मंगलवार, जून 16 2026 | 03:42:17 AM
Breaking News
Home / अंतर्राष्ट्रीय / $1000 की दवा मात्र $25 में! अमेरिकी महिला ने भारत की मेडिसिन देख अपने देश के हेल्थ सिस्टम को कहा ‘महाफ्रॉड’

$1000 की दवा मात्र $25 में! अमेरिकी महिला ने भारत की मेडिसिन देख अपने देश के हेल्थ सिस्टम को कहा ‘महाफ्रॉड’

Follow us on:

इंस्टाग्राम वीडियो में अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली पर सवाल उठाती और भारतीय दवाओं की तारीफ करती अमेरिकी महिला विक्टोरिया।

वाशिंगटन । शनिवार, 13 जून 2026

इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर विक्टोरिया (Victoria) नाम की एक अमेरिकी महिला का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो ने दुनिया के सबसे अमीर देश अमेरिका के हेल्थकेयर सिस्टम की पोल खोलकर रख दी है। महिला का दावा है कि जिस दवा के लिए अमेरिकी फार्मेसी उससे 1,000 डॉलर (करीब 83,000 रुपये) मांग रही थी, वही दवा उसे कनाडा के रास्ते भारत से सिर्फ 25 डॉलर (करीब 2,000 रुपये) में मिल गई।

इस भारी अंतर को देखने के बाद महिला ने अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली को एक ‘बड़ा धोखा’ (Big Fraud) करार दिया है। आइए समझते हैं कि इस वायरल दावे के पीछे की पूरी कहानी क्या है, इसमें क्या सुधार (Corrections) देखने को मिलते हैं और दोनों देशों की कीमतों में इतना जमीन-आसमान का अंतर क्यों है।

क्या है पूरा मामला और डॉक्टर की अनोखी सलाह?

विक्टोरिया को एक बेहद जरूरी दवा की आवश्यकता थी। जब वह फार्मेसी पहुंची, तो उसे पता चला कि उसकी हेल्थ इंश्योरेंस कंपनी ने उस विशिष्ट दवा (संभवतः रिफैक्सिमिन या इसी तरह की कोई अन्य पेटेंटेड दवा) का खर्च उठाने से मना कर दिया है। इसका मतलब था कि उसे अपनी जेब से पूरे 1,000 डॉलर चुकाने होंगे।

इतनी मोटी रकम देने के बजाय विक्टोरिया ने अपने डॉक्टर से संपर्क किया। डॉक्टर ने उन्हें अमेरिकी सिस्टम से बाहर निकलकर ‘पर्सनल इम्पोर्ट’ (Personal Import) का रास्ता सुझाया। उन्होंने कनाडा की एक ऑनलाइन फार्मेसी से संपर्क करने की सलाह दी। जब कनाडा की फार्मेसी से कोटेशन आया, तो वह हैरान रह गईं। कनाडा की उस एजेंसी ने वह दवा सीधे भारत (India) से मंगवाई थी।

  • दवा की वास्तविक कीमत: $10 (लगभग ₹830)

  • शिपिंग और डिलीवरी चार्ज: $15 (लगभग ₹1,240)

  • कुल खर्च: $25 (लगभग ₹2,070)

यानी जो दवा अमेरिका में एक महीने के किराए या राशन के खर्च के बराबर थी, वह भारत की बदौलत कुछ चंद रुपयों में उनके घर पहुंच गई।

सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस

इस वीडियो के वायरल होने के बाद कमेंट्स में अमेरिकी और वैश्विक नागरिकों ने अपने अनुभव साझा किए। एक यूजर ने लिखा कि गंभीर बीमारियों जैसे पेट के इन्फेक्शन के लिए इस्तेमाल होने वाली दवा रिफैक्सिमिन (Rifaximin) के लिए भी अमेरिकी नागरिकों को यही रास्ता अपनाना पड़ता है।

फैक्ट चेक

हालांकि यह वीडियो अमेरिकी सिस्टम की कमियों को बिल्कुल सही तरीके से उजागर करता है, लेकिन तकनीकी रूप से कुछ बातों को स्पष्ट रूप से समझना जरूरी है:

