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केरल की राजनीति में ऐतिहासिक मोड़: मात्र 3 विधायकों के बावजूद BJP लड़ेगी विधानसभा स्पीकर का चुनाव, मुकाबले को बनाया त्रिकोणीय

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तिरुवनंतपुरम । शुक्रवार, 21 मई 2026

केरल के संसदीय इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने राज्य की पारंपरिक राजनीति की दीवारों को तोड़ते हुए आगामी विधानसभा स्पीकर पद के चुनाव में अपना उम्मीदवार उतारने का ऐतिहासिक निर्णय लिया है। हाल ही में संपन्न हुए केरल विधानसभा चुनाव 2026 में वापसी करने वाली भाजपा के पास सदन में केवल तीन विधायक हैं। इसके बावजूद पार्टी ने इस चुनाव को महज एक औपचारिकता न रहने देकर इसे त्रिकोणीय और बेहद दिलचस्प बना दिया है।

भाजपा के इस कदम ने न केवल सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) बल्कि मुख्य विपक्षी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के खेमे में भी खलबली मचा दी है।

चथन्नूर विधायक बी.बी. गोपाकुमार बने उम्मीदवार

केरल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि चथन्नूर विधानसभा सीट से नवनिर्वाचित विधायक बी.बी. गोपाकुमार स्पीकर पद के लिए भाजपा के आधिकारिक उम्मीदवार होंगे। केरल के राजनीतिक इतिहास में यह पहली बार है जब भाजपा विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) पद के चुनाव में सीधे तौर पर भागीदारी दर्ज करा रही है।

विधानसभा के समीकरणों के अनुसार, बी.बी. गोपाकुमार के नाम का प्रस्ताव स्वयं प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर और विधायक दल के नेता वी. मुरलीधरन मिलकर करेंगे।

संख्या बल कम, मगर इरादे मजबूत

सदन के भीतर गणित पूरी तरह भाजपा के खिलाफ है, लेकिन पार्टी नेतृत्व का मानना है कि लोकतंत्र में संख्या से ज्यादा सिद्धांत और सक्रिय भागीदारी मायने रखती है। गुरुवार को सदन में विधायक के रूप में शपथ लेने से पहले भाजपा के तीनों विधायकों ने तिरुवनंतपुरम के पलायम शहीद स्मारक जाकर देश के अमर शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

राजीव चंद्रशेखर ने स्पष्ट शब्दों में कहा:

“भले ही सदन में हमारी संख्या केवल तीन हो, लेकिन हम केरल की जनता की आवाज को पूरी ताकत के साथ उठाएंगे। अब तक केरल में एलडीएफ और यूडीएफ के बीच फिक्सिंग की राजनीति चलती थी, लेकिन अब भाजपा विधानसभा में एक मजबूत और वास्तविक विपक्ष की भूमिका निभाकर बदलाव की राजनीति की शुरुआत करेगी।”

क्यों अहम है भाजपा की यह ‘प्रतीकात्मक’ लड़ाई?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा का यह कदम सिर्फ एक चुनाव लड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुदूर दक्षिण के इस राज्य में अपनी जड़ों को और गहरा करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

  1. द्विध्रुवीय राजनीति को चुनौती: केरल में लंबे समय से सत्ता की चाबी वामपंथियों (LDF) और कांग्रेस गठबंधन (UDF) के बीच ही घूमती रही है। भाजपा खुद को राज्य के मतदाताओं के सामने एक सशक्त और ‘तीसरे मजबूत विकल्प’ के रूप में स्थापित करना चाहती है।

  2. सदन में आक्रामक शुरुआत: सत्र के पहले ही दिन स्पीकर चुनाव में उतरकर भाजपा ने यह साफ कर दिया है कि वे आने वाले पांच सालों तक सदन की कार्यवाही में मूकदर्शक बनकर नहीं बैठेंगे।

  3. नेताओं का मजबूत प्रोफाइल: इस बार सदन में पहुंचे तीनों ही विधायक (राजीव चंद्रशेखर, वी. मुरलीधरन और बी.बी. गोपाकुमार) राष्ट्रीय व प्रांतीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक अनुभव रखते हैं, जिससे विपक्ष को उन्हें नजरअंदाज करना नामुमकिन होगा।

मुकाबला हुआ त्रिकोणीय

शुक्रवार को होने वाले इस चुनाव को लेकर राज्य का सियासी तापमान बढ़ गया है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ (UDF) ने पहले ही अपने वरिष्ठ और अनुभवी नेता थिरुवनचूर राधाकृष्णन को मैदान में उतारा है, वहीं एलडीएफ (LDF) भी अपना उम्मीदवार खड़ा कर चुका है। अब भाजपा के इस कदम के बाद मुकाबला दोतरफा न रहकर त्रिकोणीय हो चुका है। पूरा राज्य अब शुक्रवार को होने वाली वोटिंग और सदन के भीतर के इस ऐतिहासिक दृश्य पर नजरें टिकाए हुए है।

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