वाराणसी. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल का ‘एम्स’ कहे जाने वाले काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) स्थित सर सुंदरलाल अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह चरमरा गई हैं। संस्थान के करीब 85 जूनियर रेजिडेंट (JR-1) डॉक्टर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं। इस विरोध प्रदर्शन ने न केवल अस्पताल के प्रबंधन को हिला दिया है, बल्कि दूर-दराज से आए सैकड़ों मरीजों की उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया है।
आखिर क्यों आक्रोशित हैं जूनियर डॉक्टर?
हड़ताल की जड़ में एक बेहद संवेदनशील मामला है। मिली जानकारी के अनुसार, एक महिला जूनियर रेजिडेंट डॉक्टर ने मानसिक उत्पीड़न के चलते आत्महत्या की कोशिश की थी। इस घटना ने जूनियर डॉक्टरों के बीच प्रशासन के प्रति भारी गुस्से को जन्म दिया है।
प्रदर्शनकारी डॉक्टरों का आरोप है कि:
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घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी दोषी वरिष्ठ चिकित्सकों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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अस्पताल प्रशासन मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है।
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आईएमएस (IMS) परिसर में जूनियर डॉक्टरों को अत्यधिक मानसिक दबाव और असुरक्षित वातावरण में काम करना पड़ रहा है।
प्रमुख मांगें: केवल काम नहीं, सम्मान और सुरक्षा भी
इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (IMS) के मुख्य द्वार पर धरना दे रहे डॉक्टरों ने प्रशासन के सामने मांगों की एक लंबी सूची रखी है:
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दोषियों पर तत्काल कार्रवाई: आत्महत्या के लिए उकसाने वाले आरोपितों के खिलाफ सख्त कानूनी और विभागीय कदम उठाए जाएं।
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फिक्स्ड ड्यूटी आवर्स: डॉक्टरों ने मांग की है कि उनके काम के घंटे निश्चित किए जाएं ताकि वे शारीरिक और मानसिक थकान से बच सकें।
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लिखित आश्वासन: डॉक्टर अब मौखिक वादों पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं; वे प्रशासन से ठोस लिखित गारंटी मांग रहे हैं।
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बेहतर कार्य वातावरण: वार्डों और ओपीडी में बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा व्यवस्था में सुधार।
मरीजों की बढ़ी मुश्किलें: 28 वार्डों पर सीधा असर
सर सुंदरलाल अस्पताल में वाराणसी के अलावा बिहार, झारखंड और नेपाल तक से मरीज आते हैं। हड़ताल के कारण:
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करीब 28 वार्डों में तैनात रेजिडेंट्स के हटने से सीनियर डॉक्टरों पर बोझ बढ़ गया है।
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कई महत्वपूर्ण सर्जरी (Operations) टाल दी गई हैं।
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ओपीडी में लंबी कतारें लगी हैं और भर्ती मरीजों की देखभाल प्रभावित हो रही है।
प्रशासन का पक्ष: आईएमएस प्रशासन का कहना है कि उन्होंने मामले की जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दी है। प्रशासन ने अपील की है कि मरीज के हितों को देखते हुए डॉक्टर काम पर लौटें, हालांकि वैकल्पिक व्यवस्थाएं की जा रही हैं लेकिन वे नाकाफी साबित हो रही हैं।
संवाद की कमी पड़ रही भारी
यह कोई पहली बार नहीं है जब बीएचयू में डॉक्टरों ने कार्यशैली को लेकर सवाल उठाए हों। लेकिन इस बार एक डॉक्टर का जान देने की कोशिश करना स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। जब तक प्रशासन और रेजिडेंट्स के बीच ‘डेडलॉक’ (गतिरोध) खत्म नहीं होता, तब तक गरीब मरीजों को बिना इलाज के लौटना पड़ सकता है।
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