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श्री गुरुजी और भारतीय संविधान: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम पश्चिमी उदारवाद

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर (श्री गुरुजी)

माधव सदाशिवराव गोलवलकर, जिन्हें ‘श्री गुरुजी’ के नाम से जाना जाता है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के वैचारिक आधार स्तंभ रहे हैं। भारतीय संविधान और राष्ट्र की संरचना पर उनके विचार उस समय की प्रचलित पश्चिमी उदारवादी सोच से काफी भिन्न और ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ पर आधारित थे।

भारतीय संविधान के संदर्भ में उनके विचारों का विस्तृत विश्लेषण निम्नलिखित बिंदुओं में किया जा सकता है:

1. ‘इंडिया’ बनाम ‘भारत’: पहचान का प्रश्न

संविधान के अनुच्छेद 1 में प्रयुक्त वाक्यांश “India, that is Bharat” पर गुरुजी की स्पष्ट आपत्ति थी।

  • ऐतिहासिक निरंतरता: उनका मानना था कि ‘इंडिया’ नाम ब्रिटिश उपनिवेशवाद की देन है और यह एक विच्छेद (break) को दर्शाता है। वे चाहते थे कि देश का नाम केवल ‘भारत’ होना चाहिए।

  • सांस्कृतिक गौरव: उनके अनुसार, ‘भारत’ शब्द केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है जो हजारों वर्षों से निरंतर चली आ रही है। ‘इंडिया’ कहने से ऐसा आभास होता है कि राष्ट्र का जन्म 1947 में हुआ है, जबकि गुरुजी इसे एक सनातन राष्ट्र मानते थे।

2. धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और ‘धर्म’ की अवधारणा

गुरूजी ने पश्चिमी ‘सेक्युलरिज्म’ को भारतीय संदर्भ में अप्रासंगिक माना।

  • धर्म बनाम संप्रदाय: उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिम में ‘Religion’ का अर्थ पूजा पद्धति है, लेकिन भारत में ‘धर्म’ का अर्थ कर्तव्य (Duty) और नैतिक नियम है।

  • राज्य का स्वरूप: उनका तर्क था कि हिंदू संस्कृति स्वभाव से ही सहिष्णु है, इसलिए राज्य को कृत्रिम रूप से ‘धर्मनिरपेक्ष’ घोषित करने की आवश्यकता नहीं थी। उनके अनुसार, एक हिंदू राष्ट्र स्वतः ही सभी मतों का सम्मान करने वाला होता है, क्योंकि “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” (सत्य एक है, विद्वान इसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) भारतीय चिंतन का मूल है।

3. मौलिक अधिकार और व्यक्तिगत कर्तव्य

संविधान जहां व्यक्तिगत अधिकारों (Fundamental Rights) पर जोर देता है, वहीं गुरुजी का दर्शन ‘कर्तव्यों’ और ‘सामूहिकता’ पर केंद्रित था।

  • उनका मानना था कि अधिकारों की अत्यधिक मांग समाज में अनुशासनहीनता पैदा कर सकती है। व्यक्ति को स्वयं को राष्ट्र रूपी ‘विराट पुरुष’ के एक अंग के रूप में देखना चाहिए।

  • वे पश्चिमी व्यक्तिवाद (Individualism) के स्थान पर समाज के प्रति व्यक्ति के उत्तरदायित्व को प्रधानता देते थे।

4. सामाजिक न्याय और वर्ण व्यवस्था पर दृष्टिकोण

संविधान में आरक्षण और सामाजिक समानता के प्रावधानों पर भी उनके विचार उनकी सांस्कृतिक दृष्टि से प्रभावित थे।

  • वे अस्पृश्यता के घोर विरोधी थे और इसे हिंदू समाज के लिए एक ‘कलंक’ मानते थे।

  • हालांकि, वे सामाजिक सुधारों के लिए केवल कानूनी प्रावधानों (संविधान) पर निर्भर रहने के बजाय ‘हृदय परिवर्तन’ और सामाजिक समरसता के माध्यम से एकता लाने के पक्षधर थे।

5. ‘चिति’ और संविधान का प्राण

आपने ‘चिति’ (National Soul) का उल्लेख किया, जो उनके दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।

  • गुरुजी का तर्क था कि किसी भी राष्ट्र का संविधान उसकी अपनी मिट्टी और संस्कृति से उपजना चाहिए।

  • उनका मानना था कि वर्तमान भारतीय संविधान पर पश्चिमी देशों (ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस) का गहरा प्रभाव है, जिससे यह भारत की ‘आध्यात्मिक चेतना’ को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता। उनके लिए संविधान एक ‘मैकेनिकल’ दस्तावेज के बजाय एक ‘ऑर्गेनिक’ (जैविक) विकास होना चाहिए था।

6. लोकतंत्र और ‘लोक-संग्रह’

गुरुजी लोकतंत्र के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे इसे केवल ‘संख्या बल’ का खेल नहीं मानते थे।

  • वे ‘संस्कारित लोकतंत्र’ के पक्षधर थे, जहाँ मतदाता और प्रतिनिधि दोनों राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें।

  • उनका मानना था कि बिना चरित्र निर्माण के, लोकतांत्रिक संस्थाएं भ्रष्टाचार और जातिवाद का अड्डा बन सकती हैं।

श्री गुरुजी के लिए संविधान केवल नियमों की एक किताब नहीं होनी चाहिए थी, बल्कि उसे भारत की ‘चिति’ (National Soul) का दर्पण होना चाहिए था। उनके विचार आज भी भारतीय राजनीति में ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और ‘संवैधानिक सुधारों’ की बहसों में अत्यंत प्रासंगिक माने जाते हैं।

– सारांश कनौजिया

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं.

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