वराहमिहिर प्राचीन भारत की उन असाधारण विभूतियों में से एक थे, जिन्होंने गणित, ज्योतिष और खगोल विज्ञान (Astronomy) को रहस्य और अंधविश्वास से निकालकर तर्क, गणना और प्रेक्षण पर आधारित विज्ञान का स्वरूप दिया। वे गुप्तकाल की बौद्धिक समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं और आज उन्हें भारत के पहले इंटरडिसिप्लिनरी वैज्ञानिकों में गिना जाता है।
परिचय: वराहमिहिर (505–587 ईस्वी)
वराहमिहिर का जन्म उज्जैन के निकट कायथा (कपित्थक) में हुआ। उनके पिता आदित्यदास सूर्योपासक थे और उन्होंने ही उन्हें खगोल एवं ज्योतिष की प्रारंभिक शिक्षा दी। आगे चलकर महान गणितज्ञ आर्यभट के विचारों से प्रभावित होकर वराहमिहिर ने अपने जीवन को वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए समर्पित कर दिया।
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गुप्त सम्राट विक्रमादित्य के दरबार में वे नवरत्नों में शामिल थे। उस समय उज्जैन भारत का सबसे बड़ा खगोलीय केंद्र था, जहाँ ग्रहों और नक्षत्रों की गणनाएँ अत्यंत सटीकता से की जाती थीं।
वराहमिहिर की प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ
वराहमिहिर की रचनाएँ आज भी ज्ञान-विज्ञान का अमूल्य स्रोत मानी जाती हैं।
🔹 पंचसिद्धांतिका
यह ग्रंथ प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान का ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। इसमें उन्होंने अपने समय में प्रचलित पाँच प्रमुख खगोलीय सिद्धांतों का समन्वय किया—
- पुलिश सिद्धांत
- रोमक सिद्धांत
- वशिष्ठ सिद्धांत
- सौर सिद्धांत
- पितामह सिद्धांत
नवीन दृष्टि: आधुनिक शोध बताते हैं कि यह ग्रंथ भारत और पश्चिमी जगत के बीच वैज्ञानिक ज्ञान के आदान-प्रदान का प्रमाण है।
🔹 वृहत्संहिता
यह ग्रंथ केवल ज्योतिष नहीं, बल्कि प्राकृतिक और सामाजिक विज्ञानों का विश्वकोश है। इसमें—
- 🌧️ मौसम विज्ञान: वर्षा-पूर्वानुमान, बादल निर्माण
- 🌍 भू-विज्ञान: भूकंप के संकेत
- 🏛️ वास्तु एवं नगर नियोजन
- 🌱 कृषि और वनस्पति विज्ञान
- 🧴 इत्र, सुगंध और सौंदर्य प्रसाधन निर्माण
आधुनिक प्रासंगिकता: आज के क्लाइमेट साइंस, एग्रीकल्चर और अर्बन प्लानिंग के कई सिद्धांत इससे मेल खाते हैं।
🔹 वृहज्जातक
यह ग्रंथ भारतीय ज्योतिष की आधारशिला माना जाता है। इसमें—
- ग्रहों की गणितीय स्थिति
- जन्मकुंडली का वैज्ञानिक विश्लेषण
- मानव जीवन पर खगोलीय प्रभाव
का सुव्यवस्थित वर्णन है।
वैज्ञानिक और गणितीय योगदान
वराहमिहिर को केवल भविष्यवक्ता कहना उनके साथ अन्याय होगा। वे एक वैज्ञानिक विचारक थे।
- जल-भूविज्ञान (Hydrogeology):
दीमक, वनस्पति और मिट्टी के लक्षणों से भूमिगत जल की पहचान—आज भी उपयोगी तकनीक। - गुरुत्वाकर्षण का आभास:
उन्होंने उल्लेख किया कि पृथ्वी में वस्तुओं को आकर्षित करने की शक्ति है, जो आधुनिक गुरुत्व सिद्धांत से मेल खाती है। - चंद्रमा का प्रकाश:
चंद्रमा स्वयं प्रकाशमान नहीं, बल्कि सूर्य के प्रकाश का परावर्तन करता है—यह तथ्य उन्होंने स्पष्ट किया। - त्रिकोणमिति (Trigonometry):
आर्यभट की साइन तालिकाओं में सुधार कर अधिक सटीक मान प्रस्तुत किए, जिनका उपयोग आगे की गणनाओं में हुआ।
वराहमिहिर ने विज्ञान और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित किया। उनकी गणनाओं की सटीकता इतनी अद्भुत थी कि आज भी कई हिंदू पंचांग उनके सिद्धांतों पर आधारित हैं। वे ऐसे वैज्ञानिक थे जिन्होंने भारत की ज्ञान-परंपरा को वैश्विक मंच पर प्रतिष्ठा दिलाई। कहा जाता है कि एक अत्यंत सटीक भविष्यवाणी से प्रभावित होकर राजा विक्रमादित्य ने उन्हें ‘वराह’ की उपाधि दी—जो उनकी निर्भीकता और विद्वत्ता का प्रतीक बनी।
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