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बीजापुर में आस्था का सैलाब: 33 देवी-देवताओं के मिलन के साथ संपन्न हुआ ऐतिहासिक चिकटराज मेला

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रायपुर | बुधवार, 8 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ के दक्षिण बस्तर स्थित बीजापुर जिले में इन दिनों आस्था और आदिम संस्कृति का अनूठा उत्सव ‘चिकटराज देव मेला’ अपने चरम पर है। 1 अप्रैल से शुरू हुआ यह आठ दिवसीय मेला आज, 8 अप्रैल को देवी-देवताओं की भावपूर्ण विदाई के साथ संपन्न हो रहा है। इस वर्ष मेले में रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालु पहुंचे, जो आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने का प्रमाण है।

33 देवी-देवताओं की सभा: ‘देव मिलन’ की अद्भुत रस्म

मेले का मुख्य आकर्षण ‘देव मिलन’ रहा, जहाँ बीजापुर और आसपास के दुर्गम वनांचलों से लगभग 33 देवी-देवताओं को पारंपरिक पालकियों (डोलियों) में ससम्मान लाया गया। ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर थिरकते पुजारी और ग्रामीणों ने जब चिकटराज देव के दरबार में हाजिरी लगाई, तो पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। स्थानीय मान्यता है कि यहाँ देवी-देवता आपस में संवाद करते हैं और क्षेत्र की सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

आदिवासी स्वशासन का जीवंत मॉडल

यह मेला केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की प्रशासनिक सूझबूझ को भी दर्शाता है।

  • प्रबंधन: मेले की पूरी रूपरेखा गांव के मांझी, पटेल, पुजारी और गुनिया द्वारा तय की गई।

  • पारदर्शिता: सदियों पुराने ‘खजाने’ (कोष) का निरीक्षण किया गया, जिसमें आज भी रियासत काल के चांदी के सिक्के सुरक्षित हैं।

  • व्यवस्था: चढ़ावे की समीक्षा से लेकर 10 एकड़ में फैले मेला क्षेत्र में दुकानों के आवंटन तक, सब कुछ पारंपरिक नियमों के अनुसार संचालित हुआ।

बस्तर रियासत से आज तक: इतिहास का सफर

इतिहासकारों के अनुसार, इस मेले की जड़ें बस्तर रियासत काल से जुड़ी हैं। उस समय यह मेला एक ‘सामाजिक संसद’ के रूप में कार्य करता था, जहाँ बड़े सामाजिक निर्णय लिए जाते थे। आज भी इस मंच का उपयोग आपसी विवादों को सुलझाने और सामुदायिक एकता को मजबूत करने के लिए किया जाता है।

भविष्य की विरासत और सरकारी प्रयास

इस वर्ष जिला प्रशासन ने भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष सुरक्षा, पेयजल और स्वास्थ्य शिविरों के पुख्ता इंतजाम किए हैं। मेले के अंतिम दिन आज सभी देवी-देवताओं की डोलियां अपने-अपने मूल गांवों की ओर प्रस्थान करेंगी। यह आयोजन स्पष्ट संदेश देता है कि बीजापुर की पहचान केवल उसके संघर्षों से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक भाईचारे से है।

समीक्षा: यह मेला छत्तीसगढ़ की उस “अक्षय निधि” के समान है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित हो रही है। यदि आप इस संस्कृति को करीब से देखना चाहते हैं, तो चैत्र नवरात्रि के बाद आने वाला यह समय बीजापुर यात्रा के लिए सर्वोत्तम है।

मुख्य बिंदु:

  • अवधि: 1 अप्रैल से 8 अप्रैल 2026 तक (8 दिवसीय उत्सव)

  • विशेषता: 33 देवी-देवताओं की डोलियों का भव्य ‘देव मिलन’ संगम।

  • प्रशासन: सदियों पुरानी ‘मांझी-पटेल’ स्वशासन प्रणाली द्वारा सफल प्रबंधन।

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