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कानूनी सहायता सिर्फ रस्म नहीं, आरोपी को प्रभावी पैरवी का अधिकार मिलना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

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सुप्रीम कोर्ट का कानूनी सहायता और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार पर ऐतिहासिक फैसला।

नई दिल्ली । शनिवार, 23 मई 2026

भारतीय न्याय व्यवस्था में हर नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। इसी अधिकार को और मजबूती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा की पीठ ने स्पष्ट कहा कि किसी आरोपी को कानूनी सहायता (Legal Aid) देना सिर्फ एक रस्म या नाममात्र की औपचारिकता बनकर नहीं रह जाना चाहिए। यह एक ठोस और सार्थक प्रयास होना चाहिए, जो वकील की प्रभावी मदद सुनिश्चित करे।

अदालत ने जोर देकर कहा कि जल्दबाजी में न्याय देने के चक्कर में किसी भी आरोपी के मौलिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला 74 वर्षीय बुजुर्ग नंदकिशोर मिश्रा से जुड़ा है, जिन्हें एक निचली अदालत ने हत्या के अपराध के लिए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उन्होंने इस फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।

हाई कोर्ट ने मामले की त्वरित सुनवाई करते हुए आरोपी की अनुपस्थिति में उसकी पैरवी के लिए एक न्याय मित्र (Amicus Curiae) नियुक्त किया। न्याय मित्र की नियुक्ति 20 नवंबर 2025 को की गई थी और इसके मात्र 6 दिन बाद यानी 26 नवंबर 2025 को हाई कोर्ट ने अपील का निपटारा करते हुए अपना फैसला सुना दिया।

हाई कोर्ट की जल्दबाजी पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने पाया कि हाई कोर्ट ने अपील को तेजी से निपटाने की जल्दबाजी में प्रक्रियात्मक निष्पक्षता को नजरअंदाज कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें रेखांकित कीं:

  • आरोपी को सूचना न देना: हाई कोर्ट ने अपीलकर्ता (आरोपी) को यह सूचित करने का प्रयास भी नहीं किया कि उसकी ओर से कोई वकील न होने के कारण एक न्याय मित्र नियुक्त किया गया है।

  • बातचीत का अवसर न मिलना: रिकॉर्ड से ऐसा कहीं नहीं प्रतीत होता कि नियुक्त किए गए न्याय मित्र को जेल में बंद आरोपी से बातचीत करने या उसका पक्ष समझने का कोई अवसर मिला।

  • जेल में बंद आरोपी की स्थिति: अदालत ने कहा कि जब आरोपी लगातार जेल में बंद हो, तो उसे सुनवाई और प्रतिनिधित्व की व्यवस्था के बारे में औपचारिक नोटिस जारी करना न्याय के उद्देश्यों के लिए अनिवार्य हो जाता है।

“यद्यपि न्याय मित्र नियुक्त करने के हाई कोर्ट के नेक इरादे पर कोई संदेह नहीं है, लेकिन इस व्यवस्था के बारे में आरोपी को सूचित करना एक समझदारी भरा और बेहतर कदम होता।”

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश: नए सिरे से होगी सुनवाई

सर्वोच्च न्यायालय ने हाई कोर्ट द्वारा 26 नवंबर 2025 को दिए गए फैसले को पूरी तरह से रद्द (Set Aside) कर दिया है। इस आदेश के बाद नंदकिशोर मिश्रा की याचिका हाई कोर्ट की फाइल पर दोबारा जीवित हो गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेजते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए हैं:

  1. इस फैसले के 2 महीने के भीतर मामले को सुनवाई के लिए दोबारा लिस्ट किया जाए।

  2. बेहतर होगा कि उपलब्धता के आधार पर उसी डिवीजन बेंच को यह जिम्मेदारी सौंपी जाए, जिसने पहले फैसला सुनाया था। यदि यह व्यावहारिक न हो, तो मुख्य न्यायाधीश ऐसी बेंच का गठन करें जिसमें कम से कम एक पुराना जज शामिल हो।

  3. यदि आरोपी अपने खुद के वकील के माध्यम से प्रतिनिधित्व करना चाहता है और तय तारीख पर उसका वकील उपस्थित होता है, तो दोबारा किसी न्याय मित्र को नियुक्त करने की आवश्यकता नहीं होगी।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश की आपराधिक न्याय प्रणाली (Criminal Justice System) के लिए एक नजीर है। यह याद दिलाता है कि ‘त्वरित न्याय’ (Speedy Justice) का स्वागत है, लेकिन इसकी कीमत ‘निष्पक्ष न्याय’ (Fair Justice) देकर नहीं चुकाई जा सकती। जेल में बंद अंतिम व्यक्ति तक प्रभावी कानूनी सहायता पहुंचाना और उसे अपनी बात रखने का पूरा मौका देना ही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है।

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