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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 100 वर्ष: शताब्दी यात्रा और भविष्य के संकल्प

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आरएसएस शताब्दी वर्ष विशेष ग्राफिक - मातृभूमि की रक्षा और हिंदू गौरव का पुनर्जागरण।

– सारांश कनौजिया

सन् 1925 में विजयदशमी के दिन नागपुर के मोहिते बाड़े में डॉ. केशव बलीराम हेडगेवार द्वारा रोपित एक छोटा सा बीज आज 100 वर्ष पूर्ण कर एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का यह शताब्दी वर्ष केवल एक संगठन की आयु का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह भारत के ‘स्व’ (Self) की पहचान, सांस्कृतिक गौरव और निरंतर समाज सेवा का एक जीवंत इतिहास है।

वैचारिक अधिष्ठान: “व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण”

संघ का मूल दर्शन इस विचार पर टिका है कि राष्ट्र का उत्थान केवल नारों या सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि नागरिकों के चरित्र निर्माण से संभव है।

  • शाखा पद्धति: अनुशासन, खेल, और राष्ट्रभक्ति के गीतों के माध्यम से व्यक्ति के भीतर सामूहिकता का भाव जगाना।

  • सांस्कृतिक राष्ट्रवाद: भारत को केवल एक भौगोलिक भूमि का टुकड़ा न मानकर एक ‘जीवंत राष्ट्रपुरुष’ मानना।

ऐतिहासिक संघर्ष और निरंतरता

100 वर्षों की यात्रा चुनौतियों से भरी रही है। विभाजन की विभीषिका के समय शरणार्थियों की सहायता हो, या 1975 के आपातकाल में लोकतंत्र की बहाली का संघर्ष, स्वयंसेवकों ने सदैव अग्रणी भूमिका निभाई। तीन बार प्रतिबंध झेलने के बावजूद, संघ की कार्यपद्धति और विस्तार कभी कम नहीं हुआ, क्योंकि इसका आधार ‘समाज’ था।

शताब्दी वर्ष का मुख्य संकल्प: ‘पंच परिवर्तन’

संघ ने अपने 100वें वर्ष को केवल उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार के एक बड़े आंदोलन के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इसके लिए ‘पंच परिवर्तन’ के पांच स्तंभ तय किए गए हैं:

क. सामाजिक समरसता (Social Harmony)

जातिगत भेदभाव को समाप्त कर संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोना। ‘एक मंदिर, एक श्मशान, एक पनघट’ के मंत्र के साथ धरातल पर सह-भोज और सामूहिक उत्सवों के माध्यम से ऊंच-नीच की खाई को पाटना।

ख. कुटुंब प्रबोधन (Family Awakening)

बिखरते परिवारों को बचाने के लिए पारिवारिक मूल्यों का पुनरुद्धार। सप्ताह में एक दिन परिवार के सभी सदस्यों का साथ बैठकर भोजन करना, अपनी परंपराओं पर चर्चा करना और बच्चों में संस्कार डालना इसका मुख्य उद्देश्य है।

ग. पर्यावरण संरक्षण (Environmental Protection)

प्रकृति के साथ समन्वय बिठाने के लिए तीन मुख्य बिंदुओं पर कार्य:

  • जल संरक्षण: पानी का संयमित उपयोग।

  • प्लास्टिक मुक्ति: एकल-उपयोग प्लास्टिक का पूर्ण त्याग।

  • हरियाली: व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण और उनकी देखभाल।

घ. स्वदेशी (Indigenous/Self-reliance)

स्वदेशी का अर्थ केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी भाषा, वेशभूषा, भोजन और चिंतन में भारतीयता का गौरव महसूस करना है। स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देकर भारत को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना इसका लक्ष्य है।

च. नागरिक कर्तव्य (Civic Duty)

अधिकारों के बजाय कर्तव्यों पर बल देना। यातायात नियमों का पालन, समय पर कर का भुगतान, स्वच्छता और मतदान जैसे मूलभूत कर्तव्यों को राष्ट्रभक्ति का हिस्सा बनाना।

सेवा कार्य: आपदा में ढाल बना संघ

संघ के स्वयंसेवक आज समाज के हर क्षेत्र में सक्रिय हैं। ‘सेवा भारती’ और ‘विद्या भारती’ जैसे संगठनों के माध्यम से लाखों सेवा कार्य संचालित हो रहे हैं:

  • शिक्षा: दूरदराज के क्षेत्रों में एकल विद्यालयों के माध्यम से संस्कारित शिक्षा।

  • आपदा प्रबंधन: भूकंप, बाढ़ या कोरोना जैसी महामारी के दौरान बिना किसी भेदभाव के सेवा।

  • वनवासी कल्याण: जनजातीय समाज को मुख्यधारा से जोड़ते हुए उनके सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा।

भविष्य का मार्ग

‘मातृभूमि की रक्षा’ और ‘विश्व गुरु भारत’ का संकल्प तब तक अधूरा है, जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति मुख्यधारा से न जुड़ जाए। शताब्दी वर्ष आत्म-चिंतन का अवसर है। अगले 100 वर्षों के लिए संघ का लक्ष्य एक ऐसा ‘समर्थ भारत’ बनाना है जो वैचारिक रूप से स्वतंत्र, आर्थिक रूप से संपन्न और सामाजिक रूप से समरस हो।

“संघ ही समाज है और समाज ही संघ” – इसी विचार के साथ यह यात्रा अब भारत को परम वैभव पर ले जाने के संकल्प के साथ आगे बढ़ रही है।

संक्षेप तालिका: संघ के 100 वर्ष

आयाम विवरण
स्थापना 1925, नागपुर (डॉ. हेडगेवार द्वारा)
मूल मंत्र व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण
मुख्य उपलब्धि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पुनरुद्धार
शताब्दी संकल्प पंच परिवर्तन (समरसता, कुटुंब, पर्यावरण, स्वदेशी, कर्तव्य)
भविष्य का लक्ष्य भारत को विश्व गुरु बनाना

लेखक मातृभूमि समाचार के संपादक हैं.

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