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UCC और मुस्लिम पर्सनल लॉ पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: “संसद ही ले सकती है निर्णय”

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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नई दिल्ली. देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) को रद्द करने या देश में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने का निर्णय केवल संसद ही ले सकती है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि न्यायपालिका विधायिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

प्रमुख बिंदु: कोर्ट ने क्या कहा?

  • कानूनी शून्य (Legal Vacuum): अदालत ने चेतावनी दी कि यदि बिना किसी वैकल्पिक कानून के शरीयत कानून को खत्म कर दिया गया, तो मुस्लिम समुदाय में विरासत और संपत्ति के मामलों को संभालने के लिए कोई कानूनी ढांचा नहीं बचेगा।

  • समानता का अधिकार: वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि मुस्लिम महिलाओं को भी पुरुषों के समान विरासत का अधिकार मिलना चाहिए, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) का मामला है।

  • सुधार बनाम अधिकार: सीजेआई ने स्पष्ट किया कि सामाजिक सुधार इस तरह होने चाहिए कि किसी के मौजूदा अधिकारों का हनन न हो।

UCC लागू होने पर क्या बदल जाएगा?

यदि संसद सुप्रीम कोर्ट के सुझावों और संविधान के अनुच्छेद 44 (नीति निर्देशक तत्व) के तहत कानून बनाती है, तो सभी धर्मों के लिए नियम एक समान हो जाएंगे:

विषय वर्तमान (विभिन्न पर्सनल लॉ) UCC के बाद (संभावित)
शादी की उम्र कुछ समुदायों में धार्मिक मान्यताओं पर आधारित। सभी लड़कियों के लिए न्यूनतम 18 या 21 वर्ष।
तलाक अलग-अलग मजहबी प्रक्रियाएं। केवल अदालती प्रक्रिया के माध्यम से कानूनी विच्छेद।
विरासत बेटियों का हिस्सा बेटों से कम (कुछ मामलों में)। बेटा और बेटी को संपत्ति में बिल्कुल बराबर का हक।
बच्चा गोद लेना मुस्लिम कानून में औपचारिक गोद लेने का प्रावधान सीमित। सभी के लिए एक समान और सरल गोद लेने की प्रक्रिया।

विशेषज्ञों की राय और राजनीतिक सरगर्मी

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने गेंद अब सरकार के पाले में डाल दी है। चूँकि उत्तराखंड पहले ही अपना UCC विधेयक पारित कर चुका है, इसलिए अब राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी मांग तेज होगी।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि वह ‘सुपर-पार्लियामेंट’ नहीं है। अब सबकी निगाहें केंद्र सरकार पर हैं कि क्या वह आगामी सत्र में समान नागरिक संहिता पर कोई मसौदा पेश करती है या नहीं।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।