प्रयागराज । अपडेटेड : बुधवार, 8 जुलाई 2026
प्रयागराज में त्रिवेणी संगम की रेती पर आयोजित होने वाला माघ मेला इस बार न केवल करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है, बल्कि यह एक बड़े धार्मिक और कानूनी विवाद का अखाड़ा भी बन चुका है। ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य कहे जाने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और प्रयागराज मेला प्रशासन के बीच का गतिरोध अब पूरी तरह से राजनीतिक और कानूनी रूप ले चुका है।
विवाद की शुरुआत: मौनी अमावस्या पर हंगामा
विवाद की मुख्य चिंगारी 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के मुख्य स्नान पर्व पर सुलगी। जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद अपनी पारंपरिक पालकी, छत्र और रथ के साथ संगम स्नान के लिए प्रस्थान कर रहे थे, तब पुलिस प्रशासन ने अत्यधिक भीड़ (करीब 4.5 करोड़ श्रद्धालु) का हवाला देकर उन्हें रथ से उतरकर पैदल जाने को कहा।
इसी दौरान शंकराचार्य के शिष्यों और पुलिस के बीच तीखी झड़प और धक्का-मुक्की हुई। शिष्यों का आरोप है कि पुलिस ने बल प्रयोग किया जिससे स्वामी जी का ‘छत्र’ टूट गया। इस अपमान के विरोध में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने स्नान नहीं किया और त्रिवेणी मार्ग पर स्थित अपने शिविर के बाहर ही अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए।
प्रशासन का 24 घंटे का नोटिस और कानूनी पेच
20 जनवरी 2026 को इस मामले ने तब नया मोड़ ले लिया जब प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक औपचारिक कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। प्रशासन ने सीधे तौर पर उनके ‘शंकराचार्य’ पद की वैधता पर ही सवाल उठा दिए हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला: प्रशासन का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2022 में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पट्टाभिषेक (Consecration) पर अंतरिम रोक (Stay) लगाई थी। चूंकि मामला अभी अदालत में विचाराधीन है, इसलिए वे आधिकारिक प्रोटोकॉल के लिए इस पदवी का उपयोग नहीं कर सकते।
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जमीन आवंटन का तर्क: मेला अधिकारियों के मुताबिक, माघ मेले में जमीन का आवंटन किसी ‘शंकराचार्य’ के नाम पर नहीं, बल्कि एक पंजीकृत संस्था के नाम पर किया गया है।
क्या है ज्योतिष पीठ का मुख्य विवाद?
यह पूरा विवाद सितंबर 2022 में द्वारका-शारदा पीठ और ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के ब्रह्मलीन होने के बाद शुरू हुआ। उन्होंने अपनी वसीयत में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ज्योतिष पीठ (बदरिकाश्रम) का उत्तराधिकारी घोषित किया था।
| पक्ष | मुख्य तर्क और आधार |
| स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद | स्वामी स्वरूपानंद की वसीयत और संत समाज का समर्थन उन्हें वैध शंकराचार्य बनाता है। उनके वकीलों के अनुसार यह एक धार्मिक पदवी है, कोई सरकारी पद नहीं। |
| मेला प्रशासन / विपक्षी पक्ष | स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती के पक्ष और सुप्रीम कोर्ट की रोक के कारण उन्हें आधिकारिक तौर पर ‘शंकराचार्य’ के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती। |
| शास्त्र सम्मत मत | सनातन परंपरा के कुछ विद्वानों का मानना है कि जब तक चारों पीठों के शंकराचार्यों की सर्वसम्मति न हो, तब तक चयन प्रक्रिया अधूरी रहती है। |
गरमाई सियासत
इस धार्मिक टकराव में अब राजनीति भी पूरी तरह प्रवेश कर चुकी है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर बात कर उनके प्रति एकजुटता जताई और प्रशासन के इस रवैये को “अशॉभनीय” करार दिया। विपक्ष इसे सरकार की संतों के प्रति असंवेदनशीलता के रूप में प्रचारित कर रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
Q1. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद इस समय धरने पर क्यों बैठे हैं?
Ans: मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान के दौरान पुलिस प्रशासन द्वारा उनके रथ को रोकने और शिष्यों के साथ हुई धक्का-मुक्की को अपना अपमान बताते हुए वे प्रयागराज माघ मेले में धरने पर बैठे हैं।
Q2. प्रशासन उन्हें ‘शंकराचार्य’ मानने से क्यों इनकार कर रहा है?
Ans: प्रशासन का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके पट्टाभिषेक समारोह पर रोक लगा रखी है और मामला कोर्ट में लंबित है, इसलिए उन्हें आधिकारिक तौर पर शंकराचार्य का प्रोटोकॉल नहीं दिया जा सकता।
Q3. ज्योतिष पीठ का विवाद कब से चल रहा है?
Ans: यह विवाद स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के जीवित रहते समय से ही स्वामी वासुदेवानंद और उनके बीच चल रहा था, जो उनके निधन (सितंबर 2022) के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के उत्तराधिकार पर और गहरा गया।
Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी वर्तमान समाचार घटनाक्रमों और न्यायालय में लंबित मामलों के विवरण पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या विचाराधीन न्यायिक प्रक्रिया पर टिप्पणी करना नहीं है।
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