नई दिल्ली. भारत विविधताओं का देश है, और इस विविधता की सबसे सुंदर झलक आज (14-15 जनवरी) देखने को मिल रही है। जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तो पूरा देश ‘मकर संक्रांति’ के उल्लास में डूब जाता है। भले ही उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक इसके नाम बदल जाते हों, लेकिन सूर्य की उपासना और दान-पुण्य का भाव एक ही रहता है।
आइए, जानते हैं भारत के अलग-अलग कोनों में इस त्योहार के विभिन्न स्वरूपों को:
1. उत्तर भारत: मकर संक्रांति और ‘खिचड़ी’
उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में इसे मुख्य रूप से ‘मकर संक्रांति’ या ‘खिचड़ी’ के नाम से जाना जाता है।
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परंपरा: इस दिन पवित्र नदियों (विशेषकर गंगा) में स्नान का विशेष महत्व है। लोग काली दाल और चावल की ‘खिचड़ी’ खाते हैं और इसी का दान भी करते हैं।
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स्वाद: तिल के लड्डू, गुड़ और चूड़ा-दही इस त्योहार के प्रमुख व्यंजन हैं।
2. दक्षिण भारत: पोंगल (तमिलनाडु)
तमिलनाडु में यह त्योहार ‘पोंगल’ के रूप में चार दिनों तक मनाया जाता है।
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परंपरा: यह फसलों की कटाई का उत्सव है। लोग नए मिट्टी के बर्तन में नए चावल, दूध और गुड़ से ‘पोंगल’ नामक व्यंजन पकाते हैं। जब बर्तन से दूध उबलकर बाहर गिरता है, तो ‘पोंगल-ओ-पोंगल’ का उद्घोष किया जाता है, जो समृद्धि का प्रतीक है।
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जल्लीकट्टू: इस दौरान बैलों के साथ खेला जाने वाला पारंपरिक खेल ‘जल्लीकट्टू’ भी आयोजित होता है।
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3. असम: माघ बिहू या भोगाली बिहू
पूर्वोत्तर भारत, विशेषकर असम में इसे ‘माघ बिहू’ कहा जाता है।
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परंपरा: उत्सव की रात लोग ‘भेलाघर’ (बांस और फूस की झोपड़ी) बनाते हैं और सामूहिक भोज करते हैं। अगली सुबह ‘मेजी’ (अग्नि) जलाई जाती है और भगवान से आशीर्वाद मांगा जाता है।
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स्वाद: तिल के पीठा, लारु (लड्डू) और चिरा इस त्योहार की विशेषता हैं।
4. पंजाब और हरियाणा: लोहड़ी
संक्रांति से एक दिन पहले (13 जनवरी की रात) पंजाब और हरियाणा में ‘लोहड़ी’ का जश्न मनाया जाता है।
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परंपरा: आग जलाकर उसके चारों ओर चक्कर लगाए जाते हैं और अग्नि में रेवड़ी, मूंगफली और पॉपकॉर्न अर्पित किए जाते हैं। यह नई फसल और नई खुशियों (विशेषकर नवजात बच्चों और नवविवाहित जोड़ों) का उत्सव है।
5. गुजरात: उत्तरायण (पतंग उत्सव)
गुजरात में इसे ‘उत्तरायण’ कहा जाता है।
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आसमान का रंग: यहाँ यह त्योहार पूरी तरह पतंगों को समर्पित होता है। अहमदाबाद और सूरत जैसे शहरों में ‘इंटरनेशनल काइट फेस्टिवल’ का आयोजन होता है, जहाँ पूरा आसमान रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है।
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स्वाद: ‘उंडियू’ (सब्जियों का विशेष मिश्रण) और जलेबी इस दिन बड़े चाव से खाई जाती है।
नाम चाहे जो भी हो, मकर संक्रांति का यह पर्व हमें प्रकृति से जोड़ता है। यह सूर्य के उत्तरार्ध में जाने और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है। मातृभूमि समाचार की ओर से आप सभी को इन सभी पावन पर्वों की हार्दिक शुभकामनाएं!
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