वाशिंगटन. अमेरिकी सरकार ने भारतीय सौर ऊर्जा क्षेत्र को एक बड़ा झटका देते हुए भारत से आयातित सौर उत्पादों पर 125.87% तक का प्रारंभिक प्रतिकारी शुल्क (CVD) लगाने की घोषणा की है। अमेरिकी प्रशासन का आरोप है कि भारत अपने सौर निर्माताओं को ‘अनुचित सब्सिडी’ प्रदान कर रहा है, जिससे अमेरिकी घरेलू उद्योगों को नुकसान हो रहा है।
प्रमुख बिंदु: एक नज़र में
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प्रभावित उत्पाद: क्रिस्टलाइन सिलिकॉन फोटोवोल्टिक सेल और मॉड्यूल।
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अन्य देश भी लपेटे में: भारत के साथ-साथ इंडोनेशिया और लाओस से आने वाले सौर उत्पादों पर भी भारी शुल्क लगाया गया है।
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अतिरिक्त बोझ: यह नया शुल्क पहले से लागू 10% सामान्य आयात शुल्क के अतिरिक्त होगा।
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अंतिम फैसला: शुल्क की जांच प्रक्रिया जारी रहेगी और अंतिम निर्णय 6 जुलाई 2026 को आने की उम्मीद है।
निर्यात में भारी उछाल बनी वजह
अमेरिकी वाणिज्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, भारत से अमेरिका को होने वाले सौर उत्पादों के निर्यात में पिछले दो वर्षों में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है। वर्ष 2022 में जहां निर्यात महज 8.38 करोड़ डॉलर था, वहीं वर्ष 2024 में यह बढ़कर 79.26 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस तेज वृद्धि के पीछे भारी सरकारी सब्सिडी का हाथ है।
दोहरी जांच का सामना
प्रतिकारी शुल्क (CVD) के अलावा, अमेरिकी वाणिज्य विभाग भारत के खिलाफ डंपिंग रोधी (Anti-Dumping) जांच भी कर रहा है। यदि इस जांच में भी भारत के खिलाफ फैसला आता है, तो निर्यात लागत और भी अधिक बढ़ सकती है।
भारतीय कंपनियों पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से भारतीय सौर कंपनियों (जैसे Waaree, Adani Solar, Premier Energies) की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता लगभग खत्म हो सकती है। 100% से अधिक शुल्क लगने के बाद भारतीय सौर मॉड्यूल अमेरिकी ग्राहकों के लिए काफी महंगे हो जाएंगे।
“यह कदम भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़ा अवरोध है। हालांकि, इससे भारतीय कंपनियों को अमेरिका के भीतर ही अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने या अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।”
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