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कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026: 20 जून से नाथुला दर्रे के जरिए शुरू होगी पावन यात्रा, जानें पूरी चयन प्रक्रिया और जरूरी नियम

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गंगटोक । रविवार, 14 जून 2026

शिव भक्तों और आध्यात्मिक यात्रियों के लिए एक बेहद सुखद खबर है। पांच साल के लंबे इंतजार और पिछले साल की सफल बहाली के बाद, वर्ष 2026 की कैलाश मानसरोवर यात्रा की तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं। सिक्किम के ऐतिहासिक नाथुला दर्रे (Nathu La Pass) के रास्ते इस वर्ष की आधिकारिक यात्रा आगामी 20 जून से शुरू होने जा रही है।

सिक्किम पर्यटन विकास निगम (STDC) के अनुसार, इस धार्मिक यात्रा को सुचारू और सुरक्षित बनाने के लिए प्रशासनिक और चिकित्सीय तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। आइए जानते हैं इस साल की यात्रा का पूरा शेड्यूल, चयन प्रक्रिया और इसका ऐतिहासिक-धार्मिक महत्व।

11 जून से शुरू हुई आधिकारिक प्रक्रिया, 15 जून को पहुँचेगा पहला जत्था

सिक्किम पर्यटन विकास निगम (STDC) के चेयरमैन लोकेंद्र रसैली ने जानकारी दी कि नाथुला दर्रे के रास्ते कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए आधिकारिक कागजी और प्रशासनिक प्रक्रिया 11 जून से शुरू हो चुकी है। देश के विभिन्न कोनों से चुने गए तीर्थयात्रियों का पहला जत्था 15 जून की शाम तक सिक्किम की राजधानी गंगटोक पहुँच जाएगा।

ऊंचाई के अनुसार शरीर को ढालना है सबसे बड़ी चुनौती (Acclimatization Process)

कैलाश मानसरोवर की यात्रा बेहद दुर्गम और अत्यधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों से होकर गुजरती है। कम ऑक्सीजन और अत्यधिक ठंड में तीर्थयात्रियों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने के लिए एक विशेष अनुकूलन (Acclimatization) प्रक्रिया अपनाई जाती है:

  • 16 और 17 जून: यात्रियों के पहले जत्थे को समुद्र तल से ऊंचाई पर स्थित ’18वां मील’ अनुकूलन केंद्र ले जाया जाएगा, जहां वे दो दिन बिताएंगे।

  • 18 और 19 जून: इसके बाद उन्हें और अधिक ऊंचाई पर स्थित प्रसिद्ध त्सोमगो (चांगू) झील (Tsomgo Lake) के दूसरे अनुकूलन केंद्र में ले जाया जाएगा।

  • 20 जून: जब चिकित्सा दल यात्रियों की शारीरिक फिटनेस और ऑक्सीजन स्तर से पूरी तरह संतुष्ट हो जाएगा, तब 20 जून को पहले बैच को आधिकारिक रूप से तिब्बत (TAR) के लिए रवाना किया जाएगा।

लॉटरी सिस्टम से हुआ 500 भाग्यशाली यात्रियों का चयन

इस वर्ष बाबा बर्फानी के दर्शन और मानसरोवर की पावन डुबकी के लिए देश भर से लगभग 1,500 श्रद्धालुओं ने आवेदन किया था। चूंकि सुरक्षा और पर्यावरण मानकों के कारण सीटें सीमित होती हैं, इसलिए पारदर्शी लॉटरी प्रणाली (Lottery System) के जरिए 500 भाग्यशाली तीर्थयात्रियों का चयन किया गया है।

यात्रा का स्वरूप और बैच का विवरण:

यह पूरी यात्रा 20 जून से शुरू होकर 24 अगस्त 2026 तक चलेगी। इस दौरान:

  • कुल 10 बैच में यात्रा आयोजित की जाएगी।

  • प्रत्येक बैच में 50 तीर्थयात्री शामिल होंगे।

  • तीर्थयात्रियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के लिए हर ग्रुप के साथ एक संपर्क अधिकारी (Liaison Officer) और एक चिकित्सा सहायक (Medical Assistant) चौबीसों घंटे तैनात रहेंगे।

  • प्रत्येक बैच तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (TAR) में लगभग 12 दिनों की यात्रा पूरी करके भारत वापस लौटेगा।

पिछले साल (2025) ही खत्म हुआ था गतिरोध

पाठकों की जानकारी के लिए बता दें कि वर्ष 2020 में फैली कोविड-19 महामारी के कारण इस यात्रा को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था। इसी दौरान 15 जून 2020 को लद्दाख की गलवान घाटी में भारत और चीन की सेनाओं के बीच हुए सीमा गतिरोध और तनाव के कारण यह यात्रा अगले कुछ सालों के लिए अनिश्चितकाल के लिए स्थगित रही थी।

महत्वपूर्ण संदर्भ: भारत और चीन के बीच विदेश सचिव स्तर की कई दौर की कूटनीतिक बातचीत के बाद दोनों देश इस यात्रा को फिर से शुरू करने पर सहमत हुए। परिणामस्वरूप, पिछले वर्ष यानी 2025 में 5 साल बाद पहली बार यात्रा बहाल हुई थी, जिसमें 10 बैचों के तहत कुल 451 तीर्थयात्रियों ने हिस्सा लिया था। इस वर्ष (2026) स्थिति और सामान्य होने पर यात्रियों की संख्या बढ़ाकर पूरी 500 कर दी गई है।

कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील का आध्यात्मिक महत्व

यह पूरी तीर्थयात्रा चीन के नियंत्रण वाले तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित कैलाश पर्वत और मानसरोवर झील के इर्द-गिर्द घूमती है।

  • भगवान शिव का वास: हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, कैलाश पर्वत देवाधिदेव महादेव भगवान शिव और माता पार्वती का पवित्र निवास स्थान है। यह ब्रह्मांड का केंद्र माना जाता है।

  • ब्रह्मा जी की मानस संतान: माना जाता है कि मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगवान ब्रह्मा के मन से हुई थी। पौराणिक मान्यता है कि इसके पवित्र और ठंडे जल में केवल एक बार स्नान करने से मनुष्य के जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाते हैं।

  • सर्वधर्म समभाव: यह स्थान केवल हिंदुओं के लिए ही नहीं, बल्कि बौद्ध, जैन और तिब्बत के स्थानीय ‘बोन’ धर्म के अनुयायियों के लिए भी परम पूजनीय और गहरी आस्था का केंद्र है।

सिक्किम का नाथुला मार्ग उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे की तुलना में कम पैदल चढ़ाई वाला और अधिक आरामदायक माना जाता है, जिससे वरिष्ठ नागरिकों के लिए भी यात्रा थोड़ी सुगम हो जाती है। प्रशासन ने अपील की है कि सभी यात्री अपने साथ जरूरी गर्म कपड़े और अपनी नियमित दवाएं अनिवार्य रूप से रखें।

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