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आदित्य धर की ‘धुरंधर’ का बॉक्स ऑफिस पर धमाका: प्रोपेगेंडा के आरोपों पर जावेद अख्तर का करारा जवाब

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धुरंधर फिल्म पोस्टर रणवीर सिंह के साथ।

मुंबई । सोमवार, 4 मई 2026

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी आती हैं जो न केवल नोटों की बारिश करती हैं, बल्कि समाज और बौद्धिक जगत को दो हिस्सों में बांट देती हैं। आदित्य धर के निर्देशन में बनी ‘धुरंधर’ फ्रेंचाइजी ऐसी ही एक मिसाल बनकर उभरी है। जहां रणवीर सिंह, आर माधवन और अक्षय खन्ना के अभिनय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया, वहीं फिल्म की विचारधारा को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है।

बॉक्स ऑफिस पर ‘धुरंधर’ का सुनामी जैसा सफर

इस फ्रेंचाइजी ने कमाई के वो आंकड़े छुए हैं जो कभी नामुमकिन लगते थे।

  • धुरंधर (पार्ट 1): इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी और ₹1300 करोड़ से अधिक का ग्लोबल बिजनेस किया।

  • धुरंधर 2: दूसरे भाग ने अपनी सफलता को और ऊंचाई दी और ₹1788 करोड़ बटोर कर इतिहास रच दिया।

फिल्म की सफलता का श्रेय आदित्य धर के विजन और रणवीर सिंह की स्क्रीन प्रेजेंस को दिया जा रहा है। राकेश बेदी और आर माधवन जैसे कलाकारों ने कहानी में जो गहराई जोड़ी, उसने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा।

प्रोपेगेंडा के आरोपों पर जावेद अख्तर की बेबाक राय

हाल ही में कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम में जब मशहूर गीतकार और लेखक जावेद अख्तर से फिल्म को ‘प्रोपेगेंडा’ कहे जाने पर सवाल किया गया, तो उनका जवाब काफी संतुलित और तार्किक था।

अख्तर ने कहा, “मुझे सच में नहीं पता कि प्रोपेगेंडा का असली मतलब क्या निकाला जा रहा है। मेरे लिए ‘धुरंधर’ एक बेहतरीन फिल्म है। हालांकि लोग दूसरे पार्ट की चर्चा कर रहे हैं, लेकिन मुझे व्यक्तिगत तौर पर इसका पहला भाग अधिक पसंद आया।”

उन्होंने आगे विचारधारा पर बात करते हुए कहा कि हर कहानी का अपना एक पक्ष होता है। किसी फिल्म को सिर्फ इसलिए प्रोपेगेंडा कहना गलत है क्योंकि उसका नैरेटिव किसी खास वर्ग को पसंद नहीं आ रहा। उन्होंने जोर दिया कि हर फिल्ममेकर के पास अपनी विचारधारा को व्यक्त करने की आजादी होनी चाहिए।

निष्कर्ष: कला बनाम विचारधारा

जावेद अख्तर के इस बयान ने फिल्म जगत में एक नई चर्चा शुरू कर दी है। क्या एक फिल्म को केवल उसकी कलात्मकता और मनोरंजन के आधार पर देखा जाना चाहिए, या उसके पीछे छिपे राजनीतिक संदेश को तौलना जरूरी है? फिलहाल, ‘धुरंधर’ की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि जनता को कहानी पसंद आ रही है, चाहे आलोचक उसे कोई भी नाम दें।

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