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व्यापार से स्वराज तक: आधुनिक भारत का उदय

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पुस्तक का शीर्षक: 

अध्याय 1: नीले जल की नीति और व्यापारियों का आगमन

  • यूरोपीय शक्तियों का होड़: वास्कोडिगामा का आगमन और पुर्तगाली, डच, फ्रांसीसी एवं अंग्रेजों के बीच प्रतिस्पर्धा।

  • ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना: 1600 का रॉयल चार्टर और जहांगीर के दरबार में थॉमस रो।

  • व्यापारिक चौकियां: सूरत, मद्रास, बॉम्बे और कलकत्ता में शुरुआती बस्तियाँ।

अध्याय 2: विजय की शुरुआत – प्लासी से बक्सर तक

  • बंगाल का संघर्ष: सिराजुद्दौला और 1757 की प्लासी की लड़ाई (विश्वासघात की कहानी)।

  • बक्सर का युद्ध (1764): कंपनी की सैन्य श्रेष्ठता की पुष्टि और ‘दीवानी’ अधिकारों की प्राप्ति।

  • द्वैध शासन: बंगाल में लूट और प्रशासनिक अराजकता।

अध्याय 3: साम्राज्य का विस्तार और रियासतों का विलय

  • मैसूर और मराठा युद्ध: हैदर अली, टीपू सुल्तान और मराठा संघ के साथ संघर्ष।

  • लॉर्ड डलहौजी की नीतियां: ‘व्यपगत का सिद्धांत’ (Doctrine of Lapse) और राज्यों का जबरन विलय।

  • सहायक संधि (Subsidiary Alliance): भारतीय राजाओं को सुरक्षा के नाम पर शक्तिहीन करना।

अध्याय 4: 1857 का महासंग्राम – प्रथम स्वतंत्रता संग्राम

  • विद्रोह के कारण: आर्थिक शोषण, धार्मिक हस्तक्षेप (चर्बी वाले कारतूस) और राजनीतिक असंतोष।

  • प्रमुख नायक: झांसी की रानी, तांत्या टोपे, बहादुर शाह जफर और कुंवर सिंह।

  • परिणाम: ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत और ब्रिटिश क्राउन का सीधा नियंत्रण।

अध्याय 5: सामाजिक-धार्मिक पुनर्जागरण और राष्ट्रवाद का उदय

  • सुधार आंदोलन: राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती और ज्योतिबा फुले का योगदान।

  • मध्यम वर्ग का उदय: आधुनिक शिक्षा और पश्चिमी विचारों का प्रभाव।

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885): ए.ओ. ह्यूम और शुरुआती उदारवादी नेता।

अध्याय 6: बंग-भंग और क्रांतिकारी राष्ट्रवाद

  • बंगाल विभाजन (1905): लॉर्ड कर्जन की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति।

  • स्वदेशी आंदोलन: विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और ‘लाल-बाल-पाल’ की तिकड़ी।

  • क्रांतिकारी गतिविधियां: खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी और गदर पार्टी।

अध्याय 7: गांधी युग और जन आंदोलन

  • महात्मा गांधी का आगमन: दक्षिण अफ्रीका से वापसी और चंपारण, खेड़ा सत्याग्रह।

  • असहयोग और खिलाफत: जलियांवाला बाग हत्याकांड के बाद देशव्यापी उबाल।

  • सविनय अवज्ञा: दांडी मार्च और नमक कानून का उल्लंघन।

अध्याय 8: विश्व युद्ध और ‘भारत छोड़ो’ की हुंकार

  • द्वितीय विश्व युद्ध का प्रभाव: क्रिप्स मिशन की विफलता और अगस्त क्रांति (1942)।

  • आजाद हिंद फौज: सुभाष चंद्र बोस और “दिल्ली चलो” का नारा।

  • शाही नौसेना विद्रोह: ब्रिटिश सत्ता की नींव का हिलना।

अध्याय 9: विभाजन की त्रासदी और स्वतंत्रता का सूर्योदय

  • माउंटबेटन योजना: भारत का विभाजन और पाकिस्तान का जन्म।

  • 15 अगस्त 1947: ‘नियति से साक्षात्कार’ (Tryst with Destiny) और आजादी की घोषणा।

  • रियासतों का एकीकरण: सरदार पटेल की भूमिका और नए संविधान की नींव।

अध्याय 4.1: 1857 से पूर्व का संघर्ष – एक अनवरत ज्वाला

आमतौर पर यह माना जाता है कि स्वतंत्रता का संघर्ष 1857 से शुरू हुआ, लेकिन सत्य यह है कि प्लासी के युद्ध (1757) के बाद से ही भारतीय वीरों ने अंग्रेजों को चैन की सांस नहीं लेने दी।

