लखनऊ. प्रयागराज में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला माघ मेला भारतीय सनातन परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। पौष पूर्णिमा से प्रारंभ होकर यह मेला माघ मास भर चलता है और अपने अंतिम चरणों में श्रद्धालुओं की आस्था चरम पर होती है। विशेषकर त्रिवेणी संगम—जहाँ गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम माना जाता है—पर पवित्र स्नान का अत्यंत महत्व है।
माघ मेले के अंतिम चरणों का महत्व
माघ मेले का अंतिम चरण धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक—तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस अवधि में:
- कल्पवासी अपने मास-भर के व्रत, संयम और साधना को पूर्ण करते हैं।
- देश-विदेश से आए संत, महात्मा और अखाड़े अंतिम शाही/विशेष स्नानों में भाग लेते हैं।
- श्रद्धालुओं की संख्या अपने शिखर पर पहुँच जाती है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्थाएँ भी सर्वोच्च स्तर पर रहती हैं।
अंतिम चरण में वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है—भजन, कीर्तन, प्रवचन और यज्ञों की निरंतर ध्वनि संगम तट को दिव्यता प्रदान करती है।
त्रिवेणी संगम पर प्रमुख स्नान तिथियाँ (अंतिम चरण केंद्रित)
माघ मेले के दौरान कई पुण्य स्नान तिथियाँ होती हैं, पर अंतिम चरण में निम्न तिथियाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं:
1. माघ पूर्णिमा
- माघ मेले की सबसे महत्वपूर्ण और अंतिम प्रमुख स्नान तिथि।
- मान्यता है कि इस दिन संगम में स्नान करने से जन्म-जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं।
- इसी तिथि के बाद अधिकांश कल्पवासी मेला क्षेत्र से प्रस्थान करते हैं।
2. महाशिवरात्रि
- कई वर्षों में माघ पूर्णिमा के कुछ दिनों बाद महाशिवरात्रि भी माघ मेले के समापन काल में पड़ती है।
- इस दिन शिवभक्तों द्वारा संगम स्नान कर भगवान शिव की उपासना की जाती है।
- यह तिथि मेले को आध्यात्मिक पूर्णता प्रदान करती है।
ध्यान दें: पौष पूर्णिमा (प्रारंभिक), मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या, बसंत पंचमी आदि स्नान तिथियाँ पहले चरणों में आती हैं, जबकि माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि माघ मेले के अंतिम चरण की पहचान हैं।
प्रशासनिक और सामाजिक व्यवस्थाएँ
अंतिम चरणों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन द्वारा:
- सुरक्षा के व्यापक इंतज़ाम (जल पुलिस, NDRF, ड्रोन निगरानी)
- अस्थायी घाटों, स्वच्छ पेयजल और चिकित्सा शिविरों की व्यवस्था
- यातायात प्रबंधन और अखाड़ों के लिए पृथक मार्ग
जैसी व्यवस्थाएँ की जाती हैं, ताकि स्नान शांतिपूर्ण और सुरक्षित रूप से संपन्न हो सके।
धार्मिक मान्यता और लोकआस्था
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार माघ मास में संगम स्नान को कल्पवास के समान फलदायी माना गया है। मान्यता है कि:
- देवता स्वयं इस काल में संगम तट पर विचरण करते हैं।
- माघ पूर्णिमा पर किया गया दान और स्नान अक्षय पुण्य देता है।
इसी कारण अंतिम चरण में भी श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं होता।
माघ मेले का अंतिम चरण आस्था, साधना और सामाजिक समरसता का अद्भुत संगम है। त्रिवेणी संगम पर माघ पूर्णिमा और महाशिवरात्रि के स्नान न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के जीवंत प्रतीक भी हैं। यह चरण माघ मेले को पूर्णता प्रदान करता है और श्रद्धालुओं के हृदय में आध्यात्मिक संतोष छोड़ जाता है।
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