शनिवार, सितंबर 19 2026 | 05:34:39 PM

सबरीमाला पर केंद्र का बड़ा दांव: “2018 का फैसला कानूनी रूप से गलत, परंपराओं को पश्चिमी चश्मे से न देखें

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

नई दिल्ली | मंगलवार, 7 अप्रैल, 2026

केरल के विश्व प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर देश के सबसे बड़े मंच पर है। मंगलवार को 9-न्यायाधीशों की संवैधानिक बेंच के सामने केंद्र सरकार ने कड़ा रुख अपनाते हुए 2018 के फैसले को ‘गलत’ करार दिया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने स्पष्ट किया कि धार्मिक परंपराओं को आधुनिक ‘पश्चिमी’ चश्मे से नहीं देखा जा सकता।

⚖️ सुनवाई की 5 बड़ी बातें: जो आपको जाननी चाहिए

  • 2018 का फैसला ‘गलत’ कानून: केंद्र सरकार ने आधिकारिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट से कहा कि 2018 में दिया गया वह फैसला, जिसमें सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी गई थी, कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण था और उसे पलटा जाना चाहिए।

  • अस्पृश्यता (Article 17) पर विवाद: सॉलिसिटर जनरल ने आपत्ति जताई कि महिलाओं के प्रवेश पर रोक को ‘अस्पृश्यता’ मानना गलत है। इस पर जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने टिप्पणी की कि “एक महिला को महीने में तीन दिन अछूत नहीं माना जा सकता।”

  • सुधार का अधिकार किसे? केंद्र का तर्क है कि धार्मिक रीति-रिवाजों में सुधार का काम विधायिका (Legislature) का है, अदालतों का नहीं। कोर्ट को यह तय नहीं करना चाहिए कि पूजा की पद्धति क्या होनी चाहिए।

  • केरल सरकार का ‘यू-टर्न’: मामले में नया मोड़ तब आया जब केरल सरकार ने भी अब रिव्यू याचिकाओं का समर्थन करने का संकेत दिया है, जबकि 2018 में उन्होंने महिलाओं के प्रवेश का समर्थन किया था।

  • ब्रह्मचर्य और आस्था: सरकार ने फिर दोहराया कि भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं और यह प्रतिबंध किसी हीन भावना के कारण नहीं, बल्कि मंदिर की विशिष्ट प्रकृति (Sui Generis) के कारण है।

? कोर्ट रूम का समीकरण: क्या बदल जाएगा इतिहास?

सुप्रीम कोर्ट की यह 9-न्यायाधीशों की बेंच केवल सबरीमाला ही नहीं, बल्कि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश और पारसी महिलाओं के अधिकारों जैसे 7 बड़े संवैधानिक सवालों पर विचार कर रही है।

मुख्य बिंदु केंद्र सरकार का पक्ष सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी/रुख
लैंगिक समानता यह लिंग भेदभाव नहीं, बल्कि धार्मिक विविधता है। क्या जैविक आधार पर किसी को रोकना समानता के खिलाफ नहीं?
न्यायिक हस्तक्षेप जज धर्मशास्त्र के विशेषज्ञ नहीं होते, दखल सीमित हो। कोर्ट ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथाओं’ (ERP) की समीक्षा कर सकता है।
धार्मिक बहुलवाद हर मंदिर की अपनी अलग परंपरा होती है, इसे बनाए रखें। यह मामला अन्य धर्मों के अधिकारों को भी प्रभावित करेगा।

? आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मैराथन सुनवाई के लिए 22 अप्रैल, 2026 तक का समय तय किया है।

  • 7-9 अप्रैल: रिव्यू याचिकाकर्ताओं और सरकार के तर्क।

  • 14-16 अप्रैल: महिलाओं के प्रवेश का समर्थन करने वाले पक्ष की दलीलें।

  • 21-22 अप्रैल: अंतिम जिरह और एमिकस क्यूरी (अदालत के सहायक) के सुझाव।

निष्कर्ष: यह मामला अब केवल एक मंदिर का नहीं रह गया है, बल्कि यह तय करेगा कि भारत में ‘संवैधानिक नैतिकता’ बड़ी है या ‘धार्मिक आस्था’। गूगल डिस्कवर पर इस खबर के ट्रेंड होने की बड़ी वजह यह है कि इसका फैसला भारत की पूरी धार्मिक और कानूनी व्यवस्था की दिशा बदल सकता है।

Related Post

Share This Article
Follow:
लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।