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बंगाल में ‘अराजकता’ बर्दाश्त नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को फटकारा, ED अधिकारियों के अधिकारों पर उठाए बड़े सवाल

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल की फाइल फोटो।

नई दिल्ली | मंगलवार, 24 मार्च 2026

सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार (24 मार्च 2026) को पश्चिम बंगाल सरकार और प्रवर्तन निदेशालय (ED) के बीच चल रहे कानूनी युद्ध पर अहम सुनवाई हुई। यह मामला जनवरी 2026 में कोलकाता स्थित I-PAC (इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी) के दफ्तरों पर हुई छापेमारी से जुड़ा है। ED का आरोप है कि जब वे कोयला तस्करी मामले में $₹2,742$ करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग की जांच कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने कथित तौर पर परिसर में घुसकर जांच में बाधा डाली और महत्वपूर्ण डिजिटल साक्ष्य व फाइलें अपने कब्जे में ले लीं।

सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियाँ

जस्टिस पी.के. मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने सुनवाई के दौरान बेहद सख्त रुख अपनाया। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार से पूछा:

“अगर कोई मुख्यमंत्री खुद रेड वाली जगह पर पहुंच जाए और जांच में दखल दे, तो क्या ED अधिकारियों को केवल ‘मूकदर्शक’ बनकर देखते रहना चाहिए? क्या ED अधिकारी भारत के नागरिक नहीं हैं जिनके मौलिक अधिकारों की रक्षा की जानी चाहिए?”

अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि यदि राज्यों में अलग राजनीतिक दल की सरकारें इसी तरह केंद्रीय एजेंसियों के काम को रोकेंगी, तो देश में कानून का शासन (Rule of Law) समाप्त हो जाएगा और ‘अराजकता’ की स्थिति पैदा हो जाएगी।

ममता सरकार और कपिल सिब्बल की दलीलें

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और श्याम दीवान ने याचिका की विचारणीयता (Maintainability) पर सवाल उठाए। उनकी मुख्य दलीलें थीं:

  1. अनुच्छेद 32 का दुरुपयोग: सिब्बल ने तर्क दिया कि ED एक सरकारी विभाग है, कोई ‘व्यक्ति’ या ‘नागरिक’ नहीं, इसलिए वह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर सीधे सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32) नहीं आ सकता।

  2. पुलिस का विकल्प: राज्य सरकार का कहना है कि अगर कोई बाधा थी, तो ED को स्थानीय पुलिस में शिकायत करनी चाहिए थी, न कि सुप्रीम कोर्ट।

  3. संघीय ढांचा: बचाव पक्ष ने कहा कि केंद्रीय एजेंसियों को इस तरह की छूट देना संघीय ढांचे के लिए “खतरनाक मिसाल” होगा।

I-PAC रेड और ‘साक्ष्यों की चोरी’ का आरोप

ED ने अपनी याचिका में सनसनीखेज आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने छापेमारी के दौरान परिसर से लैपटॉप और फोन जैसे उपकरण हटवा दिए। ED ने इस मामले की जांच CBI से कराने और मुख्यमंत्री व पुलिस महानिदेशक (DGP) के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की है। इससे पहले 15 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल पुलिस द्वारा ED अधिकारियों के खिलाफ दर्ज की गई जवाबी FIR पर रोक लगा दी थी।

अगला कदम और भविष्य की सुनवाई

अदालत ने स्पष्ट किया कि वह किसी राजनीतिक विवाद में नहीं पड़ना चाहती, लेकिन संवैधानिक उपचारों के शून्य (Legal Vacuum) को भी स्वीकार नहीं कर सकती। बेंच ने कहा कि सरकारी अधिकारियों के पास भी व्यक्तिगत हैसियत से याचिका दायर करने का अधिकार है।

अगली सुनवाई: मामले की अगली विस्तृत सुनवाई अप्रैल 2026 के पहले सप्ताह में तय की गई है।

मुख्य बिंदु:

  • सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- क्या ड्यूटी के दौरान ED अधिकारियों के नागरिक अधिकार खत्म हो जाते हैं?

  • ममता बनर्जी पर I-PAC दफ्तर में छापेमारी के दौरान ‘हस्तक्षेप’ और सबूत ले जाने का आरोप।

  • कोर्ट ने कहा- “राज्य और केंद्र में अलग सरकार होने पर ऐसी स्थिति ‘अराजकता’ पैदा कर सकती है।”

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