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लौह पुरुष: राष्ट्र प्रथम (अनकही गाथा)

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प्रस्तावना: इतिहास के हाशिए से सत्य की पुकार

इतिहास केवल वह नहीं है जो घटित हुआ, बल्कि वह भी है जिसे सचेत रूप से छुपा लिया गया या गौण कर दिया गया। भारत के ‘लौह पुरुष’ सरदार वल्लभभाई पटेल का व्यक्तित्व एक ऐसे ही विशाल हिमालय के समान है, जिसकी छाया में आधुनिक भारत सांस ले रहा है, किंतु जिसकी ऊंचाई को नापने का प्रयास कम ही किया गया।

यह पुस्तक केवल एक जीवनी नहीं है; यह उन अनुत्तरित प्रश्नों की खोज है जो दशकों से भारतीय मानस को उद्वेलित करते रहे हैं। क्यों 12 प्रांतीय समितियों के समर्थन के बावजूद पटेल को प्रधानमंत्री की कुर्सी से दूर रहना पड़ा? क्या कारण थे कि राष्ट्रवाद की समान विचारधारा होने के बाद भी संघ और कांग्रेस के बीच पटेल का ‘सेतु’ बनने का सपना अधूरा रह गया?

1947 की वह काली रात जब दिल्ली ‘गजवा-ए-हिंद’ की साजिश की दहलीज पर खड़ी थी, और वह गोपनीय मिशन जिसने कश्मीर के महाराज को भारत के पक्ष में मोड़ा—ये ऐसी घटनाएं हैं जिन्हें मुख्यधारा के इतिहास की पाठ्यपुस्तकों ने विस्मृत कर दिया। यह पुस्तक साक्ष्यों, पत्रों और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से सरदार पटेल के उस ‘रुद्र’ रूप को सामने लाती है, जिसने राष्ट्र की एकता के लिए अपने व्यक्तिगत गौरव का सहर्ष बलिदान कर दिया। यह उस महामानव को श्रद्धांजलि है, जिसने भारत को केवल एक ‘विचार’ नहीं, बल्कि एक अखंड ‘भूभाग’ बनाया।

अध्याय 1: विद्रोही स्वभाव और कांग्रेस से प्रारंभिक दूरी

प्रारंभ में सरदार पटेल का झुकाव कांग्रेस या गांधीजी की अहिंसात्मक राजनीति की ओर नहीं था। वे एक सफल बैरिस्टर थे और पश्चिमी जीवनशैली के प्रशंसक थे।

  • असहमतियां: वे गांधीजी की “भजन-कीर्तन” की राजनीति और अहिंसा के प्रयोगों को अव्यावहारिक मानते थे।

  • हृदय परिवर्तन: गोधरा सम्मेलन (1917) में गांधीजी के संपर्क में आने और किसानों की समस्याओं को सुलझाने के उनके तरीके ने पटेल को प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने सूट त्याग कर धोती पहनी और स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े।

अध्याय 2: अध्यक्ष पद और प्रधानमंत्री की दावेदारी का त्याग

1946 का वर्ष भारतीय इतिहास का वह निर्णायक मोड़ था, जिसने आने वाले दशकों के लिए भारत की नियति तय की। आपकी पुस्तक के लिए इस अध्याय का विस्तार नीचे दिए गए ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर किया जा सकता है:

अध्याय: 1946 का ऐतिहासिक चुनाव: जब लोकतंत्र पर भारी पड़ा त्याग

1946 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव केवल एक पार्टी पद का चुनाव नहीं था, बल्कि यह भारत के होने वाले पहले प्रधानमंत्री का चुनाव था। उस समय यह स्पष्ट था कि ब्रिटिश सत्ता जिसे अंतरिम सरकार की कमान सौंपेगी, वही स्वतंत्र भारत का नेतृत्व करेगा।

 प्रांतीय समितियों (PCC) का जनादेश

उस समय कांग्रेस के संविधान के अनुसार, अध्यक्ष का चुनाव 15 प्रांतीय कांग्रेस समितियों के नामांकन के आधार पर होता था। 29 अप्रैल 1946 को नामांकन की अंतिम तिथि तक जो परिणाम आए, वे चौंकाने वाले थे:

  • सरदार पटेल: 15 में से 12 समितियों ने सरदार पटेल के नाम का प्रस्ताव दिया।

  • आचार्य कृपलानी: 2 समितियों ने उनका नाम प्रस्तावित किया।

  • जवाहरलाल नेहरू: आश्चर्यजनक रूप से, एक भी प्रांतीय समिति ने नेहरू के नाम का प्रस्ताव नहीं किया था।

