कोलकाता । सोमवार, 8 जून 2026
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा भूचाल आ चुका है जिसने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 साल के इतिहास को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) से मिली हार के बाद, टीएमसी के भीतर सुलग रही अंदरूनी कलह अब एक खुले विद्रोह में बदल चुकी है। पार्टी के 58 बागी विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व को सीधी चुनौती देते हुए हाल ही में निष्कासित किए गए नेता रिताब्रता बनर्जी (Uluberia Purba MLA) को विधानसभा में अपना नेता चुन लिया है।
विधानसभा अध्यक्ष से मिली मान्यता, संकट में ‘दीदी’ की पार्टी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब विधानसभा अध्यक्ष रथेंद्र बोस (Speaker Rathindra Bose) ने बागी गुट के दावे को स्वीकार करते हुए रिताब्रता बनर्जी को आधिकारिक तौर पर ‘नेता प्रतिपक्ष’ (Leader of the Opposition) के रूप में मान्यता दे दी। उन्हें बकायदा विपक्ष के नेता के चैंबर की चाबियां भी सौंप दी गई हैं।
इस टूट के बाद बागी गुट ने विधानसभा में मुख्य सचेतक (Chief Whip) के रूप में अखरुज्जमां (Raghunathganj MLA) और चार अन्य बागी विधायकों—जावेद खान, सबीना यास्मिन, सांदीपन साहा और शिउली साहा को सदन में उपनेता नियुक्त किया है।
अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ गोलबंदी
बागी विधायकों का रुख साफ है—उनकी लड़ाई पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके भतीजे और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी (Abhishek Banerjee) की कार्यशैली और मनमाने फैसलों के खिलाफ है। बागी नेताओं ने ममता बनर्जी से अपील की है कि वे ‘तृणमूल कांग्रेस विधायक दल’ की मुख्य सलाहकार (Main Advisor) बनी रहें, लेकिन वे अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं।
पार्टी के वरिष्ठ नेता सोवंदेब चट्टोपाध्याय ने हालांकि दावा किया है कि अधिकांश विधायक अब भी ममता बनर्जी के साथ वफादार हैं और यह बगावत सत्तारूढ़ दल के दबाव में की जा रही है, लेकिन धरातल पर 58 विधायकों का हस्ताक्षर के साथ स्पीकर के सामने जाना टीएमसी के लिए एक गहरे अस्तित्व के संकट (Existential Crisis) को दर्शाता है।
अब लोकसभा में शक्ति प्रदर्शन की तैयारी: दिल्ली की दहलीज पर विवाद
पश्चिम बंगाल विधानसभा (Kolkata) में अपनी ताकत दिखाने के बाद अब बागी गुट की नजर नई दिल्ली में लोकसभा के संसदीय दल पर है। वर्तमान में लोकसभा में टीएमसी के 29 सांसद हैं और वहां संसदीय दल के नेता खुद अभिषेक बनर्जी हैं।
बागी गुट अब इन 29 सांसदों के बीच अपनी पैठ बनाने और उनका समर्थन जुटाने की कोशिश में लग गया है। यदि संसद में भी बागी गुट दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जुटाने में कामयाब रहता है, तो दिल्ली में भी टीएमसी के संसदीय नेतृत्व को बदला जा सकता है। यह न केवल अभिषेक बनर्जी की कुर्सी के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन में टीएमसी की भूमिका और उसकी मोलतोल करने की शक्ति को भी भारी नुकसान पहुंचाएगा।
क्या बागी गुट संसद में भी विधानसभा जैसी सफलता दोहरा पाएगा? यह देखना बाकी है, लेकिन इतना तय है कि बंगाल की खाड़ी से उठा यह सियासी तूफान अब देश की राजधानी दिल्ली तक पहुंच चुका है।
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