लखनऊ । सोमवार, 22 जून 2026
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में नवनिर्मित ऐतिहासिक भव्य राम मंदिर एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार वजह आध्यात्मिक नहीं बल्कि इसके चढ़ावे और दान राशि के प्रबंधन से जुड़ी कानूनी लड़ाई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अयोध्या स्थित राम मंदिर में आने वाले चढ़ावे के प्रबंधन में कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच से जुड़ी एक जनहित याचिका (PIL) पर ‘आउट ऑफ टर्न’ (समय से पहले या तत्काल) सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है।
अदालत ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया है कि इस मामले में किसी भी प्रकार की न्यायिक आपात स्थिति या जल्द सुनवाई की कोई तात्कालिक आवश्यकता नहीं है।
क्या था पूरा मामला और कोर्ट का रुख?
यह याचिका एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता मोहित अशोक द्वारा दाखिल की गई थी। ग्रीष्मकालीन अवकाश पीठ (Vacation Bench) के माननीय न्यायमूर्ति पंकज भाटिया और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय के समक्ष यह याचिका नए मामलों की सूची में सीरियल नंबर 392 पर दर्ज थी।
अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए अपनी मौखिक टिप्पणी में दो बेहद महत्वपूर्ण बातें कहीं:
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अदालतों पर मामलों का भारी बोझ: कोर्ट में पहले से ही भारी संख्या में अत्यंत महत्वपूर्ण और पुराने मामले लंबित हैं, जिसके चलते इस याचिका को प्राथमिकता नहीं दी जा सकती।
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शासन स्तर पर पहले से कार्रवाई: उत्तर प्रदेश सरकार इस पूरे मामले पर पहले ही संज्ञान ले चुकी है और आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाए जा चुके हैं। इसलिए, इस मोड़ पर अदालत के तत्काल हस्तक्षेप की कोई प्रासंगिकता नहीं बनती।
याचिकाकर्ता की प्रमुख मांगें क्या थीं?
याचिकाकर्ता मोहित अशोक ने राम मंदिर ट्रस्ट (Shri Ram Janmabhoomi Teerth Kshetra) द्वारा चढ़ावे और धन राशि के मैनेजमेंट में पूरी पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए अदालत से गुहार लगाई थी। याचिका में निम्नलिखित मुख्य मांगें शामिल थीं:
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स्वतंत्र जांच (Independent Probe): मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए जा रहे दान में कथित गबन, वित्तीय विसंगतियों और कैश हैंडलिंग में गड़बड़ियों की एक स्वतंत्र या केंद्रीय एजेंसी से समयबद्ध जांच कराई जाए।
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CAG ऑडिट: भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (Comptroller and Auditor General of India – CAG) से मंदिर के संपूर्ण चढ़ावे और वित्तीय लेन-देन का एक व्यापक फॉरेंसिक ऑडिट करवाया जाए।
13 जून को ही गठित हो चुकी है SIT: कहां तक पहुंची जांच?
धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में इस मुद्दे के गर्माने और विपक्षी दलों के हमलों के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बेहद संवेदनशील रुख अपनाते हुए 13 जून को ही एक उच्च स्तरीय विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर दिया था। यह कदम स्वयं राम मंदिर ट्रस्ट के अनुरोध के बाद पारदर्शिता को बनाए रखने के लिए उठाया गया था।
SIT की टीम में कौन-कौन शामिल हैं?
इस तीन सदस्यीय हाई-प्रोफाइल टीम की कमान प्रशासनिक और वित्तीय विशेषज्ञों के हाथों में दी गई है:
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अध्यक्ष: विजय विश्वास पंत (डिविजनल कमिश्नर, लखनऊ)
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सदस्य: किरण एस (पुलिस महानिरीक्षक – IG)
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सदस्य: नील रतन (विशेष सचिव, वित्त विभाग)
जांच की वर्तमान स्थिति और चुनौतियां
ताजा इनपुट्स के अनुसार, एसआईटी (SIT) ने अयोध्या में अपनी प्राथमिक जांच प्रक्रिया को लगभग पूरा कर लिया है। टीम ने मंदिर प्रबंधन, ट्रस्ट के पदाधिकारियों, बैंक अधिकारियों और परिसर के कई कर्मचारियों के विस्तृत बयान दर्ज किए हैं। इसके साथ ही मंदिर परिसर का भौतिक मुआयना कर वित्तीय दस्तावेजों को भी खंगाला गया है।
हालांकि, जांच के दौरान तकनीकी मोर्चे पर कुछ बड़ी चुनौतियां भी सामने आई हैं:
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सीटीटीवी फुटेज की समय सीमा: मंदिर में स्थापित सीसीटीवी कैमरों का बैकअप डेटा केवल 45 दिनों तक ही स्वतः सुरक्षित रहता है, जिसके बाद वह ऑटो-डिलीट हो जाता है।
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फॉरेंसिक रिकवरी की कोशिशें: जांच टीम डेटा टेंपरिंग (फुटेज से छेड़छाड़) की संभावनाओं और पुराने डिलीट हो चुके डेटा को रिकवर करने के लिए साइबर और डिजिटल फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स की मदद ले रही है।
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ट्रस्टियों को निर्देश: एसआईटी ने जांच पूरी होने और अंतिम रिपोर्ट सौंपे जाने तक ट्रस्ट से जुड़े प्रमुख अधिकारियों को बिना अनुमति अयोध्या न छोड़ने की मौखिक हिदायत दी है। दैनिक प्रगति रिपोर्ट लगातार मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) को भेजी जा रही है, और अंतिम विस्तृत रिपोर्ट किसी भी समय उत्तर प्रदेश सरकार को सौंपी जा सकती है।
राजनीतिक विवाद और प्रशासनिक सुधारों की सुगबुगाहट
इस कथित वित्तीय गड़बड़ी के मुद्दे पर आम आदमी पार्टी (AAP) और समाजवादी पार्टी (SP) जैसी प्रमुख विपक्षी पार्टियों ने सरकार को आड़े हाथों लिया है। विपक्ष का सवाल है कि यदि अरबों रुपये के गबन और आभूषणों के गायब होने के आरोप लग रहे हैं, तो अभी तक औपचारिक रूप से पुलिस प्राथमिकी (FIR) दर्ज क्यों नहीं की गई है? वहीं, कुछ वरिष्ठ संतों और नेताओं ने मांग उठाई है कि शंकराचार्यों और शीर्ष धार्मिक गुरुओं का एक सम्मेलन बुलाकर मंदिर प्रशासन के लिए एक पारदर्शी और स्वायत्त ढांचा तैयार किया जाना चाहिए।
अदालत द्वारा याचिका पर जल्द सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद अब सबकी निगाहें कमिश्नर विजय विश्वास पंत की अगुवाई वाली एसआईटी (SIT) की उस फाइनल रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो इस विवाद की पूरी सच्चाई को सामने लाएगी।
Matribhumisamachar