गांधीजी का हस्तक्षेप और ‘पर्ची’ की राजनीति

जब गांधीजी ने देखा कि नेहरू के नाम का कहीं उल्लेख नहीं है, तो उन्होंने नेहरू को अवसर देने का निर्णय लिया। गांधीजी का मानना था कि नेहरू अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का बेहतर प्रतिनिधित्व कर सकते हैं और वे सत्ता में “दूसरे स्थान” पर कभी स्वीकार नहीं करेंगे।

  • गांधीजी के संकेत पर, जे.बी. कृपलानी ने कुछ कार्य समिति सदस्यों से नेहरू के पक्ष में नामांकन करवाया, जिसे तकनीकी रूप से ‘अवैध’ माना जाता है क्योंकि अधिकार केवल प्रांतीय समितियों को था।

  • गांधीजी ने नेहरू से कहा, “जवाहर, तुम्हारा नाम किसी समिति ने नहीं लिया है, इस पर तुम्हारा क्या कहना है?” नेहरू ने मौन रहकर स्पष्ट कर दिया कि वे पद से पीछे नहीं हटेंगे।

3. सरदार पटेल का ऐतिहासिक त्याग

गांधीजी ने पटेल को एक पर्ची भेजी, जिस पर उनकी उम्मीदवारी वापस लेने का निर्देश था।

  • अनुशासन का उदाहरण: पटेल जानते थे कि उनके पास पूर्ण बहुमत है, लेकिन गांधीजी के प्रति निष्ठा और देश को राजनीतिक अस्थिरता से बचाने के लिए उन्होंने तुरंत अपना नाम वापस ले लिया।

  • इस निर्णय पर राजमोहन गांधी ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि पटेल को यह हस्तक्षेप पसंद नहीं आया था, लेकिन राष्ट्रहित में उन्होंने ‘नंबर दो’ का पद स्वीकार किया।

यदि पटेल प्रधानमंत्री होते? (विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण)

यह खंड पाठकों को उन संभावनाओं पर विचार करने के लिए मजबूर करेगा जो पटेल के नेतृत्व में हो सकती थीं:

  • कश्मीर मुद्दा: संभवतः पटेल इसे संयुक्त राष्ट्र (UN) नहीं ले जाते और सैन्य समाधान करते।

  • तिब्बत और चीन: पटेल ने 1950 में ही नेहरू को चीन की विस्तारवादी नीति पर चेतावनी दी थी।

  • आर्थिक नीति: वे समाजवाद के बजाय व्यावहारिक स्वदेशी उद्यमिता के समर्थक थे।

अध्याय 3: दिल्ली का सुरक्षा चक्र और ‘गजवा-ए-हिन्द’ की साजिश (1947)

यह अध्याय आपकी पुस्तक का सबसे रोमांचक और रणनीतिक हिस्सा होगा। 1947 के उस दौर में, जब दिल्ली दंगों की आग में जल रही थी, सरदार पटेल ने अपनी सूझबूझ और खुफिया तंत्र (जिसमें संघ की बड़ी भूमिका थी) के जरिए एक बड़े तख्तापलट को रोका था। अगस्त और सितंबर 1947 के बीच दिल्ली केवल देश की राजधानी नहीं थी, बल्कि एक बारूद का ढेर बन चुकी थी। विभाजन की हिंसा के बीच दिल्ली के भीतर एक ‘भीतरी युद्ध’ की योजना बनाई जा रही थी।

साजिश का स्वरूप: ‘किला’ बनाने की तैयारी

खुफिया रिपोर्टों और जमीनी स्तर पर संघ के स्वयंसेवकों से मिली सूचनाओं के अनुसार, दिल्ली के कुछ खास इलाकों (जैसे जामा मस्जिद के पास की गलियाँ, पहाड़गंज और करोल बाग के कुछ हिस्से) को सशस्त्र दुर्ग में बदला जा रहा था।

  • उद्देश्य: भारत सरकार के तंत्र को पंगु बनाना और दिल्ली पर नियंत्रण कर इसे पाकिस्तान के साथ सौदेबाजी या एक ‘इस्लामिक पॉकेट’ के रूप में इस्तेमाल करना।

  • हथियारों का जखीरा: स्थानीय कारखानों में गुपचुप तरीके से ‘मोर्टार’, ‘स्टेनगन’ और भारी मात्रा में बम बनाए जा रहे थे।

RSS की भूमिका: जमीनी खुफिया जानकारी

उस समय सरकारी खुफिया तंत्र (IB) अभी भी पुनर्गठन के दौर में था। ऐसे में RSS के स्वयंसेवकों ने अपनी जान जोखिम में डालकर मुस्लिम बहुल इलाकों और संदिग्ध ठिकानों की टोह ली।

