अनुपात सिंधु सभ्यता ने हजारों साल पहले ही तय कर लिया था।

  • उनकी ईंटों का अनुपात हमेशा 4:2:1 (लंबाई:चौड़ाई:मोटाई) होता था। चाहे वह कालीबंगन हो या लोथल, पूरी सभ्यता में एक ही माप की ईंटों का मिलना उनकी संगठित इंजीनियरिंग का प्रमाण है।

वाटर हार्वेस्टिंग और हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग

धोलावीरा (गुजरात) में जल संरक्षण की जो तकनीक मिली है, वह अद्भुत है:

  • विशाल जलाशय: उन्होंने रेगिस्तानी इलाके में बारिश के पानी को जमा करने के लिए चट्टानों को काटकर 16 विशाल जलाशय बनाए थे।

  • चेक डैम: नदियों के पानी को मोड़ने और जमा करने के लिए उन्होंने बांध जैसी संरचनाएं बनाई थीं।

दुनिया का पहला डॉकयार्ड (लोथल)

गुजरात के लोथल में दुनिया का पहला कृत्रिम बंदरगाह (Dockyard) मिला है।

  • ज्वार-भाटा इंजीनियरिंग: वहां के इंजीनियरों ने ज्वार-भाटे (Tides) का उपयोग करके जहाजों को बेसिन में लाने की तकनीक विकसित की थी। यह उस समय के समुद्री विज्ञान की गहरी समझ को दर्शाता है।

सिटाडल और वाटरप्रूफिंग

‘ग्रेट बाथ’ (विशाल स्नानागार) में पानी को रिसने से रोकने के लिए उन्होंने ईंटों के ऊपर बिटुमेन (प्राकृतिक डामर) की परत चढ़ाई थी। यह दुनिया में वाटरप्रूफिंग का सबसे पहला उदाहरण माना जाता है।

दिलचस्प तथ्य: सिंधु घाटी के लोग वजन और माप की ‘दशमलव प्रणाली’ (Decimal System) का भी उपयोग करते थे, जो व्यापार में उनकी सटीकता को दर्शाता है।

सिंधु लिपि का रहस्य: एक अनपढ़ी दास्तां

यह चित्रलिपि है (Pictographic Script)

सिंधु लिपि में अक्षरों के बजाय चित्रों का उपयोग किया गया है। इसमें मछली, इंसानी आकृति, पहिए और पेड़ों जैसे लगभग 400 से 600 अलग-अलग संकेत (Symbols) मिले हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि हर चिन्ह किसी खास शब्द या ध्वनि को दर्शाता था।

लिखने का अनोखा तरीका: ‘बौस्ट्रोफेडन’ (Boustrophedon)

शोधकर्ताओं ने पाया कि यह लिपि दाईं से बाईं ओर (Right to Left) लिखी जाती थी। लेकिन कुछ जगहों पर यह पहली लाइन दाईं से बाईं और दूसरी लाइन बाईं से दाईं ओर लिखी गई है। इस शैली को ‘बौस्ट्रोफेडन’ कहा जाता है।

अब तक क्यों नहीं पढ़ी जा सकी?

इस लिपि को न पढ़ पाने के तीन मुख्य कारण हैं:

  • कोई द्विभाषी शिलालेख नहीं: जैसे मिस्र की लिपि को ‘रोसेटा स्टोन’ (जिस पर एक ही बात तीन भाषाओं में लिखी थी) की मदद से पढ़ा गया, सिंधु सभ्यता का ऐसा कोई शिलालेख नहीं मिला है जिसमें किसी जानी-पहचानी भाषा (जैसे संस्कृत या सुमेरियन) के साथ सिंधु लिपि लिखी हो।

  • छोटे शिलालेख: अभी तक जो भी लिखावट मिली है, वह बहुत छोटी है (औसतन केवल 5 संकेत)। इतनी कम जानकारी से पूरी भाषा का व्याकरण समझना असंभव सा है।

  • अज्ञात भाषा परिवार: यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी मूल भाषा कौन सी थी—द्रविड़, मुंडा, या कोई ऐसी भाषा जो अब पूरी तरह विलुप्त हो चुकी है।

