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PoK में सुलगती जनक्रांति: 9 जून की महा-हड़ताल से क्यों कांप रही है पाकिस्तानी हुकूमत?

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पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के मुजफ्फराबाद में तैनात पाकिस्तानी सुरक्षा बल और रेंजर्स के जवान

मुज़फ्फराबाद । अपडेटेड : सोमवार, 8 जून 2026

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) से आ रही ताजा रिपोर्टों ने इस समय पूरे भारतीय उपमहाद्वीप का ध्यान अपनी ओर खींचा है। जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) द्वारा आगामी 9 जून को बुलाई गई ऐतिहासिक महा-हड़ताल और पूर्ण लॉकडाउन से पहले पूरे इलाके को एक अभेद्य सैन्य छावनी में तब्दील कर दिया गया है।

प्रशासन द्वारा मोबाइल-इंटरनेट सेवाओं को सस्पेंड करने, बाहरी पर्यटकों को तत्काल इलाका छोड़ने का अल्टीमेटम देने और स्थानीय अवामी नेताओं पर की गई हिंसक कार्रवाई ने PoK के भीतर पनप रहे भारी जनाक्रोश को एक बार फिर दुनिया के सामने ला दिया है। आइए गहराई से समझते हैं कि आखिर इस हड़ताल से पाकिस्तान सरकार और उसकी सुरक्षा एजेंसियां इतनी खौफजदा क्यों हैं और इसके पीछे की जमीनी सच्चाई क्या है।

बल प्रयोग और कम्युनिकेशन ब्लैकआउट: सहमी हुकूमत का पैंतरा

PoK के मुजफ्फराबाद, मीरपुर, कोटली और रावलाकोट जैसे प्रमुख जिलों में इस समय अर्धसैनिक बलों (रेंजर्स) और पाकिस्तानी फौज की अतिरिक्त टुकड़ियों की भारी तैनाती कर दी गई है। स्थानीय खुफिया और नागरिक सूत्रों के अनुसार, पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान को यह गहरा डर सता रहा है कि 9 जून का यह विरोध प्रदर्शन पिछले साल हुए अधिकारों के आंदोलनों से भी अधिक उग्र और व्यापक रूप ले सकता है।

दमन चक्र को तेज करते हुए प्रशासन ने सुरक्षात्मक कदम उठाने के बहाने जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) को पूरी तरह से ‘प्रतिबंधित संगठन’ घोषित कर दिया है। इसके साथ ही, पूरे क्षेत्र में अघोषित कर्फ्यू जैसी पाबंदियां लगाई जा रही हैं ताकि लोगों को एक जगह इकट्ठा होने से रोका जा सके।

  • इंटरनेट और मोबाइल बंदी: पूरे इलाके में मोबाइल इंटरनेट और डिजिटल संचार सेवाओं को पूरी तरह ठप कर दिया गया है। इस्लामाबाद ने ऐसा इसलिए किया है ताकि प्रदर्शनकारी आपस में संपर्क न कर सकें और सबसे महत्वपूर्ण बात—सुरक्षा बलों की बर्बरता के वीडियो सोशल मीडिया के जरिए वैश्विक स्तर पर लीक न हों।

  • पर्यटकों के लिए सख्त एडवाइजरी: प्रशासन ने PoK में मौजूद सभी बाहरी लोगों और पर्यटकों को तत्काल वहां से निकल जाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही 5 जून से 20 जून तक के लिए सभी पर्यटन गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है।

रावलाकोट में सुरक्षा एजेंसियों का एक्शन: शाहजैब हबीब की मौत ने भड़काई आग

स्थिति तब और अधिक गंभीर हो गई जब रावलाकोट जिले के खैगला बर्मा ब्रिज के पास पाकिस्तान की सुरक्षा एजेंसियों ने एक बड़ा धरपकड़ अभियान चलाया। स्थानीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इस हिंसक कार्रवाई के दौरान पाकिस्तानी बलों द्वारा चलाई गई गोलियों से JAAC के सक्रिय और कार्यकारी सदस्य शाहजैब हबीब की मौत हो गई, जबकि एक अन्य प्रमुख कोर कमेटी सदस्य सरदार उमर नजीर कश्मीरी गंभीर रूप से घायल हो गए।