  • संघ के कार्यकर्ताओं ने सरदार पटेल को सूचना दी कि 10 सितंबर के आसपास दिल्ली में एक बड़े ‘विस्फोट’ (तख्तापलट) की तैयारी है।

  • सूचना मिलने पर पटेल ने बिना समय गंवाए सेना और पुलिस के साथ आधी रात को एक आपातकालीन बैठक की।

सरदार पटेल की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’

पटेल ने नेहरू की “शांति बनाए रखने” की अपील के बजाय “सख्ती से कुचलने” की रणनीति अपनाई।

  • छापेमारी: 10 सितंबर 1947 की सुबह, पटेल के आदेश पर दिल्ली के संदिग्ध ठिकानों पर सघन छापेमारी की गई।

  • बरामदगी: इस कार्रवाई में हजारों की संख्या में देसी बम, आधुनिक हथियार और यहाँ तक कि रेडियो ट्रांसमीटर भी बरामद हुए, जिनका उपयोग पाकिस्तान से संपर्क के लिए किया जाना था।

  • कड़ी कार्रवाई: पटेल ने स्पष्ट आदेश दिया— “जो भी हथियार के साथ मिले, उसे वहीं खत्म कर दिया जाए।” इस सख्त कार्रवाई ने साजिशकर्ताओं के हौसले पस्त कर दिए।

नेहरू बनाम पटेल: दृष्टिकोण का अंतर

जब नेहरू ने इन कार्रवाइयों को “अल्पसंख्यकों के खिलाफ कठोरता” कहा, तो पटेल ने दो टूक जवाब दिया:

“मेरा पहला कर्तव्य भारत की राजधानी को सुरक्षित रखना है। अगर हम आज दिल्ली हार गए, तो हम पूरा भारत हार जाएंगे।”

ऐतिहासिक महत्व

इतिहासकारों का मानना है कि यदि 10 सितंबर को वह साजिश सफल हो जाती, तो भारत सरकार को दिल्ली के भीतर ही गृह युद्ध का सामना करना पड़ता। पटेल की तत्परता और संघ से मिली सटीक सूचनाओं ने दिल्ली को एक और ‘बंटवारे’ से बचा लिया।

अध्याय 4: कश्मीर विलय: पटेल, गोलवलकर और संघ की भूमिका

यह अध्याय आपकी पुस्तक का वह महत्वपूर्ण हिस्सा है जो यह स्पष्ट करता है कि जब सरकारी कूटनीति विफल हो रही थी, तब सरदार पटेल ने ‘राष्ट्रवादी नेटवर्क’ का उपयोग कर कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने की नींव रखी थी।

अक्टूबर 1947 में कश्मीर की स्थिति अत्यंत नाजुक थी। नेहरू और राजा हरि सिंह के बीच व्यक्तिगत कड़वाहट (शेख अब्दुल्ला के कारण) इतनी अधिक थी कि संवाद लगभग बंद हो चुका था। राजा हरि सिंह ‘स्वतंत्र’ रहने का सपना देख रहे थे, जबकि पाकिस्तान ‘ऑपरेशन गुलमर्ग’ के तहत आक्रमण की तैयारी कर चुका था।

पटेल का गुप्त मिशन: ‘गुरुजी’ को बुलावा

सरदार पटेल जानते थे कि कश्मीर के डोगरा शासक राजा हरि सिंह एक कट्टर हिंदू राजा हैं और वे कांग्रेस के नेताओं (विशेषकर नेहरू) पर भरोसा नहीं करते। पटेल ने महसूस किया कि केवल एक ही व्यक्ति राजा को भारत के पक्ष में मना सकता है— राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर (गुरुजी)

पटेल ने संदेश भेजकर गुरुजी को दिल्ली बुलाया और उनसे आग्रह किया कि वे श्रीनगर जाकर राजा हरि सिंह को भारत के साथ विलय के लिए राजी करें।

17 अक्टूबर 1947: श्रीनगर में ऐतिहासिक मुलाकात

सरदार पटेल के कहने पर श्री गुरुजी श्रीनगर पहुंचे। राजा हरि सिंह पहले किसी से मिलने को तैयार नहीं थे, लेकिन गुरुजी के व्यक्तित्व और पटेल के संदर्भ के कारण वे मिले।

  • संवाद का मुख्य बिंदु: गुरुजी ने राजा को समझाया कि पाकिस्तान के साथ जाने या स्वतंत्र रहने का अर्थ है—घाटी का पूर्ण विनाश और हिंदुओं का नरसंहार।

