मुंबई । बुधवार, 12 अगस्त 2026
पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) की सफलता के बाद, सरकार और ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) का अगला बड़ा कदम डीजल में एथेनॉल मिलाना था। हालांकि, हाल ही में सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों और स्वतंत्र प्रयोगशालाओं द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययनों के बाद इस योजना को एक बड़ा झटका लगा है।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के अनुसार, एथेनॉल-मिश्रित डीजल निर्धारित सुरक्षा और तकनीकी मानकों पर खरा नहीं उतर पाया है। इस वजह से इसके कमर्शियल रोलआउट को फिलहाल टाल दिया गया है।
फ्लैश पॉइंट में भारी गिरावट: सुरक्षा टेस्ट में विफलता की असली वजह
किसी भी ईंधन के परिवहन, भंडारण और वाहन में इस्तेमाल के लिए उसका ‘फ्लैश पॉइंट’ (Flash Point) सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होता है। फ्लैश पॉइंट वह न्यूनतम तापमान है जिस पर ईंधन का वाष्प हवा में मिलकर आग पकड़ सकता है।
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डीजल का मानक फ्लैश पॉइंट: सामान्य डीजल का न्यूनतम फ्लैश पॉइंट कम से कम 35°C (या उससे अधिक) निर्धारित होता है।
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एथेनॉल का फ्लैश पॉइंट: एथेनॉल का फ्लैश पॉइंट मात्र 12°C से 13°C के बीच होता है।
जब एथेनॉल को डीजल में मिलाया गया, तो मिश्रण का फ्लैश पॉइंट तेजी से गिर गया। इससे ईंधन की स्टोरेज टंकियों, फ्यूल टैंकरों और गाड़ियों के फ्यूल टैंक में आग लगने का खतरा काफी बढ़ गया। इसी तकनीकी और सुरक्षा जोखिम के कारण सरकार ने इसे हरी झंडी नहीं दी है।
पेट्रोल और डीजल ब्लेंडिंग में अंतर
अक्सर सवाल उठता है कि जब पेट्रोल में एथेनॉल आसानी से मिल जाता है, तो डीजल में क्यों नहीं?
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रासायनिक गुण (Chemical Properties): पेट्रोल और एथेनॉल की रासायनिक संरचना आपस में आसानी से घुलनशील है। इसके विपरीत, डीजल का घनत्व (Density) और विस्कोसिटी (Viscosity) अलग होती है, जिससे एथेनॉल और डीजल बिना महंगे केमिकल बाइंडर्स (Binders) के आपस में अलग होने लगते हैं।
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इंजन तकनीक: पेट्रोल इंजन स्पार्क इग्निशन (Spark Ignition) पर काम करते हैं, जबकि डीजल इंजन कम्प्रेशन इग्निशन (Compression Ignition) पर। एथेनॉल का सेटेन नंबर (Cetane Number) कम होने के कारण यह डीजल इंजन के दहन (Combustion) पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
क्या एथेनॉल-डीजल योजना पूरी तरह बंद हो गई है?
नहीं, इसे पूरी तरह से बंद नहीं माना जा सकता। सरकार और शोध संस्थान अब ऐसे सुरक्षित विकल्पों की तलाश कर रहे हैं जो फ्लैश पॉइंट की समस्या को दूर कर सकें:
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आइसोबुटानॉल (Isobutanol) का विकल्प: वैज्ञानिक अब 2% से 5% आइसोबुटानॉल-डीजल ब्लेंडिंग का परीक्षण कर रहे हैं। आइसोबुटानॉल का फ्लैश पॉइंट (27°C – 30°C) एथेनॉल से बेहतर होता है और यह डीजल में लंबे समय तक स्थिर रहता है।
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फ्लैश-पॉइंट एडिटिव्स: तेल कंपनियां ऐसे रसायनों का परीक्षण कर रही हैं जो मिश्रण के फ्लैश पॉइंट को सुरक्षित स्तर तक बढ़ा सकें।
किसानों और एथेनॉल उद्योग पर प्रभाव
भारत में एथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से गन्ने और खाद्यान्न से होता है। डीजल ब्लेंडिंग रुकने से तत्काल प्रभाव से एथेनॉल की खपत में होने वाली बड़ी वृद्धि की उम्मीद थोड़ी धीमी हुई है। हालांकि, पेट्रोल में E20 और उच्चतर एथेनॉल मिश्रण (E85) के विस्तार से एथेनॉल इंडस्ट्री और किसानों को राहत मिलती रहेगी।
FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)
Q1: डीजल में एथेनॉल क्यों नहीं मिलाया जा सकता?
Ans: एथेनॉल मिलाने से डीजल का फ्लैश पॉइंट बहुत कम (12°-13°C के करीब) हो जाता है, जिससे परिवहन और भंडारण के दौरान आग लगने का गंभीर खतरा उत्पन्न होता है।
Q2: क्या पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग भी प्रभावित हुई है?
Ans: नहीं, पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) का कार्यक्रम सफलतापूर्वक जारी है, क्योंकि पेट्रोल और डीजल के गुण पूरी तरह अलग हैं।
Q3: एथेनॉल-डीजल की जगह अब क्या विकल्प देखा जा रहा है?
Ans: वैज्ञानिक अब आइसोबुटानॉल (Isobutanol) जैसे बायो-ऐल्कोहॉल के मिश्रण का परीक्षण कर रहे हैं, जो डीजल के साथ अधिक स्थिर और सुरक्षित है।
Disclaimer (अस्वीकरण): यह लेख नवीनतम मीडिया रिपोर्ट्स, आधिकारिक बयानों और तकनीकी परीक्षणों के आधार पर तैयार किया गया है। ऊर्जा नीति और ईंधन मानकों में सरकारी दिशानिर्देशों के अनुसार समय-समय पर बदलाव हो सकते हैं।
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