लोड हो रहा है...

ईरान-इज़राइल युद्ध के बीच शशि थरूर का ‘मास्टरस्ट्रोक’, अपनी ही पार्टी के रुख के उलट मोदी सरकार का किया समर्थन

Saransh Kanaujia
Saransh Kanaujia - Editor
4 Min Read

नई दिल्ली. मध्य पूर्व (West Asia) में ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारत की घरेलू राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। एक तरफ जहां विपक्ष देश में गहराते एलपीजी (LPG) और पेट्रोल-डीजल संकट को लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के दिग्गज नेता शशि थरूर के एक लेख ने अपनी ही पार्टी के रुख के उलट सरकार की ‘रणनीतिक चुप्पी’ का समर्थन कर सबको चौंका दिया है।

1. संजय सेठ का राहुल गांधी पर वार: “थरूर से सीखें जिम्मेदारी”

भाजपा सांसद और केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने शनिवार को शशि थरूर की जमकर तारीफ की। उन्होंने थरूर को एक “सच्चा देशभक्त” बताते हुए कहा कि राष्ट्रीय हितों के मुद्दों पर वे हमेशा दलगत राजनीति से ऊपर उठकर बात करते हैं।

सेठ ने कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी पर तीखा तंज कसते हुए कहा:

“हर मुद्दे पर केवल विरोध करना विपक्ष का काम नहीं होना चाहिए। शशि थरूर जानते हैं कि देश के हित में कब साथ खड़ा होना है। राहुल गांधी को उनसे सीखना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय संकट के समय जिम्मेदारी कैसे निभाई जाती है।”

2. शशि थरूर का ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ फॉर्मूला: क्यों है भारत चुप?

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने अपने हालिया लेख और साक्षात्कारों में भारत सरकार के ‘कैलिब्रेटेड न्यूट्रैलिटी’ (सुलझी हुई तटस्थता) वाले रुख को सही ठहराया है। उनके विश्लेषण के मुख्य बिंदु:

  • चुप्पी कमजोरी नहीं: थरूर के अनुसार, इस संवेदनशील समय में भारत की चुप्पी ‘नैतिक आत्मसमर्पण’ नहीं बल्कि “प्रूडेंट डिप्लोमेसी” (विवेकपूर्ण कूटनीति) है।

  • नेहरूवादी नीति का विस्तार: उन्होंने इसे जवाहरलाल नेहरू की ‘गुटनिरपेक्षता’ का आधुनिक संस्करण यानी “मल्टी-अलाइनमेंट” बताया, जहां भारत अमेरिका, इज़राइल और ईरान—तीनों के साथ अपने संबंधों को संतुलित कर रहा है।

  • राष्ट्रीय हित सर्वोपरि: थरूर ने माना कि ईरान पर हमला अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन हो सकता है, लेकिन भारत का चुप रहना अपने ऊर्जा हितों और लाखों प्रवासियों की सुरक्षा के लिए जरूरी है।

3. गैस संकट का सच: क्या वाकई किल्लत है?

विपक्ष के “गैस संकट” के दावों को खारिज करते हुए केंद्रीय मंत्री संजय सेठ ने स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति के कारण भारत की ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित है।

वर्तमान स्थिति की बड़ी बातें:

  • आपूर्ति: सरकार का दावा है कि रूस और अन्य गैर-खाड़ी देशों से तेल का आयात बढ़ाकर ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के व्यवधान को कम किया गया है।

  • कीमतें: हालांकि वैश्विक बाजार में कच्चा तेल $115 प्रति बैरल को पार कर गया है, लेकिन भारत में सरकार ने कीमतों को स्थिर रखने के लिए विशेष प्रावधान किए हैं।

  • विपक्ष का आरोप: राहुल गांधी ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि “दर्द अभी शुरू हुआ है” और आने वाले दिनों में एलपीजी की भारी किल्लत हो सकती है।

डेटा और कूटनीति: एक नज़र में

मुद्दासरकार का पक्षविपक्ष (राहुल गांधी) का पक्षथरूर का स्टैंड
ऊर्जा सुरक्षापर्याप्त भंडार उपलब्ध है।गैस और तेल की भारी किल्लत।आपूर्ति प्रभावित है, पर संयम जरूरी।
रणनीतिक चुप्पीराष्ट्रीय हित में मौन कूटनीति।सरकार की ‘डरपोक’ नीति।यह “रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट” है।
ईरान संबंधसंतुलित और व्यापारिक।ऐतिहासिक मित्र को छोड़ने का आरोप।संवेदना जतानी चाहिए थी, पर युद्ध से दूर रहना सही।

आगे क्या होगा?

ईरान-इज़राइल तनाव यदि और खिंचता है, तो भारत के लिए अपनी ऊर्जा सुरक्षा और मुद्रास्फीति (Inflation) को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती होगी। क्या कांग्रेस थरूर के इस ‘अलग सुर’ पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगी या इसे पार्टी के भीतर “लोकतांत्रिक विमर्श” मानकर छोड़ देगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

Related Post

Share This Article
Follow:
लेखक वर्ष 2011 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं। अब तक वे इतिहास से जुड़ी चार पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं—‘भारत : 1857 से 1957 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘भारत : 1885 से 1950 इतिहास पर एक दृष्टि’, ‘गाँधी जी की राजनीतिक यात्रा के कुछ पन्ने’ और ‘1857 का स्वतंत्रता समर – कारण से परिणाम तक’। पत्रकारिता के क्षेत्र में वे विशेष रूप से राजनीति, अर्थव्यवस्था, सामाजिक विषयों और आध्यात्म से जुड़े समाचारों एवं विषयों पर लेखन करते रहे हैं। वर्षों के पत्रकारिता अनुभव और विभिन्न विषयों पर निरंतर लेखन के माध्यम से उन्होंने समसामयिक घटनाओं के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विषयों को भी पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया है।