  • पटेल का आश्वासन: गुरुजी ने राजा को विश्वास दिलाया कि सरदार पटेल उनके और कश्मीर के सम्मान की रक्षा करेंगे।

  • परिणाम: इस मुलाकात के बाद राजा हरि सिंह का झुकाव भारत की ओर बढ़ा और उन्होंने दिल्ली को सकारात्मक संकेत भेजे।

‘ऑपरेशन कश्मीर’ में संघ के स्वयंसेवकों की भूमिका

जब 22 अक्टूबर को पाकिस्तानी कबाइलियों ने हमला किया, तब भारतीय सेना को पहुंचने में समय लगा। उस संकट काल में पटेल के समन्वय से संघ के स्वयंसेवकों ने अद्भुत कार्य किए:

  • खुफिया जानकारी: स्वयंसेवकों ने जान पर खेलकर कबाइलियों की स्थिति की जानकारी सेना तक पहुंचाई।

  • हवाई पट्टी की मरम्मत: श्रीनगर हवाई अड्डे की हवाई पट्टी को रातों-रात ठीक करने और वहां सेना के उतरने में मदद करने के लिए संघ के स्थानीय स्वयंसेवक सबसे आगे रहे।

  • हथियारों की आपूर्ति: सरकारी तंत्र के सक्रिय होने से पहले, स्थानीय स्वयंसेवकों ने डोगरा सेना के साथ मिलकर मोर्चा संभाला।

नेहरू की ज़िद और पटेल की विवशता

इस अध्याय में उस दुखद मोड़ का भी जिक्र होगा जहाँ पटेल कश्मीर का पूर्ण समाधान (पूरा राज्य भारत में मिलाना) करना चाहते थे, लेकिन नेहरू ने कश्मीर मामले को अपने हाथ में ले लिया और इसे संयुक्त राष्ट्र (UN) ले गए।

  • पटेल ने गोलवलकर जी से कहा था— “कश्मीर नेहरू का मामला है, मैं उसमें तभी हस्तक्षेप कर सकता हूँ जब वे मुझे अनुमति दें।”

अध्याय 5: आरएसएस और कांग्रेस के विलय की योजना

यह अध्याय आपकी पुस्तक का सबसे वैचारिक और रणनीतिक अध्याय होगा। यह उस ‘ग्रैंड विजन’ को दर्शाता है जो सरदार पटेल भारत की राजनीति के लिए रखते थे। वे केवल एक प्रशासक नहीं, बल्कि एक ऐसे दूरदर्शी थे जो भारत की मुख्यधारा की राजनीति को ‘राष्ट्रवादी चरित्र’ देना चाहते थे। गांधीजी की हत्या (1948) के बाद जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगा, तब सरदार पटेल ही वह व्यक्ति थे जिन्होंने संघ और सरकार के बीच संवाद का रास्ता खोला। उनके मन में संघ के प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं था, बल्कि वे संघ की शक्ति को राष्ट्र निर्माण में लगाना चाहते थे।

पटेल का दृष्टिकोण: अनुशासित शक्ति का उपयोग

सरदार पटेल का मानना था कि कांग्रेस एक बहुत बड़ा राजनीतिक मंच तो है, लेकिन विभाजन और सत्ता प्राप्ति के बाद इसके भीतर वैचारिक अनुशासन कम हो रहा था। दूसरी ओर, संघ के पास:

  • कैडर आधारित ढांचा: लाखों समर्पित और अनुशासित स्वयंसेवक।

  • राष्ट्रवादी चरित्र: ऐसे युवा जो निस्वार्थ भाव से राष्ट्र सेवा के लिए तैयार थे।

  • पटेल की सोच: “यदि ये अनुशासित युवा कांग्रेस का हिस्सा बन जाएं, तो कांग्रेस के भीतर पनप रही गुटबाजी और वामपंथी प्रभाव को संतुलित किया जा सकता है।”

10 नवंबर 1949: कांग्रेस कार्य समिति का ऐतिहासिक प्रस्ताव

पटेल के प्रयासों का ही परिणाम था कि 1949 में कांग्रेस कार्य समिति (CWC) ने एक प्रस्ताव पारित किया, जिसके तहत आरएसएस के स्वयंसेवकों को कांग्रेस की सदस्यता लेने की अनुमति दी गई।

  • पटेल चाहते थे कि संघ के लोग कांग्रेस के भीतर रहकर उसके ‘राष्ट्रवादी धड़े’ को मजबूत करें।

  • वे मानते थे कि राजनीतिक शक्ति (कांग्रेस) और सांस्कृतिक शक्ति (संघ) का मिलन भारत को एक अजेय राष्ट्र बना देगा।