  • चुआड़ विद्रोह (1769-1805): रघुनाथ महतो के नेतृत्व में झारखंड के आदिवासियों का संघर्ष।

  • सन्यासी विद्रोह (1770-1820): बंगाल और आसपास के क्षेत्रों में सन्यासियों का सशस्त्र प्रतिरोध।

  • पाइक विद्रोह (1817): ओडिशा में बख्शी जगबंधु के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध बिगुल।

कोटेशन: “स्वतंत्रता कभी भी उपहार में नहीं मिलती, इसे अपने रक्त और शौर्य से अर्जित करना पड़ता है।” — (प्राचीन भारतीय योद्धाओं का दर्शन)

अध्याय 4.2: क्रांति की पृष्ठभूमि – षड्यंत्र और सिद्धांत

1857 की क्रांति अचानक नहीं हुई, बल्कि अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों का परिणाम थी। लॉर्ड वेलेजली की सहायक संधि और लॉर्ड डलहौजी के व्यपगत के सिद्धांत (Doctrine of Lapse) ने भारतीय शासकों में भारी रोष भर दिया था।

क्रांति की गुप्त योजना:

  • प्रतीक: ‘रोटी और कमल’ का अभियान।

  • रणनीति: 31 मई 1857 की तिथि तय की गई, ताकि भीषण गर्मी और रविवार के अवकाश का लाभ उठाया जा सके।

  • वैचारिक नेतृत्व: स्वामी दयानंद सरस्वती ने लोगों में स्वराज्य और स्वदेशी की भावना जगाई।

कोटेशन: “स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।” — (बाल गंगाधर तिलक, जिनके विचारों की नींव स्वामी दयानंद ने रखी थी)

अध्याय 4.3: रणबांकुरों की शौर्य गाथा

1. बाबू कुंवर सिंह: 80 वर्ष का युवा जोश

बिहार के जगदीशपुर के इस वीर ने उम्र को मात देते हुए अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। जब हाथ में गोली लगी, तो स्वयं ही उसे काटकर गंगा में प्रवाहित कर दिया।

2. रानी लक्ष्मीबाई और झलकारी बाई: शक्ति का साक्षात रूप

रानी लक्ष्मीबाई ने केवल युद्ध नहीं लड़ा, बल्कि महिला सेना ‘दुर्गा दल’ का गठन किया। यहाँ झलकारी बाई की भूमिका अतुलनीय है, जिन्होंने रानी का वेश धरकर अंग्रेजों को उलझाए रखा और रानी को सुरक्षित निकाला।

कोटेशन: “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।” — सुभद्रा कुमारी चौहान

3. पेशवा नाना साहब और तात्या टोपे: अटूट मित्रता और रणनीति

नाना साहब ने जहाँ कूटनीतिक मोर्चे पर अंग्रेजों को घेरा, वहीं तात्या टोपे ने अपनी छापामार युद्ध नीति से ब्रिटिश सेना की नाक में दम कर दिया।

अध्याय 4.4: विस्मृत वीरांगनाएं – नारी शक्ति का उद्घोष

इस युद्ध में केवल प्रसिद्ध नाम ही नहीं, बल्कि गाँव-गाँव से महिलाएँ उठ खड़ी हुई थीं।

  • आशा देवी: मुजफ्फरनगर में 250 महिलाओं के साथ बलिदान दिया।

  • महारानी तपस्विनी: जेल से छूटने के बाद नेपाल में क्रांतिकारियों के लिए गोला-बारूद बनाया।

  • रानी अवंतीबाई: रामगढ़ की रानी जिन्होंने “चूड़ियाँ पहन लो या युद्ध करो” का संदेश भेजकर सोए हुए राजाओं को जगाया।

कोटेशन: “स्त्री जब शस्त्र उठाती है, तो वह केवल अपने साम्राज्य की नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के आत्मसम्मान की रक्षा करती है।”

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