कंप्यूटर और AI की मदद

हाल के वर्षों में, वैज्ञानिकों ने Artificial Intelligence (AI) और सांख्यिकीय विश्लेषण (Statistical Analysis) का उपयोग करना शुरू किया है। AI ने यह तो पुख्ता किया है कि यह केवल चित्रकारी नहीं बल्कि एक वास्तविक भाषा है क्योंकि इसमें संकेतों का क्रम एक निश्चित व्याकरण का पालन करता है, लेकिन इसका अर्थ क्या है, यह अब भी एक रहस्य है।

मोहरों पर ‘एक सींग वाला पशु’ (Unicorn)

ज्यादातर लिखावट पत्थर की मोहरों (Seals) पर मिली है। इन मोहरों पर अक्सर एक रहस्यमयी एक सींग वाले जानवर (Unicorn) का चित्र होता है। कुछ विद्वान मानते हैं कि ये मोहरें व्यापारियों के पहचान पत्र या सामान पर लगाने वाले लेबल थे।

सिंधु घाटी का वैश्विक व्यापार: ज़मीन और समंदर पर कब्ज़ा

मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक) के साथ गहरा संबंध

सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे मजबूत व्यापारिक संबंध मेसोपोटामिया की ‘सुमेरियन सभ्यता’ के साथ थे।

  • मेलुहा (Meluhha): मेसोपोटामिया के प्राचीन अभिलेखों में एक स्थान का नाम मिलता है जिसे वे ‘मेलुहा’ कहते थे। इतिहासकारों का मानना है कि यह नाम सिंधु घाटी क्षेत्र के लिए ही इस्तेमाल किया गया था।

  • मोहरों का मिलना: मेसोपोटामिया के उर (Ur) और किश (Kish) जैसे शहरों में सिंधु घाटी की मोहरें मिली हैं, जो साबित करती हैं कि यहाँ के व्यापारी वहाँ जाते थे।

किन वस्तुओं का होता था आयात-निर्यात?

सिंधु घाटी एक ‘निर्यात केंद्र’ (Export Hub) की तरह थी:

  • निर्यात (Export): यहाँ से सूती कपड़े (दुनिया में सबसे पहले), हाथीदांत की बनी वस्तुएं, कीमती पत्थर (जैसे लापीस लाजुली और कार्मेलियन), मोतियां और लकड़ियाँ विदेशों में भेजी जाती थीं।

  • आयात (Import): वे मध्य एशिया से चांदी, अफगानिस्तान से टिन और ईरान से सोना मंगाते थे।

लोथल: दुनिया का प्राचीन ‘शिपिंग पोर्ट’

गुजरात का लोथल शहर उस समय का सबसे आधुनिक बंदरगाह था। यहाँ से जहाज़ अरब सागर के रास्ते ओमान, बहरीन और मेसोपोटामिया तक जाते थे। लोथल में एक बड़ी गोदी (Dockyard) मिली है, जहाँ जहाज़ों में सामान लादने और उतारने की उन्नत व्यवस्था थी।

ओमान और बहरीन के साथ व्यापार

हाल के शोधों में ओमान में सिंधु घाटी के मिट्टी के बर्तन मिले हैं। बहरीन (जिसे प्राचीन काल में ‘दिलमुन’ कहा जाता था) एक बिचौलिए (Middleman) के रूप में काम करता था, जहाँ सिंधु घाटी और मेसोपोटामिया के व्यापारी मिलते थे।

व्यापार की वस्तु-विनिमय प्रणाली (Barter System)

उस समय सिक्कों का चलन नहीं था। व्यापार मुख्य रूप से वस्तु-विनिमय (Barter System) के माध्यम से होता था। सिंधु घाटी की मोहरों का उपयोग संभवतः सामान की शुद्धता और मालिकाना हक साबित करने के लिए ‘ब्रांडिंग’ के तौर पर किया जाता था।

