लखनऊ. वाराणसी के घाटों पर दक्षिण की संस्कृति और उत्तर के आध्यात्मिक गौरव का अद्भुत मिलन हो रहा है। ‘काशी-तमिल संगमम’ केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक अखंडता का एक जीवित प्रमाण है। गंगा की लहरों और कावेरी की सभ्यता का मिलन आज काशी की धरती पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है। ‘काशी-तमिल संगमम’ के माध्यम से सदियों पुराने उस संबंध को पुनर्जीवित किया जा रहा है, जो उत्तर और दक्षिण भारत को एक सूत्र में पिरोता है।
1. ऐतिहासिक और आध्यात्मिक जुड़ाव
काशी (वाराणसी) और तमिलनाडु का संबंध प्राचीन काल से रहा है। कहा जाता है कि 19वीं सदी में महान तमिल कवि सुब्रमण्यम भारती ने यहीं रहकर अपनी शिक्षा प्राप्त की थी। संगमम के दौरान बाबा विश्वनाथ की नगरी में ‘तेवरम’ (तमिल भक्ति गीत) की गूंज और रामेश्वरम की मिट्टी का स्पर्श यह बताता है कि भूगोल अलग हो सकता है, लेकिन भक्ति एक है।
2. संगमम के मुख्य आकर्षण
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कला और शिल्प की प्रदर्शनी: नमो घाट और बीएचयू (BHU) के मैदानों में तमिलनाडु की कांचीपुरम साड़ियों और उत्तर प्रदेश के हस्तशिल्प का एक साझा मंच सजा है।
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साहित्यिक विमर्श: तमिल ग्रंथों (जैसे तिरुक्कुरल) और संस्कृत के ग्रंथों के बीच साझा दर्शन पर चर्चा करने के लिए विद्वान एकत्रित हो रहे हैं।
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सांस्कृतिक प्रस्तुतियां: भरतनाट्यम और कथक का एक ही मंच पर प्रदर्शन ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की भावना को साकार कर रहा है।
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3. ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ को कैसे मिल रहा है बल?
यह आयोजन राष्ट्रीय एकता के लिए एक ‘सेतु’ का काम कर रहा है:
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भाषा की बाधा का अंत: तमिल भाषी छात्र और डेलिगेट्स काशी के स्थानीय लोगों के साथ संवाद कर रहे हैं, जिससे भाषाई दूरी कम हो रही है।
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पर्यटन और अर्थव्यवस्था: इस संगमम ने धार्मिक पर्यटन के एक नए सर्किट ‘काशी-रामेश्वरम कॉरिडोर’ की नींव रख दी है, जिससे दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था को लाभ होगा।
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युवा पीढ़ी का जुड़ाव: ‘युवा संगम’ के तहत तमिलनाडु के छात्र काशी की गलियों और घाटों का भ्रमण कर रहे हैं, जिससे वे अपनी साझा विरासत को समझ पा रहे हैं।
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