ऐतरेय उपनिषद ऋग्वेद के ऐतरेय आरण्यक का हिस्सा है। आकार में छोटा होने के बावजूद, यह अपने भीतर ब्रह्मांड के सबसे बड़े सत्य “प्रज्ञानं ब्रह्म” (Consciousness is Brahman) को समेटे हुए है। इसके रचयिता ऋषि महिदास ऐतरेय माने जाते हैं।
1. सृष्टि की उत्पत्ति का तत्वज्ञान (Cosmology)
उपनिषद के प्रथम अध्याय में सृष्टि रचना की एक मनोवैज्ञानिक व्याख्या मिलती है। यह कहता है कि सृष्टि के प्रारंभ में न आकाश था, न पृथ्वी, केवल ‘आत्मा’ थी।
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ईक्षण (Vision): परमात्मा ने विचार किया कि उसे लोकों की रचना करनी चाहिए। यह दर्शाता है कि सृष्टि का आधार पदार्थ (Matter) नहीं, बल्कि विचार (Thought) है।
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अम्भ, मरीचि, मर और आप: उसने चार लोकों की रचना की—स्वर्ग से ऊपर का लोक, अंतरिक्ष, पृथ्वी और पाताल।
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विराट पुरुष: परमात्मा ने इन लोकों के संचालन के लिए एक ‘पुरुष’ (Cosmic Being) की रचना की, जिसके अंगों से इंद्रियाँ और उनके अधिष्ठाता देवता (जैसे सूर्य से आँख, अग्नि से वाणी) उत्पन्न हुए।
2. ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ – सर्वोच्च दर्शन
तृतीय अध्याय इस उपनिषद का हृदय है। इसमें एक गहन प्रश्न पूछा गया है: “वह आत्मा कौन है जिसकी हम उपासना करते हैं?”
इसके उत्तर में ऋषि बताते हैं कि जिसे हम हृदय, मन, संज्ञान, धारणा, मेधा, दृष्टि, धृति (धैर्य), स्मृति, संकल्प या प्राण कहते हैं—ये सब ‘प्रज्ञान’ के ही नाम हैं।
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सूत्र: “प्रज्ञानं ब्रह्म” (शुद्ध चेतना ही ब्रह्म है)।
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व्याख्या: यह संसार चेतना द्वारा ही बनाया गया है, चेतना में ही स्थित है और चेतना ही इसका आधार है। यदि चेतना न हो, तो न ज्ञान संभव है और न ही अस्तित्व।
3. जीव के तीन जन्म और विकास
द्वितीय अध्याय में ऋषि वामदेव के माध्यम से जीव की यात्रा बताई गई है। यह खंड पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को स्पष्ट करता है:
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प्रथम जन्म: पिता के शरीर से माता के गर्भ में प्रवेश।
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द्वितीय जन्म: माता के गर्भ से सुरक्षित बाहर निकलना (शारीरिक जन्म)।
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तृतीय जन्म: इस शरीर को त्याग कर कर्मों के अनुसार अगले शरीर में जाना।
विशेषता: ऋषि वामदेव कहते हैं कि “जब मैं गर्भ में था, तभी मुझे बोध हो गया कि मैं परमात्मा हूँ।” यह सिद्ध करता है कि ज्ञान किसी आयु या परिस्थिति का मोहताज नहीं है।
4. व्यावहारिक जीवन में उपनिषद की प्रासंगिकता
आज के दौर में ऐतरेय उपनिषद का दर्शन “मानसिक स्वास्थ्य” और “स्वयं की खोज” के लिए अत्यंत प्रभावशाली है:
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साक्षी भाव (The Observer): उपनिषद सिखाता है कि हम अपने विचारों और दुखों से अलग हैं। हम वह ‘प्रज्ञान’ हैं जो इन्हें देख रहा है। यह तनाव और अवसाद (Depression) को कम करने का सबसे बड़ा हथियार है।
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समानता का भाव: जब हम यह जान लेते हैं कि प्रत्येक जीव में वही एक चेतना है, तो नफरत और भेदभाव स्वतः समाप्त हो जाते हैं।
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निर्भयता: यह जानकर कि आत्मा अजर-अमर है, मनुष्य मृत्यु और असुरक्षा के भय से मुक्त हो जाता है।
सृष्टि रचना
ऐतरेय उपनिषद के अनुसार ‘सृष्टि रचना’ (Cosmogenesis) की प्रक्रिया अत्यंत वैज्ञानिक और क्रमबद्ध है। इसमें बताया गया है कि यह ब्रह्मांड शून्य से नहीं, बल्कि एक ‘परम चेतना’ के संकल्प से उत्पन्न हुआ है।
इस प्रक्रिया को हम निम्नलिखित चार चरणों में विस्तार से समझ सकते हैं:
1. संकल्प (The Divine Intent)