  1. क्या यह पूरी तरह वैध है? अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (US FDA) के नियमों के अनुसार, विदेशों से व्यावसायिक रूप से दवाएं मंगाना प्रतिबंधित है। हालांकि, व्यक्तिगत उपयोग (Personal Use) के लिए 90 दिनों तक की दवा की सप्लाई को अक्सर मानवीय आधार पर छूट दी जाती है, बशर्ते आपके पास वैध डॉक्टर का पर्चा (Prescription) हो।

  2. दवा की गुणवत्ता का अंतर: अमेरिकी लॉबी अक्सर दावा करती है कि विदेशी दवाएं सुरक्षित नहीं हैं, जो कि पूरी तरह से गलत है। भारत में बनी जेनेरिक दवाएं उसी अंतरराष्ट्रीय मानक (WHO-GMP और USFDA मान्यता प्राप्त प्लांट्स) पर बनती हैं, जिन पर अमेरिकी ब्रांडेड दवाएं।

अमेरिका में दवाएं इतनी महंगी क्यों हैं?

अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली में दवाओं की कीमतें आसमान छूने के तीन मुख्य कारण हैं:

  • फ्री मार्केट प्राइसिंग (Free Market Pricing): अमेरिकी सरकार अन्य देशों की तरह दवाओं की अधिकतम कीमत (Price Cap) तय नहीं करती। फार्मा कंपनियां अपनी मर्जी से कीमतें तय करने के लिए स्वतंत्र हैं।

  • पेटेंट का एकाधिकार: किसी नई दवा की खोज के बाद कंपनियों को 20 साल तक का एकाधिकार मिलता है। इस दौरान कोई दूसरी कंपनी उसका सस्ता वर्जन नहीं बना सकती।

  • मिडिलमैन (PBMs) का खेल: अमेरिका में फार्मेसी बेनिफिट मैनेजर्स (PBMs) और बीमा कंपनियां दवाओं की कीमतों को कृत्रिम रूप से बढ़ा देती हैं ताकि वे खुद भारी कमीशन कमा सकें।

भारत कैसे बना ‘दुनिया की फार्मेसी’?

भारत को दुनिया की फार्मेसी (Pharmacy of the World) कहा जाता है और इसके पीछे ठोस कारण हैं:

  • जेनेरिक दवाओं में महारत: भारत दुनिया में सबसे सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाओं का निर्माता है। जेनेरिक दवाओं में रिसर्च का खर्च शामिल नहीं होता, इसलिए ये 80 से 90% तक सस्ती होती हैं।

  • सरकारी नियंत्रण (NPPA): भारत में ‘राष्ट्रीय दवा मूल्य निर्धारण प्राधिकरण’ दवाओं की कीमतों पर कड़ी नजर रखता है और आवश्यक दवाओं की कीमतों को आम जनता के बजट से बाहर नहीं जाने देता।

यह वायरल वीडियो इस बात का जीवंत प्रमाण है कि स्वास्थ्य सेवा जैसी बुनियादी जरूरत को जब पूरी तरह से कॉर्पोरेट और मुनाफे के हवाले कर दिया जाता है, तो आम नागरिकों को कितनी प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। वहीं दूसरी ओर, भारतीय दवा उद्योग आज दुनिया भर के करोड़ों लोगों के लिए जीवन रक्षक की भूमिका निभा रहा है।

मित्रों,
मातृभूमि समाचार का उद्देश्य मीडिया जगत का ऐसा उपकरण बनाना है, जिसके माध्यम से हम व्यवसायिक मीडिया जगत और पत्रकारिता के सिद्धांतों में समन्वय स्थापित कर सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें आपका सहयोग चाहिए है। कृपया इस हेतु हमें दान देकर सहयोग प्रदान करने की कृपा करें। हमें दान करने के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें -- Click Here


* 1 माह के लिए Rs 1000.00 / 1 वर्ष के लिए Rs 10,000.00

Contact us

Check Also

फेसबुक और इंस्टाग्राम पर वैश्विक संकट: लाखों यूजर्स हुए परेशान, जानें क्या है पूरा मामला और इसके संभावित सुधार

नई दिल्ली । शनिवार, 13 जून 2026 सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी मेटा (Meta) के …