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‘केरल’ से ‘केरलम’ तक: क्या नाम परिवर्तन से लौटेगी सांस्कृतिक पहचान? भाजपा के पत्र ने शुरू की नई बहस

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
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तिरुवनंतपुरम. भारत के दक्षिणी राज्य केरल की राजनीति में एक बार फिर ‘नाम’ को लेकर हलचल तेज हो गई है। हाल ही में केरल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को पत्र लिखकर आधिकारिक तौर पर राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने की मांग की है।

यह पत्र न केवल एक प्रशासनिक अनुरोध है, बल्कि इसके पीछे भाषाई अस्मिता और सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने की एक गहरी छटपटाहट भी दिखाई देती है।

केरल बनाम केरलम: क्या है अंतर?

मलयालम भाषा में इस क्षेत्र को हमेशा से ‘केरलम’ ही कहा जाता रहा है। ‘केरल’ शब्द वास्तव में इस नाम का ‘अंग्रेजीकरण’ (Anglicisation) है, जो ब्रिटिश शासन के दौरान प्रचलित हुआ।

  • सांस्कृतिक जड़ें: ‘केरलम’ शब्द का उल्लेख तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के सम्राट अशोक के शिलालेखों में भी मिलता है, जहाँ इसे ‘केरलपुत्र’ कहा गया है।

  • ऐक्य केरल आंदोलन: 1920 के दशक में जब आधुनिक केरल के गठन की मांग उठी, तब भी आंदोलनकारियों का नारा ‘एकीकृत केरलम’ ही था।

राजनीतिक समीकरण: भाजपा का दांव या सांस्कृतिक राष्ट्रवाद?

दिलचस्प बात यह है कि जून 2024 में केरल की वामपंथी सरकार (LDF) ने भी विधानसभा में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास कर यही मांग केंद्र से की थी। अब भाजपा द्वारा पत्र लिखना इस मुद्दे पर अपनी ‘सांस्कृतिक दावेदारी’ को मजबूत करना माना जा रहा है।

  • सहमति का बिंदु: इस मुद्दे पर केरल की दोनों मुख्य धाराएं (LDF-UDF और भाजपा) एक धरातल पर दिख रही हैं। यह दुर्लभ है कि वैचारिक विरोध के बावजूद सांस्कृतिक पहचान पर सभी एकमत हों।

  • हिंदू गौरव और जड़ें: भाजपा का तर्क है कि ‘केरलम’ नाम राज्य की सनातन विरासत और शुद्ध मलयालम संस्कृति का प्रतीक है, जिसे औपनिवेशिक छाप (Colonial Mindset) से मुक्त करना अनिवार्य है।

संवैधानिक प्रक्रिया: नाम बदलना कितना कठिन?

संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किसी राज्य का नाम बदलने का अधिकार केवल संसद के पास है।

  1. राज्य का प्रस्ताव: राज्य विधानसभा को एक संकल्प पारित करना होता है (जो केरल पहले ही कर चुका है)।

  2. केंद्र की भूमिका: गृह मंत्रालय (MHA) को विभिन्न एजेंसियों (रेलवे, इंटेलिजेंस, सर्वेयर जनरल) से NOC लेनी होती है।

  3. संसद में संशोधन: अंततः संसद में संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन के लिए विधेयक लाना होता है।

निष्कर्ष: नाम से क्या बदलेगा?

आलोचक इसे केवल एक ‘कॉस्मेटिक बदलाव’ कह सकते हैं, लेकिन संस्कृति और इतिहास के जानकारों के लिए यह ‘वि-औपनिवेशीकरण’ (De-colonization) की प्रक्रिया का हिस्सा है। जैसे मद्रास का चेन्नई, बॉम्बे का मुंबई और उड़ीसा का ओडिशा होना केवल अक्षरों का फेरबदल नहीं था, बल्कि अपनी मिट्टी की पहचान को आधिकारिक दर्जा देना था।

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लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।