नई दिल्ली. ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामनेई की मृत्यु के बाद भारत सरकार ने औपचारिक रूप से अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। गुरुवार को भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने नई दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास का दौरा किया। वहां उन्होंने ईरान के राजदूत से मुलाकात की और कंडोलेंस रजिस्टर (शोक पुस्तिका) पर हस्ताक्षर कर भारत की ओर से गहरा दुख प्रकट किया।
कूटनीतिक बदलाव के संकेत
रविवार को तेहरान में अमेरिका और इज़रायल द्वारा की गई एयर स्ट्राइक में खामनेई की मौत के बाद भारत के इस कदम को कूटनीतिक हलकों में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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सॉफ्ट स्टैंड: शुरुआत में भारत ने इन हमलों की सीधी निंदा करने से परहेज किया था, लेकिन अब कंडोलेंस रजिस्टर पर हस्ताक्षर करना ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंधों को बनाए रखने की दिशा में एक कदम देखा जा रहा है।
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विपक्ष का रुख: कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दल लगातार केंद्र सरकार पर दबाव बना रहे थे कि दशकों पुराने मित्र देश ईरान के प्रति भारत को अपना रुख स्पष्ट करना चाहिए।
शांति और कूटनीति पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में तेजी से बिगड़ते हालातों पर चिंता व्यक्त की है। प्रधानमंत्री ने दोहराया कि भारत किसी भी सैन्य संघर्ष के खिलाफ है और हमेशा ‘बातचीत और कूटनीति’ के माध्यम से समाधान निकालने का पक्षधर रहा है।
“भारत क्षेत्र में शांति और स्थिरता का समर्थक है। किसी भी विवाद का अंत केवल कूटनीतिक संवाद से ही संभव है।” — प्रधानमंत्री मोदी (संक्षिप्त संदेश)
भारत-ईरान संबंधों का गणित
भारत और ईरान के बीच आर्थिक संबंध काफी गहरे रहे हैं, हालांकि हाल के वर्षों में इसमें उतार-चढ़ाव देखा गया है:
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ऊर्जा निर्भरता: एक समय भारत अपनी कुल तेल खपत का 13% हिस्सा ईरान से आयात करता था।
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प्रतिबंधों का असर: ‘ईरान न्यूक्लियर डील’ (JCPOA) से अमेरिका के बाहर निकलने और उसके बाद लगाए गए कड़े आर्थिक प्रतिबंधों के चलते भारत और ईरान के बीच व्यापारिक गतिविधियों में भारी कमी आई थी।
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रणनीतिक महत्व: व्यापार के अलावा, चाबहार बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट्स के कारण ईरान भारत के लिए मध्य एशिया का द्वार माना जाता है।
इस घटना के बाद अब वैश्विक नजरें भारत की अगली रणनीति पर टिकी हैं कि वह इज़रायल-अमेरिका और ईरान के बीच इस बढ़ते तनाव में अपनी संतुलित विदेश नीति को कैसे आगे बढ़ाता है।
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