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मिजोरम: विधायक राशिक मोहन चकमा SC के दोहरी सदस्यता फैसले के खिलाफ दायर करेंगे Review Petition; जानिए क्या है पूरा विवाद

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मिजोरम विधानसभा और चकमा ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (CADC) भवन की प्रतीकात्मक तस्वीर
आइजोल | गुरुवार, 13 अगस्त 2026
मिजोरम की राजनीति और संवैधानिक न्यायशास्त्र में इस समय एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न चर्चा का केंद्र बना हुआ है—क्या कोई व्यक्ति एक ही समय पर राज्य की स्वायत्त जिला परिषद (Autonomous District Council – ADC) का सदस्य और राज्य विधानसभा का विधायक (MLA) रह सकता है?
हाल ही में Supreme Court ने एक याचिका (Rustom Chakma vs The State of Mizoram & Ors.) पर सुनवाई करते हुए मिजोरम की स्वायत्त जिला परिषदों और राज्य विधानसभा में दोहरी सदस्यता पर रोक से जुड़े नियमों को बहाल करने के निर्देश दिए थे।
इस फैसले के बाद मिजोरम की बारदोबा सीट से विधायक और चकमा ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (CADC) के सदस्य राशिक मोहन चकमा ने फैसले पर असहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दाखिल करने की घोषणा की है।

राशिक मोहन चकमा क्यों दाखिल करेंगे Review Petition?

राशिक मोहन चकमा और उनके कानूनी सलाहकारों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट का फैसला कुछ महत्वपूर्ण तथ्यात्मक पहलुओं और संवैधानिक सिद्धान्तों की अनदेखी करता है:
  1. तथ्यात्मक भूल (Factually Incorrect Premise): अदालत के फैसले में कहा गया है कि लाई स्वायत्त जिला परिषद (Lai ADC) में दोहरी सदस्यता पर प्रतिबंध लागू है। जबकि वास्तविकता यह है कि लाई ADC ने वर्ष 2010 में ही अपने नियमों में संशोधन कर इस प्रतिबंध को हटा दिया था।
  2. प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन (Natural Justice): नोटिस जारी होने के तुरंत बाद पहली ही सुनवाई में मामले का निस्तारण कर दिया गया, जिससे प्रभावित पक्षों को अपना विस्तृत लिखित पक्ष प्रस्तुत करने का उचित अवसर नहीं मिल सका।
  3. विधायी शक्ति और अधिकार क्षेत्र: संविधान के अनुच्छेद 191(1) के तहत ‘लाभ का पद’ या जनप्रतिनिधियों की अयोग्यता तय करने की शक्ति संसद या राज्य विधायिका के पास होती है। संविधान की छठी अनुसूची परिषदों को सदस्यों की अयोग्यता संबंधी नियम बनाने का विधायी अधिकार प्रदान नहीं करती।
  4. पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों पर प्रभाव: यह मामला केवल मिजोरम तक सीमित नहीं है। इसका सीधा प्रभाव असम (Bodoland, Karbi Anglong), मेघालय (Khasi, Garo Hills) और त्रिपुरा की स्वायत्त परिषदों पर भी पड़ेगा।

छठी अनुसूची और ADC की संवैधानिक भूमिका

भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय शासन, सामाजिक परंपराओं और संस्कृति के संरक्षण के लिए स्वायत्त जिला परिषदों (ADCs) का गठन करती है।
  • इन परिषदों को भूमि, वन, कृषि और स्थानीय प्रशासनिक मामलों में विशेष अधिकार प्राप्त होते हैं।
  • इसी वजह से ADC की सदस्यता और राज्य विधानसभा (MLA) की सदस्यता के बीच संबंध और अधिकार क्षेत्र का प्रश्न संवैधानिक रूप से अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण हो जाता है।

आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर होने के बाद न्यायालय यह जांच करेगा कि क्या पूर्व में दिए गए फैसले में कोई ऐसी प्रत्यक्ष त्रुटि (Error Apparent on the Face of Record) या प्रक्रियात्मक चूक हुई है, जिसके आधार पर निर्णय पर पुनः विचार करना आवश्यक हो।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1: दोहरी सदस्यता (Dual Membership) विवाद क्या है?
उत्तर: यह विवाद इस सवाल पर आधारित है कि क्या कोई व्यक्ति एक ही समय में स्वायत्त जिला परिषद (ADC) का सदस्य (MDC) और राज्य विधानसभा का सदस्य (MLA) दोनों पदों पर रह सकता है या नहीं।
Q2: राशिक मोहन चकमा कौन हैं?
उत्तर: राशिक मोहन चकमा मिजोरम के एक प्रमुख राजनेता हैं, जो राज्य विधानसभा में विधायक होने के साथ-साथ चकमा ऑटोनॉमस डिस्ट्रिक्ट काउंसिल (CADC) के सदस्य भी हैं।
Q3: स्वायत्त जिला परिषद (ADC) किस अनुसूची के तहत आती है?
उत्तर: स्वायत्त जिला परिषदें (ADCs) भारतीय संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) के तहत गठित की जाती हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer)

यह लेख उपलब्ध समाचार रिपोर्टों, कानूनी दस्तावेजों और सार्वजनिक सूचनाओं के आधार पर केवल शैक्षणिक एवं सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। मामला अदालत में विचाराधीन (Sub-judice) है और अंतिम कानूनी स्थिति सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर निर्भर करेगी।
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