दुबई. मिडिल ईस्ट में गहराते सैन्य तनाव और इजरायल-ईरान के बीच बढ़ती तल्खी ने न केवल वैश्विक राजनीति को गरमाया है, बल्कि खाड़ी देशों में रह रहे लाखों प्रवासियों की जिंदगी में भी उथल-पुथल मचा दी है। सुरक्षित पनाहगाह माना जाने वाला दुबई अब युद्ध की छाया और आसमान छूती महंगाई के दोहरे संकट से जूझ रहा है। इस बीच, एक भारतीय परिवार की आपबीती ने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है।
एक सपने का संघर्ष: 8 साल की मेहनत और एक अचानक संकट
तमिलनाडु के रहने वाले तिलककुमार जलाथु अनिरुथराज और उनकी पत्नी शामिनी रमेश पिछले आठ वर्षों से दुबई को अपना घर बनाए हुए थे। बेहतर भविष्य की तलाश में आए इस जोड़े की जिंदगी तब पटरी से उतर गई, जब तिलककुमार की मां उनसे मिलने दुबई पहुंचीं।
किस्मत को कुछ और ही मंजूर था; मां अचानक एक गंभीर बैक्टीरियल इन्फेक्शन की चपेट में आ गईं। पिछले 40 दिनों से वह अस्पताल के आईसीयू (ICU) में वेंटिलेटर पर जिंदगी और मौत की जंग लड़ रही हैं। डॉक्टरों का कहना है कि उन्हें कम से कम दो महीने और वेंटिलेटर सपोर्ट की जरूरत होगी।
1.25 करोड़ का बिल: मध्यमवर्गीय परिवार के लिए ‘पहाड़’ जैसा बोझ
दुबई की आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं विश्व स्तरीय तो हैं, लेकिन उनकी लागत भी उतनी ही भारी है। तिलककुमार के अनुसार:
-
दैनिक खर्च: अस्पताल का प्रतिदिन का बिल लगभग 3 लाख रुपये है।
-
अतिरिक्त लागत: इसमें स्कैन, टेस्ट और विशेष दवाओं का खर्च शामिल नहीं है।
-
कुल बकाया: अब तक इलाज का खर्च 1.25 करोड़ रुपये को पार कर चुका है।
युद्ध ने फेरा उम्मीदों पर पानी: ₹7 लाख का काम अब ₹50 लाख में
परिवार ने अपनी मां को बेहतर और किफायती इलाज के लिए भारत (मेडिकल रिपैट्रिएशन) ले जाने की योजना बनाई थी। डॉक्टरों ने 4 मार्च को उन्हें कमर्शियल फ्लाइट से ले जाने की अनुमति दे दी थी, जिसका खर्च महज 7 लाख रुपये था। लेकिन नियति ने यहाँ भी साथ नहीं दिया।
ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव और मिसाइल स्ट्राइक के कारण क्षेत्र का एयरस्पेस प्रभावित हुआ और कई फ्लाइट्स रद्द कर दी गईं। अब स्थिति यह है:
-
एयर एम्बुलेंस: एकमात्र विकल्प निजी एयर एम्बुलेंस बची है।
-
लागत में उछाल: युद्ध के जोखिम और ईंधन की बढ़ती कीमतों के कारण इसकी लागत 7 गुना बढ़कर 50 लाख रुपये तक पहुंच गई है।
-
अनिवार्य शर्त: अस्पताल से डिस्चार्ज तभी मिलेगा जब पूरा 1.25 करोड़ का बिल चुकाया जाएगा।
मदद की गुहार: चैरिटी और सरकार से आस
तिलककुमार अब हर उस दरवाजे को खटखटा रहे हैं जहाँ से उम्मीद की कोई किरण दिख सके। वह दुबई की स्थानीय चैरिटी संस्थाओं और भारतीय दूतावास से संपर्क में हैं। उन्होंने अस्पताल प्रशासन से भी बिल में कुछ रियायत देने की अपील की है ताकि वह अपनी मां को सुरक्षित भारत ले जा सकें।
विशेषज्ञों का मत: भू-राजनीतिक अस्थिरता का सबसे अधिक असर रसद (Logistics) और चिकित्सा सेवाओं पर पड़ता है। इस परिवार की स्थिति यह दर्शाती है कि युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि इसके परिणाम आम आदमी की जेब और जान पर भी भारी पड़ते हैं।
निष्कर्ष और आपकी भूमिका
यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उन हजारों प्रवासियों की है जो युद्धग्रस्त क्षेत्रों में अपनी जमा-पूंजी और अपनों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। इस समय इस परिवार को न केवल आर्थिक सहायता, बल्कि कूटनीतिक हस्तक्षेप की भी सख्त जरूरत है।
Matribhumisamachar