मापन की सटीकता

विदेशी व्यापार के लिए उन्होंने वजन करने के बेहद सटीक पत्थर के बाट (Weights) बनाए थे। ये बाट ’16’ के गुणक (Multiples) में होते थे, जिससे व्यापार में ईमानदारी बनी रहती थी।

एक रोचक तथ्य: मेसोपोटामिया के राजा सरगोन (Sargon of Akkad) ने बड़े गर्व से लिखा था कि “मेलुहा (सिंधु घाटी) के जहाज़ मेरे बंदरगाह पर लंगर डालते हैं।”

सिंधु घाटी की महिलाएं: फैशन और समाज की झलक

आभूषणों का शौक (Jewelry)

हड़प्पा की महिलाएं गहनों की बेहद शौकीन थीं। खास बात यह है कि गहने केवल अमीर ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग की महिलाएं पहनती थीं:

  • सामग्री: वे सोने, चांदी, हाथीदांत, तांबे और ‘कार्नैलियन’ (लाल रंग का कीमती पत्थर) के गहने पहनती थीं। गरीब महिलाएं मिट्टी और सीपियों के गहने पहनती थीं।

  • प्रमुख गहने: वे हार (Necklaces), चूड़ियाँ, बाजूबंद, अंगूठियां और झुमके पहनती थीं। कमरबंद (Girdles) भी काफी लोकप्रिय थे।

  • चूड़ियों का शहर: राजस्थान के ‘कालीबंगन’ का नाम ही वहां मिली ढेर सारी ‘काले रंग की चूड़ियों’ के कारण पड़ा है।

सौंदर्य प्रसाधन (Cosmetics और Make-up)

हजारों साल पहले भी महिलाएं आज की तरह ही मेकअप का उपयोग करती थीं:

  • लिपस्टिक और काजल: चन्हुदड़ो की खुदाई में लिपस्टिक के अवशेष मिले हैं। साथ ही, वे आंखों में काजल और सुरमा का इस्तेमाल करती थीं।

  • इत्र (Perfume): वे सुगंधित तेलों और इत्र का उपयोग करना भी जानती थीं।

  • कंघी और दर्पण: हाथीदांत की बनी नक्काशीदार कंघियां और तांबे के बने चमकते हुए दर्पण (Mirrors) पाए गए हैं।

पहनावा (Clothing)

  • वे मुख्य रूप से सूती कपड़े पहनती थीं (सिंधु सभ्यता दुनिया की पहली जगह थी जहाँ कपास उगाया गया)।

  • मूर्तियां दिखाती हैं कि महिलाएं आमतौर पर कमर के नीचे एक छोटा स्कर्ट जैसा कपड़ा (Dhoti style) पहनती थीं और ऊपरी शरीर को शॉल या दुपट्टे से ढकती थीं।

  • बालों की स्टाइल: वे अपने बालों को बहुत खूबसूरती से संवारती थीं। खुदाई में कई ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं जिनमें महिलाओं ने अलग-अलग तरह की चोटियाँ और जूड़े बना रखे हैं।

समाज में स्थिति: मातृसत्तात्मक समाज?

इतिहासकारों का मानना है कि सिंधु समाज में महिलाओं का सम्मान बहुत अधिक था:

  • देवी की पूजा: बड़ी संख्या में ‘मातृदेवी’ (Mother Goddess) की मूर्तियां मिली हैं, जिससे संकेत मिलता है कि समाज संभवतः मातृसत्तात्मक (Matriarchal) था, यानी परिवार और समाज में महिलाओं की मुख्य भूमिका थी।

  • नृत्य और कला: प्रसिद्ध ‘कांस्य की नर्तकी’ (Dancing Girl) की मूर्ति यह दर्शाती है कि समाज में संगीत और नृत्य जैसे सांस्कृतिक कार्यों में महिलाएं बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं।

मनोरंजन और काम

महिलाएं घर के काम के साथ-साथ कताई, बुनाई और मिट्टी के बर्तन बनाने का काम भी करती थीं। मनोरंजन के लिए वे पासा (Dice) खेलने या संगीत का आनंद लेती थीं।

