काबुल. पिछले कुछ महीनों से ड्यूरंड लाइन (Durand Line) पर बढ़ता तनाव न केवल दो पड़ोसियों के बीच का झगड़ा है, बल्कि इसने दक्षिण एशिया की पूरी भू-राजनीति (Geopolitics) को हिलाकर रख दिया है। सोशल मीडिया और क्षेत्रीय मीडिया आउटलेट्स में दावों की बाढ़ आई हुई है कि अफ़ग़ान बलों ने हालिया सैन्य झड़पों में पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान पहुँचाया है।
लेकिन क्या इन दावों में कोई ठोस सच्चाई है, या यह केवल ‘इन्फॉर्मेशन वॉरफेयर’ का एक हिस्सा है? आइए, इस जटिल मुद्दे के हर पहलू का गहराई से विश्लेषण करते हैं।
1. सीमा पर ताजा संघर्ष: तोरखम और चमन बॉर्डर की जमीनी स्थिति
अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच तोरखम (Torkham) और चमन (Chaman) बॉर्डर पर स्थिति अब केवल छिटपुट गोलाबारी तक सीमित नहीं रही है।
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विवाद की जड़: पाकिस्तान द्वारा 2,600 किलोमीटर लंबी सीमा पर की जा रही कांटेदार बाड़बंदी (Fencing)। अफ़ग़ान तालिबान इस रेखा को एक अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं बल्कि ‘औपनिवेशिक विरासत’ मानते हैं।
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सैन्य सक्रियता: हालिया सैटेलाइट तस्वीरों और रिपोर्ट्स के अनुसार, अफ़ग़ान सीमा रक्षकों ने कई रणनीतिक स्थानों पर पाकिस्तानी चौकियों को निशाना बनाया है और बाड़ को उखाड़ फेंका है।
2. “कमर तोड़ दी” दावे का सैन्य और रणनीतिक विश्लेषण
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में अफ़ग़ान लड़ाकों को आधुनिक अमेरिकी सैन्य साजो-सामान के साथ देखा जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं:
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अमेरिकी हथियारों का ‘वसीयतनामा’: 2021 में अमेरिका के जाने के बाद तालिबान के हाथ $7 बिलियन से अधिक के आधुनिक हथियार लगे। इनमें M4 कार्बाइन्स, नाइट विजन गॉगल्स (NVGs) और हम्वी (Humvees) शामिल हैं, जो पहाड़ी युद्ध में उन्हें पाकिस्तानी इन्फैंट्री पर बढ़त दिलाते हैं।
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गुरिल्ला युद्ध बनाम पारंपरिक सेना: अफ़ग़ान लड़ाके ऊबड़-खाबड़ इलाकों में लड़ने के आदी हैं। वहीं, पाकिस्तानी सेना अपनी आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और टीटीपी (TTP) के हमलों के कारण रक्षात्मक मुद्रा में है।
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मनोवैज्ञानिक दबाव: पाकिस्तान के भीतर बढ़ता आर्थिक संकट और सुरक्षा बलों पर बढ़ते आत्मघाती हमले सेना के मनोबल को प्रभावित कर रहे हैं।
विशेषज्ञ की राय: “हालांकि अफ़ग़ान बलों ने पाकिस्तानी सेना को कई मोर्चों पर पीछे धकेला है, लेकिन पाकिस्तान एक परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है जिसकी वायु सेना और आर्टिलरी अफ़ग़ानिस्तान से कहीं अधिक शक्तिशाली है। इसलिए ‘कमर टूटना’ एक अतिशयोक्ति हो सकती है, लेकिन यह निश्चित है कि पाकिस्तान अपनी सीमा पर नियंत्रण खो रहा है।”
3. टीटीपी (TTP) का फैक्टर: पाकिस्तान के लिए ‘दोहरा मोर्चा’
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अब एक ‘टू-फ्रंट वॉर’ जैसी स्थिति में है। एक तरफ सीमा पर अफ़ग़ान सेना है, तो दूसरी तरफ देश के भीतर सक्रिय तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP)। इस्लामाबाद का आरोप है कि काबुल प्रशासन टीटीपी को पनाह दे रहा है, जबकि काबुल इसे पाकिस्तान की आंतरिक विफलता बताता है।
4. आर्थिक तबाही और मानवीय संकट
इस तनाव की सबसे बड़ी कीमत आम जनता चुका रही है:
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व्यापार ठप: तोरखम बॉर्डर बंद होने से पाकिस्तान को प्रतिदिन करोड़ों डॉलर का नुकसान हो रहा है। फलों और दवाओं से लदे ट्रक सीमा पर ही सड़ रहे हैं।
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मुद्रास्फीति: पाकिस्तान में पहले से ही महंगाई आसमान छू रही है, अफ़ग़ानिस्तान के साथ व्यापार बंद होने से सीमावर्ती क्षेत्रों में आवश्यक वस्तुओं की कमी हो गई है।
5. भारत और वैश्विक शक्तियों की भूमिका
दक्षिण एशिया के इस पावर गेम पर भारत की पैनी नजर है।
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भारत का रुख: भारत ने हमेशा एक स्थिर और संप्रभु अफ़ग़ानिस्तान का समर्थन किया है। क्षेत्र में पाकिस्तान की अस्थिरता का सीधा असर कश्मीर और पंजाब की सुरक्षा पर पड़ सकता है।
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चीन की चिंता: चीन अपने CPEC (चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा) को लेकर चिंतित है, क्योंकि सीमा पर अस्थिरता उसके निवेश को जोखिम में डालती है।
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