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मंडल बनाम कमंडल: वह द्वंद्व जिसने गढ़ा आधुनिक भारत का राजनीतिक भूगोल

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– डॉ अतुल मलिकराम

भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ दशक ऐसे रहे हैं जिन्होंने आने वाली सदियों की दिशा तय की है। 1990 का दशक भी ऐसा ही एक प्रस्थान बिंदु था। यदि हमें समकालीन भारत की सामाजिक और राजनीतिक बुनावट को समझना है, तो हमें दो शब्दों की गहराई में उतरना होगा, मंडल और कमंडल। यह केवल दो विचारधाराओं का टकराव नहीं था, बल्कि दो अलग-अलग संकल्पनाओं का मिलन और संघर्ष था, जिसने पिछले तीन दशकों से देश के सत्ता समीकरणों को परिभाषित किया है।

मंडल राजनीति की नींव 1979 में मोरारजी देसाई सरकार द्वारा गठित बी.पी. मंडल आयोग से पड़ी। हालांकि, इसकी सिफारिशें एक दशक तक फाइलों में दबी रहीं। 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने जब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा की, तो देश की राजनीति में एक भूचाल आ गया। संसद में वी.पी. सिंह के शब्द थे कि यदि जन्म के आधार पर अन्याय हुआ है, तो न्याय भी जन्म के आधार पर ही करना होगा। इस फैसले ने जहां एक ओर पिछड़े वर्गों में राजनीतिक चेतना का संचार किया, वहीं दूसरी ओर देश के युवाओं और उच्च जातियों के बीच भारी आक्रोश पैदा किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी के आत्मदाह के प्रयास ने इस विरोध को एक चेहरा दे दिया, जिसके बाद देश के कई हिस्सों में हिंसक आंदोलन और तनाव की स्थिति बनी।

मंडल की काट और हिंदू समाज को जातिगत आधार पर बंटने से रोकने के लिए भारतीय जनता पार्टी ने कमंडल यानी राम मंदिर आंदोलन को धार देना शुरू किया। 25 सितंबर 1990 को लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा शुरू की। इस यात्रा ने न केवल हिंदुत्व के मुद्दे को केंद्र में ला खड़ा किया, बल्कि भाजपा के राजनीतिक आधार को भी अभूतपूर्व मजबूती दी। 23 अक्टूबर 1990 को जब बिहार के समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव ने आडवाणी को गिरफ्तार किया, तो वह क्षण भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बन गया। इसके साथ ही मंडल और कमंडल का सीधा टकराव हुआ, जिसके परिणामस्वरूप वी.पी. सिंह की सरकार गिर गई।

भले ही वी.पी. सिंह की सरकार चली गई, लेकिन मंडल की राजनीति ने उत्तर भारत में क्षेत्रीय दलों की एक नई पौध तैयार कर दी। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और कांशीराम-मायावती की जोड़ी ने पिछड़ों और दलितों के बीच अपनी पैठ बनाई, तो बिहार में लालू प्रसाद यादव और बाद में नीतीश कुमार ने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित की। 1994 में नीतीश कुमार की कुर्मी चेतना रैली ने यह स्पष्ट कर दिया कि पिछड़ों की राजनीति के भीतर भी हिस्सेदारी का एक नया संघर्ष जन्म ले चुका है।
1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण को बरकरार रखा। हालांकि, न्यायालय ने 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा और क्रीमी लेयर का सिद्धांत जोड़कर इस मुद्दे को संवैधानिक संतुलन प्रदान किया। इस फैसले ने मंडल राजनीति को कानूनी वैधता दी और इसे मुख्यधारा का हिस्सा बना दिया। 2014 के बाद भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प बदलाव देखा गया। वर्तमान केंद्र सरकार ने मंडल और कमंडल को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया है। इसे विशेषज्ञों ने सबाल्टर्न हिंदुत्व कहा है, जहां सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ-साथ पिछड़े और वंचित वर्गों के कल्याण को प्राथमिकता दी जा रही है।

वहीं, विपक्ष अब जाति जनगणना और जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी के नारे के साथ मंडल राजनीति के एक नए अध्याय की शुरुआत कर रहा है। मंडल और कमंडल के इस तीन दशक लंबे सफर ने भारतीय लोकतंत्र को और अधिक समावेशी बनाया है। आज किसी भी दल के लिए इन दोनों पहलुओं को नजरअंदाज करना असंभव है। एक ओर जहां सामाजिक न्याय ने हाशिए पर खड़े समाज को सत्ता में हिस्सेदारी दिलाई, वहीं दूसरी ओर सांस्कृतिक पहचान ने राष्ट्रवाद को नई परिभाषा दी।

एक राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर मेरा मानना है कि यह द्वंद्व भारतीय लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में किसी एक विचारधारा का एकाधिकार संभव नहीं है; यहाँ विकास, न्याय और पहचान की आकांक्षाएं साथ-साथ चलती रहेंगी।

लेखक राजनीतिक रणनीतिकार हैं.

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