एक खास बात: सिंधु घाटी के गहनों की फिनिशिंग इतनी बारीक थी कि आज के जौहरी भी उन्हें देखकर हैरान रह जाते हैं। विशेष रूप से मोतियों में छेद करने की उनकी तकनीक बेमिसाल थी।

सिंधु घाटी की अमर कला: रहस्यमयी मूर्तियों की कहानी

‘डांसिंग गर्ल’ (कांस्य की नर्तकी)

मोहनजोदड़ो से मिली यह 4.5 इंच की छोटी सी मूर्ति दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहरों में से एक है।

  • तकनीक (Lost Wax Process): इसे ‘लॉस्ट वैक्स’ तकनीक से बनाया गया था। यानी पहले मोम की मूर्ति बनाई गई, फिर उस पर मिट्टी चढ़ाई गई और बाद में पिघला हुआ कांस्य (Bronze) डाला गया। आज से 4500 साल पहले इतनी जटिल इंजीनियरिंग हैरान करने वाली है।

  • अंदाज और आत्मविश्वास: मूर्ति की मुद्रा (एक हाथ कमर पर और शरीर थोड़ा मुड़ा हुआ) एक पेशेवर नर्तकी के आत्मविश्वास को दर्शाती है।

  • चूड़ियाँ: उसने अपने बाएं हाथ में ऊपर तक चूड़ियाँ पहनी हुई हैं, जो आज भी राजस्थान और गुजरात की कई जनजातियों के पहनावे में दिखाई देती हैं। यह सांस्कृतिक निरंतरता का एक बड़ा उदाहरण है।

‘प्रीस्ट किंग’ (पुरोहित राजा)

पत्थर (Steatite) से बनी यह मूर्ति एक गंभीर और प्रभावशाली व्यक्ति की है। इसके पीछे कई थ्योरी हैं:

  • पहनावा: इन्होंने एक शॉल ओढ़ रखा है जिस पर ‘तिपतिया’ (Trefoil) डिजाइन बना हुआ है। यह डिजाइन उस समय मेसोपोटामिया और मिस्र में राजसी ठाठ-बाट का प्रतीक माना जाता था।

  • दाढ़ी और संवार: इनकी दाढ़ी बहुत सलीके से संवारी गई है, जो यह बताती है कि उस समय ‘ग्रूमिंग’ का कितना महत्व था।

  • शासक या पुजारी? क्योंकि इस सभ्यता में कोई महल या मंदिर नहीं मिले, इसलिए विद्वान मानते हैं कि शायद समाज का मुखिया कोई ‘पुरोहित’ (Priest) ही होता था जो धर्म और शासन दोनों संभालता था।

‘मदर गॉड्रेस’ (मातृदेवी)

मिट्टी (Terracotta) से बनी ये मूर्तियां लगभग हर घर से मिली हैं।

  • शक्ति का प्रतीक: इनके सिर पर एक पंखे जैसी बड़ी टोपी है। इतिहासकारों का मानना है कि ये ‘प्रकृति की देवी’ या ‘उर्वरता की देवी’ थीं।

  • इससे यह स्पष्ट होता है कि सिंधु के लोग प्रकृति और स्त्री शक्ति की पूजा करते थे।

पशुपति मोहर (The Proto-Shiva)

एक मोहर पर एक योगी की आकृति मिली है, जो ध्यान की मुद्रा में बैठे हैं और उनके चारों ओर जानवर (हाथी, बाघ, गैंडा और भैंसा) हैं।

  • शिव का शुरुआती रूप: कई विद्वान इसे भगवान शिव का ‘पशुपति’ रूप मानते हैं। यह मूर्ति उस समय के आध्यात्मिक झुकाव और योग के ज्ञान की ओर इशारा करती है।

खिलौने और पशु मूर्तियाँ

खुदाई में मिट्टी की बनी गाड़ियाँ, सीटी (Whistles) और हिलने वाली गर्दन वाले बैल मिले हैं।

  • यह दर्शाता है कि वे लोग अपने बच्चों के मनोरंजन का कितना ख्याल रखते थे। उनकी कला केवल अमीरों के लिए नहीं, बल्कि बच्चों के खेलने के लिए भी उपलब्ध थी।

एक रोचक तथ्य: ‘डांसिंग गर्ल’ की मूर्ति को देखकर प्रसिद्ध ब्रिटिश पुरातत्वविद सर मॉर्टिमर व्हीलर ने कहा था— “जब मैंने इसे पहली बार देखा, तो मुझे विश्वास नहीं हुआ कि यह प्रागैतिहासिक है। यह इतनी सजीव लगती है।”

सिंधु घाटी का खेल संसार: क्या उन्होंने ही खोजा था ‘शतरंज’?