नेहरू का विरोध और ‘सांप्रदायिकता’ का तर्क

जवाहरलाल नेहरू इस विचार के धुर विरोधी थे। जब यह प्रस्ताव पारित हुआ, नेहरू विदेश यात्रा पर थे। वापस लौटते ही उन्होंने इस पर कड़ा ऐतराज जताया:

  • वैचारिक टकराव: नेहरू इसे कांग्रेस के ‘धर्मनिरपेक्ष’ स्वरूप पर प्रहार मानते थे।

  • राजनीतिक असुरक्षा: उन्हें भय था कि यदि पटेल के समर्थक और संघ के लोग मिल गए, तो कांग्रेस के भीतर उनका (नेह़रू का) प्रभाव पूरी तरह समाप्त हो जाएगा।

  • परिणाम: नेहरू के भारी दबाव के कारण, कुछ ही हफ्तों बाद कांग्रेस को अपना वह प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

पटेल की भावुक अपील और ‘लौह’ संदेश

प्रतिबंध हटने के बाद पटेल ने संघ को जो पत्र लिखे और सार्वजनिक मंचों से जो कहा, वह आज भी प्रासंगिक है:

“संघ के लोग कांग्रेस के दुश्मन नहीं हैं। वे भी देश से उतना ही प्यार करते हैं जितना हम। बस उनके काम करने का तरीका अलग है।”

पटेल ने गोलवलकर जी (गुरुजी) से भी आग्रह किया था कि संघ को अपनी गतिविधियों को कांग्रेस के साथ जोड़ना चाहिए ताकि देश को वामपंथी अराजकता से बचाया जा सके।

अधूरा सपना और भारतीय राजनीति का नया मोड़

यदि पटेल का यह ‘विलय’ सफल हो जाता, तो शायद भारतीय राजनीति में ‘दक्षिणपंथ बनाम वामपंथ’ की वह खाई कभी पैदा नहीं होती जो आज दिखाई देती है। पटेल की मृत्यु (1950) के साथ ही यह विचार भी दफन हो गया और बाद में संघ के आशीर्वाद से ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना हुई, जिसने कांग्रेस के विकल्प के रूप में अपनी राह चुनी।

अध्याय 6: रियासतों का एकीकरण और आधुनिक भारत का निर्माण

  • जूनागढ़ और हैदराबाद की सैन्य कार्रवाई (ऑपरेशन पोलो)।

  • सोमनाथ मंदिर का पुनरुद्धार: नेहरू के विरोध के बावजूद पटेल का संकल्प।

  • लोक सेवा (IAS/IPS) के जनक के रूप में पटेल का विजन।

उपसंहार: यदि पटेल प्रधानमंत्री होते…

सरदार पटेल का 15 दिसंबर 1950 को जाना केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं था, बल्कि एक ऐसी कार्यशैली का अंत था जिसमें ‘तुष्टिकरण’ के लिए कोई स्थान नहीं था। पुस्तक के इन अध्यायों से गुजरने के बाद एक प्रश्न अनायास ही खड़ा होता है— “यदि सरदार पटेल भारत के प्रथम प्रधानमंत्री होते, तो आज का भारत कैसा होता?”

शायद कश्मीर की समस्या आज वैश्विक मंचों पर न सुलझ रही होती, बल्कि मानचित्र पर एक पूर्ण सत्य होती। शायद 1962 के युद्ध का दंश हमें न झेलना पड़ता, क्योंकि पटेल ने चीन के इरादों को वर्षों पहले पहचान लिया था। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि संघ और कांग्रेस का वह विलय सफल हो जाता जिसका सपना पटेल ने देखा था, तो भारत की राजनीति में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘लोकतांत्रिक शासन’ का एक ऐसा समन्वय होता, जो देश को वैचारिक ध्रुवीकरण से बचा लेता।

पटेल ने देश को एक किया, लेकिन वे स्वयं सत्ता के गलियारों में ‘अकेले’ रह गए। गांधीजी के प्रति उनकी निष्ठा ने उन्हें चुप कराया, और नेहरू के साथ उनके वैचारिक मतभेद ने उन्हें इतिहास के पन्नों में सीमित करने का प्रयास किया। किंतु सत्य को अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता। आज जब भारत अपनी सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा के प्रति जागृत हो रहा है, तब सरदार पटेल के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। यह पुस्तक इस विश्वास के साथ समाप्त होती है कि सरदार पटेल को ‘भारत रत्न’ बहुत देर से मिला, लेकिन भारत के ‘हृदय रत्न’ के रूप में वे सदैव अमर रहेंगे।

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