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पश्चिम बंगाल के बाद अब झारखंड भाजपा का ‘अधूरा एजेंडा’: हिमंत बिस्वा सरमा ने खोला 2026 की रणनीति का पूरा खाका

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धनबाद । सोमवार, 6 जुलाई 2026

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऐतिहासिक और प्रचंड जीत के बाद पूर्वी भारत की राजनीति में बड़ा भूचाल आ गया है। इस जीत के तुरंत बाद, झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 के सह-प्रभारी और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने झारखंड की राजनीति को लेकर एक बहुत बड़ा रणनीतिक संदेश दिया है। एक शीर्ष राष्ट्रीय मीडिया कार्यक्रम में बोलते हुए सरमा ने स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल की फतह के बाद अब भाजपा का अगला और सबसे मुख्य लक्ष्य झारखंड को जीतना है, जिसे उन्होंने पार्टी का ‘अधूरा एजेंडा’ करार दिया।

2024 के चुनाव में मिली शिकस्त की कसक को स्वीकार करते हुए हिमंत बिस्वा सरमा ने न केवल हार के आंतरिक व बाहरी कारणों की समीक्षा की, बल्कि राज्य में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Change) को लेकर भी गंभीर चिंताएं जाहिर की हैं।

झारखंड में क्यों हारी थी भाजपा? सरमा ने किया बड़ी कमियों का खुलासा

वर्ष 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान चुनाव प्रभारी और हिमंत बिस्वा सरमा सह-प्रभारी की भूमिका में थे। दोनों ही कद्दावर नेताओं ने चुनावी मैदान में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं रहे।

अब दो साल बाद सरमा ने इस हार के मुख्य तकनीकी और रणनीतिक कारणों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है:

  1. गठबंधन के स्तर पर रणनीतिक चूक: सरमा ने माना कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के स्तर पर टिकटों के बंटवारे, आपसी समन्वय और सांगठनिक स्तर पर कुछ ऐसी कमियां रह गईं, जिसके कारण पार्टी सत्ता की दहलीज तक नहीं पहुंच सकी।

  2. वोट कटवा दलों का उभार (JLKM फैक्टर): सरमा ने सीधे तौर पर जयराम महतो की पार्टी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) का नाम लिए बिना बड़ा इशारा किया। उन्होंने कहा कि कुछ नए दलों द्वारा चुनाव में बड़े पैमाने पर वोट काटे गए। मुख्य रूप से भाजपा और आजसू (AJSU) के पारंपरिक माने जाने वाले कुर्मी (महतो) मतदाताओं में जेएलकेएम ने भारी सेंधमारी की, जिसने सीधे तौर पर झामुमो (JMM) गठबंधन को फायदा पहुंचाया।

पूर्वी भारत का इकलौता किला, जिसे भेदना चाहती है भाजपा

हिमंत बिस्वा सरमा ने पूर्वी भारत का राजनीतिक नक्शा खींचते हुए कहा, “असफलता ही सफलता का सबसे मजबूत स्तंभ होती है। आज की तारीख में अगर आप देखें, तो असम, ओडिशा और अब पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी भारत के लगभग हर राज्य में भाजपा की मजबूत मौजूदगी या सरकार है। केवल झारखंड ही एक ऐसा राज्य बचा है, जहां भाजपा सत्ता से बाहर है।”

उन्होंने साफ किया कि अब केंद्रीय नेतृत्व का पूरा ध्यान और संसाधन झारखंड पर केंद्रित किए जाएंगे ताकि आगामी चुनावों में पार्टी पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर सके।

डेमोग्राफिक बदलाव और अंतरराष्ट्रीय सीमा का मुद्दा: पहचान बचाने की जंग

असम के मुख्यमंत्री ने झारखंड के सामाजिक और भौगोलिक ताने-बाने पर एक बार फिर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि झारखंड को अपनी मूल आदिवासी पहचान बचाने के लिए भाजपा की सख्त जरूरत है।

सरमा ने एक बेहद संवेदनशील सुरक्षा मुद्दे को उठाते हुए कहा कि बहुत से लोग इस भौगोलिक हकीकत से अनजान हैं कि झारखंड के कई जिले अंतरराष्ट्रीय सीमाओं (विशेषकर बांग्लादेश सीमा के प्रभाव क्षेत्र) और पश्चिम बंगाल के संवेदनशील इलाकों के बेहद करीब हैं। उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद मार्ग का उपयोग कर बड़ी संख्या में घुसपैठिए झारखंड के संताल परगना और अन्य सीमावर्ती जिलों में दाखिल हो रहे हैं।

इस अवैध प्रवास के कारण राज्य की जनसांख्यिकी (Demography) तेजी से बदल रही है, जो स्थानीय आदिवासियों के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन और उनके गौरव के लिए एक बड़ा खतरा है। सरमा के अनुसार, इस खतरे को केवल भाजपा की राष्ट्रवाद से प्रेरित सरकार ही रोक सकती है।

2026 में बदली राजनीतिक हवा: भाजपा का दावा

पश्चिम बंगाल में मिली ऐतिहासिक कामयाबी ने झारखंड भाजपा के कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है। हिमंत बिस्वा सरमा ने पूरे आत्मविश्वास के साथ दावा किया कि पिछली गलतियों और गठबंधन की कमियों से सबक लेते हुए भाजपा ने जमीन पर काम शुरू कर दिया है। वोट बैंक की सेंधमारी को रोकने और आदिवासियों व मूलवासियों के बीच पैठ मजबूत करने के लिए एक नया ब्लूप्रिंट तैयार किया गया है। उन्होंने भरोसा जताया कि झारखंड में अगली सरकार निश्चित रूप से भाजपा और उसके सहयोगियों की ही बनेगी।

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