इस पूरी कार्रवाई के दौरान लगभग सात अन्य स्थानीय नागरिक भी घायल हुए हैं, और PoK के अलग-अलग हिस्सों से सैकड़ों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किए जाने की खबरें सामने आ रही हैं। इस दमन चक्र ने स्थानीय जनता के गुस्से में घी डालने का काम किया है।

विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण: यह सिर्फ राजनीतिक गतिरोध नहीं, बल्कि पेट की लड़ाई है

इस पूरे घटनाक्रम को गहराई से समझने के लिए हमें इसके पीछे के कुछ मुख्य कारणों और कूटनीतिक पहलुओं को देखना होगा:

  1. यह एक बुनियादी “अवामी आंदोलन” है: कई बाहरी विश्लेषक इसे केवल एक राजनीतिक गतिरोध मान रहे हैं, लेकिन वास्तव में यह PoK की जनता का बुनियादी अधिकारों—जैसे आटे पर सब्सिडी, बिजली के बढ़े हुए बिलों से मुक्ति और स्थानीय संसाधनों पर मालिकाना हक—के लिए किया जा रहा एक जन-आंदोलन है।

  2. अक्टूबर 2023 का अधूरा मुजफ्फराबाद समझौता: पिछले साल अक्टूबर में जम्मू कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (जो कि व्यापारियों, वकीलों और सिविल सोसाइटी समूहों का एक साझा गठबंधन है) ने एक 38-सूत्रीय चार्टर जारी किया था। इसके बाद प्रशासन के साथ समझौता तो हुआ, लेकिन हुकूमत ने अपने वादों को पूरी तरह से हवा में उड़ा दिया।

  3. अंतर्राष्ट्रीय मंच पर फजीहत का डर: पर्यटकों को अचानक बाहर निकालने के पीछे पाकिस्तान की सबसे बड़ी चिंता यह है कि वहां मानवाधिकारों के क्रूर हनन की तस्वीरें वैश्विक मीडिया में न चली जाएं।

क्या हैं JAAC की प्रमुख 38 मांगें?

व्यापारियों, वकीलों और सिविल सोसाइटी के इस साझा मंच ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए जनता से कम से कम एक महीने का राशन जमा करने की अपील की है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:

  • आर्थिक राहत: आटे पर सब्सिडी फिर से शुरू करना, गलत तरीके से थोपे गए टैक्सों की वापसी और बेकाबू महंगाई पर लगाम लगाना।

  • संसाधनों पर कश्मीरी हक: स्थानीय जल-संसाधनों और पनबिजली (Hydro Power) का लाभ पहले स्थानीय जनता को मिले। साथ ही, वन माफियाओं द्वारा की जा रही लकड़ी की तस्करी पर पूरी तरह रोक लगे।

  • विशेषाधिकारों का अंत: जजों और बड़े नौकरशाहों को मिलने वाले वीआईपी और विशेष अधिकार तुरंत खत्म किए जाएं।

  • संस्थागत सुधार: PoK बैंक का ‘स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान’ (SBP) के साथ जबरन किया जा रहा विलय रद्द हो और स्थानीय युवाओं के लिए फेडरल नौकरियों में आरक्षण सुनिश्चित हो।

भारत का कड़ा रुख और क्षेत्रीय प्रभाव

PoK में बढ़ता यह अभूतपूर्व तनाव केवल पाकिस्तान की आंतरिक समस्या नहीं है, बल्कि भारत भी इस पर बहुत पैनी नजर बनाए हुए है। नई दिल्ली हमेशा से वैश्विक मंचों पर यह पूरी मजबूती और स्पष्टता से कहती आई है कि पूरा जम्मू-कश्मीर (जिसमें पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाला हिस्सा भी शामिल है) भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है।

हाल ही में कश्मीर के बदलते हालातों को लेकर स्थानीय नेताओं के बयानों में भी यह बात उभरकर आई है कि बदहाली और दमन झेल रहे PoK के नागरिक अब भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। PoK में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन और आम नागरिकों पर किया जा रहा अत्याचार वैश्विक मंचों पर पाकिस्तान के उन खोखले दावों की पोल खोलता है, जो वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलाता रहा है।

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