शतरंज का प्राचीन रूप (Early Chess)

लोथल और मोहनजोदड़ो की खुदाई में पत्थर और मिट्टी के बने ‘बोर्ड गेम’ के अवशेष मिले हैं, जो काफी हद तक आधुनिक शतरंज (Chess) से मिलते-जुलते हैं।

  • शतरंज की गोटियाँ: वहां से हाथीदांत और पत्थर की ऐसी गोटियाँ मिली हैं जो आज के ‘राजा’ और ‘वज़ीर’ जैसी दिखती हैं।

  • हालांकि, आधुनिक शतरंज (चतुरंग) गुप्त काल में विकसित हुआ, लेकिन इसका ‘प्रोटो-टाइप’ (शुरुआती ढांचा) सिंधु घाटी में ही तैयार हो गया था।

पासा (Dice) का खेल

हड़प्पावासी पासे के खेल के दीवाने थे। खुदाई में बड़ी संख्या में पासे मिले हैं, जो आज के पासों से बहुत अलग नहीं हैं।

  • सटीक बनावट: उनके पासे घन (Cube) के आकार के होते थे और उन पर 1 से 6 तक के अंक (बिंदु) खुदे होते थे।

  • मज़ेदार बात यह है कि उन पासों के अंकों का लेआउट आज के पासों जैसा ही था, जो उनकी गणितीय समझ को दर्शाता है।

शिकार और मछली पकड़ना

मनोरंजन के साथ-साथ अपनी जरूरतों के लिए वे शिकार (Hunting) और मछली पकड़ने के भी शौकीन थे। खुदाई में तांबे के बने मछली पकड़ने के कांटे (Fish hooks) बड़ी संख्या में मिले हैं।

बच्चों के खिलौने: कला और विज्ञान का मेल

हड़प्पा के बच्चे उस समय के सबसे ‘एडवांस’ खिलौनों से खेलते थे:

  • मिट्टी की गाड़ियाँ: पहिए वाली बैलगाड़ियाँ जो आज के ‘टॉय कार’ जैसी थीं।

  • हिलने वाले खिलौने: ऐसे बैल जिनकी गर्दन धागा खींचने पर हिलती थी।

  • सीटियां (Whistles): पक्षियों के आकार की मिट्टी की सीटियां, जिनमें फूंक मारने पर आवाज़ आती थी।

  • कंचे (Marbles): पत्थर और मिट्टी के गोल कंचे भी मिले हैं, जो बताते हैं कि ‘कंचे खेलना’ हज़ारों साल पुराना खेल है।

नृत्य और संगीत

जैसा कि ‘डांसिंग गर्ल’ की मूर्ति से पता चलता है, नृत्य उनके जीवन का अहम हिस्सा था। इसके अलावा, खुदाई में ढोलक (Drums) और झांझ (Cymbals) जैसे वाद्यों के चित्र और अवशेष भी मिले हैं, जो उनके संगीत प्रेम की पुष्टि करते हैं।

निष्कर्ष: एक खुशहाल सभ्यता

इन खेलों से पता चलता है कि सिंधु घाटी का समाज केवल अस्तित्व बचाने के संघर्ष में नहीं लगा था, बल्कि उनके पास खाली समय (Leisure time) था और वे एक तनावमुक्त और आनंदमयी जीवन जीते थे।

नोट : यह जानकारी विभिन्न श्रोतों से एकत्रित की गई है, जिसमें प्रतिष्ठित मीडिया रिपोर्ट्स भी शामिल हैं.

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