सृष्टि के आरंभ में केवल ‘आत्मा’ (परमात्मा) थी। वहाँ न समय था, न स्थान। तब उस परमात्मा में एक विचार उत्पन्न हुआ:
“स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति” (उसने संकल्प किया—मैं लोकों की रचना करूँ।)
यह दर्शाता है कि विचार ही समस्त पदार्थ (Matter) की जननी है।
2. चार लोकों की रचना (Creation of the Four Realms)
परमात्मा ने सबसे पहले चार स्तरों या क्षेत्रों का निर्माण किया, जिन्हें ‘अम्ब’ आदि नामों से जाना जाता है:
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अम्भ (Ambhas): स्वर्ग से भी ऊपर स्थित जल या सूक्ष्म तत्व।
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मरीचि (Marichi): अंतरिक्ष या प्रकाश का क्षेत्र।
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मर (Mara): पृथ्वी लोक (मृत्यु लोक), जहाँ जीव जन्म लेते हैं और मरते हैं।
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आप (Apah): पृथ्वी के नीचे का जल या पाताल लोक।
3. विराट पुरुष की उत्पत्ति (The Manifestation of Cosmic Man)
लोकों की रचना के बाद, उन पर शासन करने और उन्हें जीवंत बनाने के लिए एक रूप की आवश्यकता थी। परमात्मा ने ‘जल’ से एक ‘पुरुष’ (विराट पुरुष) को निकाला और उसे आकार दिया।
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यह विराट पुरुष ब्रह्मांड का ब्लूप्रिंट (Blueprint) था।
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जैसे अंडे से पक्षी निकलता है, वैसे ही इस पुरुष के अंगों से विभिन्न शक्तियों का जन्म हुआ।
4. इंद्रियों और देवताओं का प्रकट होना (The Senses and Deities)
इस विराट पुरुष के अंगों से ब्रह्मांडीय शक्तियों (Deities) का उदय हुआ, जो बाद में मनुष्य के शरीर का आधार बनीं:
| अंग (Organ) | शक्ति/देवता (Cosmic Power) | कार्य (Function) |
| मुख | अग्नि (Fire) | वाणी (Speech) |
| नासिका | वायु (Air) | प्राण (Breath) |
| नेत्र | आदित्य/सूर्य (Sun) | चक्षु (Vision) |
| श्रोत्र (कान) | दिशाएँ (Directions) | श्रवण (Hearing) |
| त्वचा | ओषधि-वनस्पति | रोम (Senses of Touch) |
| हृदय | चंद्रमा (Moon) | मन (Mind) |
5. परमात्मा का प्रवेश (The Entry of Consciousness)
सृष्टि और शरीर बन जाने के बाद, परमात्मा ने सोचा—”मेरे बिना यह शरीर कैसे जीवित रहेगा?”
तब परमात्मा ने उस शरीर के शीर्ष (मस्तिष्क के सबसे ऊपरी हिस्से, जिसे ‘विदारण’ या ‘ब्रह्मरंध्र’ कहा जाता है) को चीरकर भीतर प्रवेश किया।
दार्शनिक संदेश: यही कारण है कि मनुष्य के भीतर बैठा ‘द्रष्टा’ (देखने वाला) साक्षात् परमात्मा ही है। यह रचना प्रक्रिया यह सिद्ध करती है कि हमारा शरीर केवल मिट्टी का ढेला नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांडीय शक्तियों का एक लघु रूप (Microcosm) है।
निष्कर्ष
ऐतरेय उपनिषद की सृष्टि रचना हमें यह सिखाती है कि:
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ईश्वर बाहर कहीं नहीं, बल्कि हमारे ही भीतर ‘प्रज्ञान’ के रूप में स्थित है।
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ब्रह्मांड की हर शक्ति (सूर्य, वायु, अग्नि) हमारे शरीर की इंद्रियों से जुड़ी है।
जीव की यात्रा
ऐतरेय उपनिषद के द्वितीय अध्याय में ‘जीव की यात्रा’ का अत्यंत मार्मिक और दार्शनिक वर्णन किया गया है। यहाँ ऋषि यह स्पष्ट करते हैं कि एक जीवात्मा मोक्ष प्राप्त करने से पहले किन अवस्थाओं से गुजरती है। इसे ‘पुरुष के तीन जन्म’ के सिद्धांत के रूप में जाना जाता है।
जीव की यात्रा के तीन पड़ाव (The Three Births)
ऋषि महिदास ऐतरेय के अनुसार, एक आत्मा की यात्रा निम्नलिखित तीन चरणों में पूर्ण होती है:
1. प्रथम जन्म: पिता के शरीर में (In the Father)
यात्रा की शुरुआत पुरुष (पिता) से होती है। उपनिषद कहता है कि पुरुष के भीतर जो वीर्य या तेज है, वह उसके सभी अंगों का सार है।
