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मंदिर में गैर हिंदुओं का प्रवेश नियम: मद्रास हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, कहा— ‘सिर्फ जन्म से तय नहीं होती आस्था’

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चेन्नई । बुधवार, 1 जुलाई 2026

तमिलनाडु से धार्मिक स्वतंत्रता और समावेशी परंपरा को लेकर एक बड़ा कानूनी और सामाजिक फैसला सामने आया है। मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने एक मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा और सच्ची श्रद्धा से हिंदू धर्म अपनाता है, तो उसे सिर्फ उसके जन्म, नाम या विदेशी राष्ट्रीयता के आधार पर मंदिर में प्रवेश करने से वंचित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति भारथा चक्रवर्ती की एकल पीठ ने तमिलनाडु के हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE Department) के उस आदेश को अवैध करार दिया, जिसमें एक अमेरिकी महिला को “ईसाई” मानते हुए मंदिर के गर्भगृह या मुख्य परिसर में जाने से रोकने की सलाह दी गई थी।

क्या था पूरा मामला? (लॉरा फ्रांसेस बनाम HR&CE विभाग)

यह पूरा मामला अमेरिकी नागरिक लॉरा फ्रांसेस अयंगर (Laura Frances Iyengar) से जुड़ा है। लॉरा पिछले कई वर्षों से हिंदू धर्म के प्रति आकर्षित थीं और पूरी श्रद्धा के साथ इस धर्म का पालन कर रही हैं। उन्होंने भारत के कई प्रमुख मंदिरों की यात्रा की है और वीज़ा आवेदनों सहित अपने सभी आधिकारिक दस्तावेजों में भी खुद को ‘हिंदू’ बताया है।

17 सितंबर 2023 को लॉरा ने तंजावुर जिले के करप्पनकाडु में स्थित ऐतिहासिक श्री अरुलमिगु अभिष्ट वरदराजपेरुमल मंदिर (Sri Arulmighu Abishta Varatharajaperumal Temple) में वरधा बालाजी वेंकटकृष्णन नाम के एक हिंदू व्यक्ति से पूरे रीति-रिवाज के साथ विवाह किया था। दिलचस्प बात यह है कि उनके पति के दादाजी भी कभी इसी मंदिर के ट्रस्टी रह चुके थे।

विवाद की वजह: हाल ही में जब लॉरा इस मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचीं, तो कुछ स्थानीय लोगों और मंदिर प्रशासन ने उनके नाम (लॉरा फ्रांसेस) और अमेरिकी नागरिकता को देखकर उन्हें “गैर-हिंदू” मान लिया। HR&CE विभाग ने तर्क दिया कि विदेशी होने के कारण उन्हें केवल बाहरी परिसर में रहने की सलाह दी गई थी। इस भेदभाव के खिलाफ लॉरा ने हार नहीं मानी और मद्रास हाईकोर्ट का रुख किया।

मद्रास हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां: ‘हिंदू धर्म में सर्टिफिकेट की जरूरत नहीं’

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति भारथा चक्रवर्ती ने मंदिर प्रशासन और सरकार के रवैये पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण कानूनी और व्यावहारिक बातें कहीं:

  • आचरण और आस्था ही प्रमाण है: कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता महिला की जीवनशैली, उनके आचरण और आधिकारिक दस्तावेजों से स्पष्ट है कि उन्होंने हिंदू धर्म को पूरी तरह स्वीकार किया है। महज उनका नाम या अमेरिकी नागरिकता उनकी आस्था पर सवाल उठाने का आधार नहीं बन सकती।

  • सर्टिफिकेट की बाध्यता नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया, “हिंदू धर्म ऐतिहासिक रूप से बेहद समावेशी और उदार रहा है। अन्य कुछ धर्मों की तरह इसमें किसी औपचारिक धर्म परिवर्तन समारोह (Conversion Ceremony) या किसी आधिकारिक प्रमाणपत्र (Certificate) की अनिवार्यता नहीं है।”

  • समान अधिकार: कोर्ट ने आदेश दिया कि लॉरा फ्रांसेस को वो सभी अधिकार मिलेंगे जो किसी भी अन्य सामान्य हिंदू महिला श्रद्धालु को मिलते हैं। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि वह किसी विशेष विशेषाधिकार (Special Privilege) का दावा नहीं कर सकतीं।

संवैधानिक मूल्यों और धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान जरूरी

अदालत ने तंजावुर के इस मंदिर प्रशासन और HR&CE विभाग को सख्त निर्देश दिया है कि वे महिला को बिना किसी बाधा के मंदिर में प्रवेश और दर्शन करने दें। कोर्ट ने रेखांकित किया कि देश के कानून और संविधान के तहत हर उस व्यक्ति को पूजा का समान अधिकार है जो संबंधित धर्म में वास्तविक विश्वास रखता है।

धार्मिक संस्थाओं को हठधर्मिता से ऊपर उठकर संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करना चाहिए। यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक मिसाल है जो जन्म से हिंदू न होने के बावजूद सनातन परंपरा को अपनाते हैं और उसे अपना जीवन समर्पित करते हैं।

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