भुवनेश्वर । गुरुवार, 18 जून 2026
भारत का भूगर्भीय इतिहास रहस्यों और अजूबों से भरा पड़ा है। इसी कड़ी में ओडिशा के मयूरभंज जिले से एक ऐसी वैज्ञानिक खोज सामने आई है, जिसने वैज्ञानिकों और इतिहासकारों को हैरान कर दिया है। मयूरभंज के बारीपदा फॉसिल बेड क्षेत्र में शोधकर्ताओं को करीब डेढ़ करोड़ (1.5 करोड़) वर्ष पुराने समुद्री जीवाश्म मिले हैं। इस खोज ने इस बात पर पक्की मुहर लगा दी है कि आज का बारीपदा और उसके आस-पास का मैदानी इलाका कभी गहरे या उथले समंदर के नीचे डूबा हुआ था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज ओडिशा के प्रागैतिहासिक इतिहास (Prehistoric History) और हमारे देश के भूगर्भीय विकास को समझने में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी।
‘दानवों की हड्डियां’ (असुरा हड्डा) जिन्हें लोग समझते थे अंधविश्वास
इस खोज की शुरुआत बेहद दिलचस्प तरीके से हुई। महाराजा श्रीराम चंद्र भंज देव (MSCB) विश्वविद्यालय के जीआईएस (GIS) विभाग के प्रोफेसर और शोधकर्ता डॉ. देवव्रत नंदी अपने छात्रों के साथ एक शैक्षणिक भ्रमण (Educational Tour) पर निकले थे।
कुलियाना ब्लॉक के डेरा से लेकर बड़साही ब्लॉक के प्रतापपुर तक फैले इस पूरे इलाके में स्थानीय लोग जमीन से निकलने वाले कुछ अजीबोगरीब पत्थरों और अवशेषों को “असुरा हड्डा” यानी ‘दानवों की हड्डियां’ कहकर पुकारते थे। स्थानीय लोककथाओं में इसे प्राचीन राक्षसों के अवशेष माना जाता था। लेकिन जब डॉ. नंदी और उनकी टीम ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इसकी जांच की, तो सच्चाई कुछ और ही निकली।
मियोसीन काल की समृद्ध समुद्री जैव विविधता
वैज्ञानिक जांच में सामने आया कि ये अवशेष असल में मियोसीन काल (Miocene Epoch) के हैं, जो आज से लगभग 1.5 करोड़ वर्ष पुराना समय था। इस जगह से शोधकर्ताओं को जो जीवाश्म मिले हैं, उनमें शामिल हैं:
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शार्क के प्राचीन दांत और कशेरुकाएं (Vertebrae)
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प्राचीन मछलियों की हड्डियां
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मोलस्क (Mollusks) के सख्त खोल
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सूक्ष्म समुद्री जीवों (Microscopic Marine Organisms) के अवशेष
वैज्ञानिक विश्लेषण: हैरान करने वाली बात यह है कि मिले कुल जीवाश्मों में से लगभग 50% अवशेष केवल शार्क प्रजातियों से संबंधित हैं। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि करोड़ों साल पहले इस उथले समुद्र में शार्क और अन्य समुद्री जीवों की एक बेहद समृद्ध और घनी आबादी वास करती थी।
वैज्ञानिकों के सामने बड़ा सवाल: 60 किलोमीटर पीछे कैसे हटा समंदर?
इस बेमिसाल खोज ने वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी पहेली भी खड़ी कर दी है। वर्तमान भौगोलिक स्थिति को देखें, तो बारीपदा का यह फॉसिल बेड क्षेत्र आधुनिक बंगाल की खाड़ी के तट से लगभग 60 किलोमीटर दूर अंदरूनी हिस्से में स्थित है।
अब वैज्ञानिक इस बात की गहराई से पड़ताल करने में जुट गए हैं कि आखिर वो कौन से कारण थे जिनकी वजह से समुद्र इस इलाके से 60 किलोमीटर पीछे चला गया? इसके पीछे मुख्य रूप से तीन संभावित कारण माने जा रहे हैं:
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प्राचीन जलवायु परिवर्तन (Climate Change): करोड़ों सालों के दौरान पृथ्वी के तापमान में आए बड़े बदलाव।
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भूगर्भीय हलचलें (Tectonic Shifts): भारतीय टेक्टोनिक प्लेट की हलचल के कारण जमीन का ऊपर उठना।
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महा-प्राकृतिक आपदा (Natural Catastrophe): कोई ऐसी बड़ी सुनामी या प्राकृतिक बदलाव जिसने भूगोल बदल दिया।
ओडिशा में फॉसिल पार्क और जियो-टूरिज्म की उठने लगी मांग
डॉ. देवव्रत नंदी और अन्य भू-वैज्ञानिकों ने अब सरकार से इस पूरे क्षेत्र को जियो-हेरिटेज साइट (Geo-Heritage Site) घोषित करने की मांग की है। विशेषज्ञों का कहना है कि ओडिशा में मियोसीन काल के जीवाश्मों का यह एकमात्र और सबसे समृद्ध ज्ञात स्थल है।
अगर यहाँ एक अत्याधुनिक फॉसिल पार्क (Fossil Park) विकसित किया जाता है, तो इससे न केवल दुनिया भर के वैज्ञानिकों को अनुसंधान (Research) में मदद मिलेगी, बल्कि ओडिशा में जियो-टूरिज्म (Geo-Tourism) को एक नई और वैश्विक पहचान मिलेगी। आने वाली पीढ़ी स्कूल-कॉलेज के स्तर से ही भारत के इस अनमोल प्रागैतिहासिक इतिहास को करीब से देख और समझ सकेगी।
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