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उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड खत्म: 274 मदरसों के पास जमीन के कागज नहीं, मान्यता पर मंडराया संकट

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उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण की देहरादून में बैठक

देहरादून।रविवार, 5 जुलाई 2026

उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी सरकार द्वारा ‘एक राष्ट्र-एक शिक्षा’ नीति के तहत 1 जुलाई 2026 से उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है। इसके साथ ही राज्य के सभी 456 पंजीकृत मदरसों को अब नवगठित उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USMEA) के नियमों का पालन करना अनिवार्य हो गया है।

प्राधिकरण के अस्तित्व में आते ही राज्य के मदरसों के सामने भूमि स्वामित्व (Land Ownership) को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सूबे के 456 मदरसों में से केवल 182 मदरसों के पास ही अपनी भूमि के वैध मालिकाना हक के दस्तावेज मौजूद हैं। शेष 274 मदरसों के पास जमीन के स्पष्ट कागजात नहीं हैं, जिसके चलते उनकी मान्यता रद्द होने का खतरा बढ़ गया है।

क्या है पूरा मामला?

समाचार रिपोर्टों के विश्लेषण और नियमावली के अनुसार, पूर्व में चल रहे 456 मदरसों की व्यवस्था में अब व्यापक प्रशासनिक सुधार किए गए हैं:

  1. भूमि की स्थिति: जिन 182 मदरसों के पास भूमि का विवरण है, उनमें से 170 शिक्षा विभाग से मान्यता लेकर पहले से संचालित हैं, जबकि 12 की संपत्ति उत्तराखंड वक्फ बोर्ड में दर्ज है।

  2. 274 मदरसों पर तलवार: शेष 274 मदरसों को यदि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान के तौर पर जूनियर हाईस्कूल या इंटर कॉलेज के रूप में आगे संचालित होना है, तो उन्हें भूमि के वैध दस्तावेज प्राधिकरण के पोर्टल पर देने ही होंगे। नए नियम के तहत भूमि का स्वामित्व सीधे शिक्षण संस्थान (मदरसे) के नाम होना अनिवार्य शर्त है।

  3. सभी अल्पसंख्यक समुदाय शामिल: यह नियम केवल मुस्लिम समुदाय के मदरसों पर ही नहीं, बल्कि राज्य के सभी छह अधिसूचित अल्पसंख्यक समुदायों (मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी) के शिक्षण संस्थानों पर समान रूप से लागू होगा।

नई व्यवस्था के तहत मान्यता के कड़े मानदंड

उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत सिंह गांधी के अनुसार, अब किसी भी मदरसे या अल्पसंख्यक स्कूल को मान्यता देने से पहले कड़े मानकों से गुजरना होगा। प्राधिकरण मुख्य रूप से निम्नलिखित बिंदुओं की गहनता से पड़ताल करेगा:

  • अल्पसंख्यक पहचान और सामाजिक सौहार्द: संस्थान की अल्पसंख्यक पात्रता के साथ-साथ यह भी देखा जाएगा कि वह सामाजिक ताने-बाने और सौहार्द को बनाए रखने के प्रति कितना प्रतिबद्ध है।

  • स्टाफ की योग्यता और इंफ्रास्ट्रक्चर: मदरसों में अब राज्य शिक्षा विभाग का आधुनिक पाठ्यक्रम (विज्ञान, गणित, भूगोल) लागू करना अनिवार्य है। इसके लिए योग्य स्टाफ और पर्याप्त भवन होना जरूरी है। सभी मदरसों को यू-डायस (UDISE) नंबर से जोड़ा गया है।

  • भौतिक निरीक्षण (Physical Verification): केवल कागजी दावों पर भरोसा नहीं किया जाएगा; प्राधिकरण की टीम मौके पर जाकर संपत्तियों और व्यवस्थाओं का भौतिक निरीक्षण भी कर सकती है।

  • सीमित समय के लिए मान्यता: अब दी जाने वाली मान्यता केवल तीन शैक्षणिक वर्षों के लिए ही वैध होगी। इसका नवीनीकरण (Renewal) कराने के लिए समयसीमा समाप्त होने से कम से कम 3 महीने पहले ऑनलाइन आवेदन करना होगा।

जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने जताया विरोध

मदरसा बोर्ड को पूरी तरह समाप्त करने के धामी सरकार के इस युगांतकारी फैसले का जहां एक ओर स्वागत हो रहा है, वहीं दूसरी ओर मुस्लिम संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सरकार के इस कदम को केवल प्रशासनिक बदलाव न मानकर धार्मिक और शैक्षिक अधिकारों में दखल बताया है और इस फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग की है।

हालांकि, सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक शिक्षा की मुख्यधारा से बच्चों को जोड़ने के लिए मानकों में कोई ढील नहीं दी जाएगी। बिना वैध पंजीकरण और भूमि स्वामित्व के कोई भी मदरसा अब राज्य में संचालित नहीं हो सकेगा।

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