गुवाहाटी । बुधवार, 27 मई 2026
असम ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए बुधवार को अपनी विधानसभा में ‘असम समान नागरिक संहिता, 2026 विधेयक’ को पारित कर दिया है। इसके साथ ही असम देश का ऐसा तीसरा राज्य बन गया है जिसने स्वतंत्रता के बाद अपने सदन में यूसीसी (UCC) कानून पारित किया है। सोमवार को सदन में पेश किए गए इस विधेयक पर पूरे दिन चली तीखी बहस और विपक्ष के भारी हंगामे के बाद इसे ध्वनिमत (Voice Vote) से मंजूरी दे दी गई।
यह कानून किसी भी धर्म या समुदाय से परे, राज्य के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति के उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे संवेदनशील मामलों में एक समान कानूनी ढांचा तैयार करता है।
असम यूसीसी विधेयक 2026 के मुख्य प्रावधान और कड़े नियम
असम की विशिष्ट जनसांख्यिकीय और सामाजिक संरचना को ध्यान में रखते हुए इस विधेयक में कई कड़े कानूनी प्रावधान किए गए हैं:
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बहुविवाह और द्विविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध: राज्य में अब कोई भी व्यक्ति एक से अधिक विवाह नहीं कर सकेगा। यदि कोई इस नियम का उल्लंघन करता है, तो भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 के तहत 7 साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि, कानून लागू होने से पहले हो चुकीं बहुविवाहित शादियों को इस दायरे से बाहर (सुरक्षित) रखा गया है।
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लिव-इन रिलेशनशिप का अनिवार्य पंजीकरण: यदि कोई जोड़ा लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा है, तो उन्हें 30 दिनों के भीतर इसका पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा। पंजीकरण न कराने की स्थिति में 3 महीने तक की जेल की सजा हो सकती है।
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बच्चों और पार्टनर्स को कानूनी सुरक्षा: लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा होने वाले बच्चों को पूरी तरह से वैध माना जाएगा और उन्हें संपत्ति में समान अधिकार मिलेंगे। इसके अलावा, यदि कोई पार्टनर लिव-इन में धोखा देता है या छोड़ देता है, तो पीड़ित पार्टनर को गुजारा भत्ता (Maintenance) मांगने का पूरा कानूनी अधिकार होगा।
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विवाह और तलाक का पंजीकरण: विवाह और तलाक की औपचारिकता पूरी होने के 60 दिनों के भीतर सब-रजिस्ट्रार के पास इसका विवरण (Memorandum) जमा करना अनिवार्य होगा।
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बेटियों को संपत्ति में समान अधिकार: उत्तराधिकार के मामले में लिंग-भेदभाव को समाप्त करते हुए क्लास-1 उत्तराधिकारियों (पत्नी, बच्चों और माता-पिता) में बेटियों को भी बेटों के बराबर संपत्ति का कानूनी हकदार बनाया गया है।
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विवाह की कानूनी आयु: दूल्हे के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष और दुल्हन के लिए 18 वर्ष तय की गई है। बाल विवाह या धोखाधड़ी से किए गए विवाह पर सख्त कानूनी कार्रवाई होगी।
अनुसूचित जनजातियों (ST) को मिली विशेष छूट
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने सदन में स्पष्ट किया कि यह कानून असम के अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय पर लागू नहीं होगा। उन्होंने इसके पीछे का तर्क देते हुए कहा:
“हमारे आदिवासी भाई-बहन सदियों से अपने पारंपरिक और प्रथागत कानूनों का पालन कर रहे हैं। वे स्वभाव से ही बहुविवाह का समर्थन नहीं करते, बेटियों को समान अधिकार देते हैं और लिव-इन जैसे संबंधों को मान्यता नहीं देते। वे एक तरह से सदियों से स्व-नियमन (Self-regulation) के जरिए यूसीसी का ही पालन कर रहे हैं। इसलिए हम उनकी सांस्कृतिक विविधता और संवैधानिक सुरक्षा में कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहते।”
विपक्षी दलों का विरोध और ध्वनिमत से पारित होना
विधेयक पर चर्चा के दौरान विपक्षी दलों ने मांग रखी थी कि इस मसौदे पर जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय इसे और अधिक जन-परामर्श तथा विस्तृत समीक्षा के लिए विधानसभा की चयन समिति (Select Committee) के पास भेजा जाना चाहिए।
हालांकि, विधानसभा अध्यक्ष रंजीत कुमार दास ने विपक्ष की इस मांग को खारिज कर दिया। इसके बाद विपक्षी सदस्यों ने सदन के वेल (बीचों-बीच) में आकर नारेबाजी और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। भारी शोर-शराबे और विपक्ष के वॉकआउट के बीच, सत्तापक्ष के ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्रीराम’ के नारों के साथ अध्यक्ष ने विधेयक को ध्वनिमत से पारित करने की घोषणा की।
देश में यूसीसी की वर्तमान स्थिति: असम बना तीसरा राज्य
स्वतंत्रता के बाद समान नागरिक संहिता विधेयक पारित करने वाला असम देश का तीसरा राज्य बन गया है।
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उत्तराखंड: यह देश का पहला राज्य था जिसने 2024 में इसे पारित किया और जनवरी 2025 में इसे पूरी तरह लागू किया। इस वर्ष (जनवरी 2026 में) उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इसके सफल क्रियान्वयन का एक वर्ष पूरा होने पर इसकी सराहना की। वहां अब तक लगभग 4.74 लाख से अधिक शादियां ऑनलाइन माध्यम से सुरक्षित रूप से पंजीकृत हो चुकी हैं।
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गुजरात: गुजरात विधानसभा ने भी इसी वर्ष मार्च 2026 में महिलाओं को कानूनी सुरक्षा और समानता देने के उद्देश्य से अपना यूसीसी विधेयक पारित किया है।
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असम: मई 2026 में विधेयक पारित कर तीसरा राज्य बना।
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