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दर्शन: पिता अपनी ही आत्मा को पुत्र के रूप में धारण करता है। जब वह इसे माता के गर्भ में स्थापित करता है, तो यह जीव का पहला जन्म माना जाता है। यहाँ जीव अदृश्य रूप से सक्रिय होता है।
2. द्वितीय जन्म: माता के गर्भ से बाहर (In the Mother)
जब जीव माता के गर्भ में आता है, तो वह माता का ही एक अंग बन जाता है, इसीलिए माता को उसे पोषण देने में कष्ट नहीं होता।
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पोषण: माता उस गर्भस्थ शिशु का पोषण करती है और पिता जन्म के बाद उसका संस्कार करता है।
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दर्शन: जब बालक का जन्म होता है और वह इस संसार में पहली बार साँस लेता है, तो उसे जीव का दूसरा जन्म कहा जाता है।
3. तृतीय जन्म: मृत्यु के उपरांत (After Death)
मनुष्य अपना जीवन जीता है, अपने कर्तव्यों (ऋणों) को पूरा करता है और वृद्ध होकर शरीर त्याग देता है।
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दर्शन: शरीर त्यागने के बाद, जीव अपने कर्मों के अनुसार एक नए शरीर की ओर प्रस्थान करता है। इस नई योनि या शरीर को प्राप्त करना तीसरा जन्म कहलाता है।
ऋषि वामदेव का दृष्टांत (The Story of Rishi Vamadeva)
जीव की इस यात्रा के वर्णन के बीच में ऋषि वामदेव का एक प्रसिद्ध प्रसंग आता है। यह प्रसंग इस यात्रा का उद्देश्य समझाता है:
“जब मैं गर्भ में था, तभी मैंने देवताओं के सभी जन्मों को जान लिया। सौ लोहे के पिंजरों (सांसारिक बंधनों) ने मुझे जकड़ रखा था, लेकिन मैं बाज (Shyena) की तरह तीव्र वेग से उन्हें काटकर बाहर निकल आया।”
इसका दार्शनिक अर्थ: वामदेव ने गर्भ के भीतर ही आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लिया था। उन्होंने समझ लिया था कि जीव की असली यात्रा शरीर बदलना नहीं, बल्कि इस जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होना है। जैसे ही उन्हें बोध हुआ कि वह शरीर नहीं बल्कि ‘ब्रह्म’ हैं, उनकी यात्रा पूर्ण हो गई और वे ‘अमृत’ (अमरता) को प्राप्त हुए।
जीव की यात्रा का लक्ष्य: मोक्ष
ऐतरेय उपनिषद यह संदेश देता है कि यद्यपि जीव इन तीन जन्मों के चक्र में घूमता रहता है, लेकिन इस यात्रा का अंतिम गंतव्य ‘प्रज्ञान’ (शुद्ध चेतना) को पहचानना है।
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अज्ञान में यात्रा: शरीर से शरीर का सफर।
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ज्ञान में यात्रा: स्वयं को पहचान कर परमात्मा में विलीन हो जाना।
व्यावहारिक निष्कर्ष
जीव की इस यात्रा को समझने का लाभ यह है कि:
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संसार से वैराग्य: यह बोध कि शरीर अस्थायी है और हम केवल एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव पर जा रहे हैं।
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मृत्यु का भय कम होना: मृत्यु अंत नहीं, बल्कि तीसरे जन्म की एक प्रक्रिया है।
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आत्म-बोध की प्रेरणा: वामदेव की तरह इसी जन्म में सत्य को जानने की जिज्ञासा पैदा करना।
प्रज्ञानं ब्रह्म
“प्रज्ञानं ब्रह्म” (Prajnanam Brahma) ऐतरेय उपनिषद का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है। यह ऋग्वेद का महावाक्य है। इसका अर्थ है— “चेतना ही ब्रह्म है” (Consciousness is Brahman)।
यह वाक्य केवल एक दार्शनिक विचार नहीं है, बल्कि वास्तविकता का अंतिम सत्य है। आइए इसे गहराई से समझते हैं:
1. शब्दों का अर्थ (Etymology)
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प्रज्ञानं (Prajnanam): ‘प्र’ (विशेष) + ‘ज्ञानं’ (बोध)। इसका अर्थ केवल किताबी जानकारी नहीं, बल्कि वह ‘शुद्ध चेतना’ (Pure Intelligence/Consciousness) है जिसके कारण हम जीवित हैं और अनुभव कर पा रहे हैं।
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ब्रह्म (Brahman): वह अनंत तत्व जो पूरे ब्रह्मांड का आधार है। जो सबसे बड़ा है और जिससे सब कुछ उत्पन्न हुआ है।
2. ‘प्रज्ञान’ क्या है? (What is Consciousness?)
