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ट्रंप का प्रस्ताव और पाकिस्तान का ‘नो’: क्या अब्राहम अकॉर्ड्स को ठुकराकर शहबाज सरकार ने मोल ली बड़ी मुसीबत?

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इस्लामाबाद । मंगलवार, 26 मई 2026

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से वैश्विक राजनीति में एक बार फिर ‘अब्राहम अकॉर्ड्स’ (Abraham Accords) का दांव खेला गया है। इस बार ट्रंप ने पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और कतर जैसे प्रमुख मुस्लिम देशों को इस समझौते में शामिल होने और इजरायल के साथ आधिकारिक राजनयिक रिश्ते कायम करने का सीधा प्रस्ताव दिया है। हालांकि, पिछले कुछ महीनों से ट्रंप प्रशासन की हर नीति पर खुलकर हामी भरने वाले पाकिस्तान के पैर यहाँ आकर डगमगा गए हैं।

शहबाज शरीफ सरकार के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक कड़ा रुख अपनाते हुए ट्रंप के इस प्रस्ताव को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। पाकिस्तान का मानना है कि ट्रंप को खुश करने के चक्कर में वह अपने ही देश में एक बड़ा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक संकट खड़ा नहीं करना चाहता।

वैचारिक समझौता किसी भी हाल में मंजूर नहीं: ख्वाजा आसिफ

पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक टीवी इंटरव्यू में खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान किसी भी कीमत पर इजरायल के साथ जाने का विकल्प नहीं चुन सकता।

“यह हमारी मूल विचारधारा और बुनियादी सिद्धांतों से समझौता करने जैसा होगा, जो देश को किसी भी हाल में मंजूर नहीं है। आप उन लोगों (इजरायलियों) के साथ टेबल पर कैसे बैठ सकते हैं, जिनकी बातों पर एक दिन के लिए भी भरोसा नहीं किया जा सकता?”

ख्वाजा आसिफ, रक्षा मंत्री (पाकिस्तान)

आसिफ ने इस बात पर भी जोर दिया कि इजरायल को लेकर पाकिस्तान का नजरिया आज का नहीं बल्कि पिछले आठ दशकों से बेहद मजबूत रहा है। उन्होंने याद दिलाया कि पाकिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जिसके पासपोर्ट पर विशेष रूप से अंकित है कि यह दस्तावेज़ ‘इजरायल को छोड़कर’ दुनिया के सभी देशों की यात्रा के लिए वैध है।

तथ्यों की कड़वी सच्चाई: क्या है कजाकिस्तान का सच?

यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य की शुद्धि (Correction) आवश्यक है। अक्सर सोशल मीडिया या शुरुआती मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा कर दिया जाता है कि मध्य एशियाई देश कजाकिस्तान भी अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा है। लेकिन हकीकत यह है कि कजाकिस्तान ने इस समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।

अब्राहम समझौते का वास्तविक दायरा और इसकी टाइमलाइन नीचे दी गई तालिका से समझी जा सकती है:

देश का नाम समझौता वर्ष वर्तमान स्थिति
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सितंबर, 2020 सबसे पहले हस्ताक्षर करने वाला देश
बहरीन सितंबर, 2020 यूएई के साथ ही समझौते में शामिल हुआ
सूडान अक्टूबर, 2020 समझौते का हिस्सा बनने पर सहमति जताई
मोरक्को दिसंबर, 2020 पूर्ण राजनयिक संबंध बहाल किए

कजाकिस्तान के बजाय सूडान और मोरक्को ही वे देश हैं जिन्होंने इस ऐतिहासिक समझौते के तहत इजरायल को मान्यता दी थी।

जिन्ना का वो फैसला, जो आज भी पाकिस्तान के गले की फांस है

पाकिस्तान का इजरायल को मान्यता न देने का इतिहास साल 1947-48 से जुड़ा है। पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने उस वक्त फिलिस्तीन के विभाजन को सिरे से खारिज कर दिया था। तब से लेकर आज तक कोई भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति इस नीति को बदलने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है।

वर्तमान विदेश मंत्री इशाक डार ने भी कुछ समय पहले स्पष्ट किया था कि जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिलिस्तीन के लिए ‘दो-राष्ट्र समाधान’ (Two-State Solution) को पूरी तरह स्वीकार नहीं कर लिया जाता, तब तक पाकिस्तान इजरायल की तरफ दोस्ती का हाथ नहीं बढ़ाएगा।

डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति और ईरान का एंगल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का मुख्य उद्देश्य इस समझौते के जरिए मिडिल ईस्ट में ईरान को अलग-थलग करना और इजरायल के सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना है। ट्रंप ने मुस्लिम देशों के नेताओं से अपील की है कि अगर वे क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता चाहते हैं, तो उन्हें ईरान के प्रभाव को कम करने के लिए अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनना ही होगा।

अब देखना यह होगा कि ट्रंप के इस ड्रीम प्रोजेक्ट को ‘ना’ कहने के बाद, आर्थिक तंगहाली से जूझ रहे पाकिस्तान को आने वाले दिनों में अमेरिका की तरफ से किसी बड़े प्रतिबंध या नाराजगी का सामना करना पड़ता है या नहीं।

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