उपनिषद के तीसरे अध्याय में ऋषि प्रश्न करते हैं कि वह कौन है जिससे हम देखते हैं, सुनते हैं और सोचते हैं? अंततः वे निष्कर्ष निकालते हैं कि:
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आँखें केवल यंत्र हैं, लेकिन देखने वाला प्रज्ञान है।
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मन केवल एक विचार है, लेकिन मन को जानने वाला प्रज्ञान है।
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बुद्धि केवल निर्णय लेती है, लेकिन बुद्धि को प्रकाश देने वाला प्रज्ञान है।
निष्कर्ष: सृष्टि की हर चीज़ (जड़ और चेतन) इसी प्रज्ञान के आधार पर टिकी है।
3. प्रज्ञानं ब्रह्म के विभिन्न आयाम
उपनिषद कहता है कि प्रज्ञान ही निम्नलिखित रूपों में अभिव्यक्त होता है:
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संज्ञान (Perception): इंद्रियों के माध्यम से होने वाला अनुभव।
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आज्ज्ञान (Command): शासन करने की शक्ति।
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विज्ञान (Logic): कला और विज्ञान का ज्ञान।
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मेधा (Intelligence): धारण करने की शक्ति।
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धृति (Resolution): धैर्य और संकल्प।
चाहे वह इंद्र देव हों, मनुष्य हों, पशु-पक्षी हों या पेड़-पौधे—सबके भीतर एक ही ‘प्रज्ञान’ (चेतना) काम कर रही है। अंतर केवल उसकी अभिव्यक्ति की मात्रा में है।
4. दार्शनिक महत्व: ‘अद्वैत’ का अनुभव
यह महावाक्य हमें बताता है कि ईश्वर कोई दूर आकाश में बैठा व्यक्ति नहीं है।
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यदि ब्रह्म ‘प्रज्ञान’ है, और प्रज्ञान मेरे भीतर की ‘चेतना’ है, तो इसका अर्थ है कि मैं और ब्रह्म एक ही हैं।
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यह हमें ‘द्वैत’ (मैं और ईश्वर अलग हैं) से ‘अद्वैत’ (सब कुछ एक ही चेतना है) की ओर ले जाता है।
5. व्यावहारिक अनुभव (The Experience)
इसे जीवन में उतारने के लिए ऋषि तीन चरणों का सुझाव देते हैं:
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श्रवण: इस सत्य को सुनना कि ‘मैं चेतना हूँ’।
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मनन: इस पर विचार करना कि शरीर और मन बदलते रहते हैं, लेकिन जो इन्हें देख रहा है (साक्षी), वह कभी नहीं बदलता।
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निदिध्यासन: ध्यान में उस शुद्ध चेतना के साथ एक होना।
संक्षिप्त सारणी
| बिंदु | विवरण |
| स्त्रोत | ऐतरेय उपनिषद (ऋग्वेद) |
| प्रकृति | महावाक्य (अंतिम सत्य की घोषणा) |
| संदेश | ब्रह्मांड की सर्वोच्च शक्ति और हमारी आत्मा की चेतना एक ही है। |
| परिणाम | भय, अहंकार और भेदभाव का अंत। |
“प्रज्ञानं ब्रह्म” का बोध होने पर व्यक्ति यह समझ जाता है कि वह लहर नहीं, बल्कि पूरा सागर है।
ऐतरेय उपनिषद हमें एक सीमित ‘व्यक्ति’ से उठाकर एक असीमित ‘चेतना’ बनने की प्रेरणा देता है। यह हमें सिखाता है कि हम इस ब्रह्मांड के केवल एक छोटे से हिस्से नहीं हैं, बल्कि यह पूरा ब्रह्मांड हमारे भीतर की चेतना का ही विस्तार है।
“ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता…” (मेरी वाणी और मन एक हों) – यह प्रार्थना हमें कथनी और करनी की एकता सिखाती है, जो सफल जीवन का आधार है।
Matribhumisamachar


