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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: ‘निजी मंदिरों के प्रबंधन में सरकार का कोई दखल नहीं, देवता ही संपत्ति के असली मालिक’

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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट जबलपुर का मुख्य भवन

भोपाल | गुरुवार, 21 मई 2026

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार्मिक संपत्तियों और उनके प्रबंधन को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कानूनी व्यवस्था दी है। कोर्ट ने अपने एक आदेश में पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी निजी मंदिर (Private Temple) या उससे जुड़ी संपत्तियों के प्रबंधन में सरकार की कोई भूमिका नहीं है।

अदालत ने साफ किया कि निजी मंदिर से जुड़ी भूमि के राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में किसी जिला कलेक्टर या पुजारी का नाम प्रबंधक या ट्रस्टी के रूप में दर्ज करने की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसी तमाम संपत्तियां कानूनी रूप से सिर्फ और सिर्फ वहां स्थापित देवता (Deity) के नाम पर ही दर्ज की जानी चाहिए।

⚖️ ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ (Next Friend) के रूप में कोई भी लड़ सकता है मुकदमा

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में देवता के कानूनी अधिकारों को मजबूती देते हुए एक बड़ी व्यवस्था दी है। कोर्ट के अनुसार:

“यदि किसी निजी मंदिर या उससे जुड़ी संपत्ति का दुरुपयोग या नुकसान होता है, तो उस मंदिर या देवता में रुचि रखने वाला कोई भी व्यक्ति—चाहे वह श्रद्धालु हो या नहीं—देवता की ओर से ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ (अगला मित्र) के रूप में अदालत में मुकदमा दायर कर सकता है।”

चूंकि कानून की नजर में मूर्ति या देवता को एक ‘विधिक इकाई’ (Juristic Person) माना जाता है, इसलिए उनके हितों की रक्षा के लिए किसी भी नागरिक को ‘नेक्स्ट फ्रेंड’ बनने का अधिकार है।

📑 क्या था पूरा मामला? (सिवनी जिला विवाद)

यह आदेश हाई कोर्ट ने सिवनी जिले के डूंडा सिवनी गांव स्थित एक ऐतिहासिक शिव मंदिर के सर्वराहकार (Caretaker) सुमरन की याचिका पर सुनवाई करते हुए जारी किया।

  • चार पीढ़ियों का इतिहास: याचिकाकर्ता के परिवार द्वारा पिछले चार पीढ़ियों से इस मंदिर की देखरेख की जा रही थी। इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1913 में स्वर्गीय भवानी पटेल ने करवाया था और इसके रखरखाव व पुजारी के खर्च के लिए लगभग 14 एकड़ भूमि छोड़ी गई थी।

  • विवाद की वजह: गांव के कुछ लोगों की शिकायत पर लोक न्यास रजिस्ट्रार (Registrar of Public Trust) ने मंदिर के प्रबंधन के लिए पांच सदस्यीय समिति का गठन कर दिया था, जिसमें दो सरकारी कर्मचारी भी शामिल थे। याचिकाकर्ता ने सरकार के इस कदम को कोर्ट में चुनौती दी थी।

  • सरकार का तर्क: राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जांच में मंदिर लगभग 200 वर्ष पुराना पाया गया है और उसे तुरंत मरम्मत (Renovation) की आवश्यकता है, इसलिए यह समिति बनाई गई।

❌ कलेक्टर हर मंदिर के प्रबंधक नहीं: हाई कोर्ट

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सरकार के प्रबंधन समिति वाले आदेश को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब तक कोई मंदिर पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण या सरकारी सूची में न हो, तब तक कलेक्टर को उसका प्रबंधक नहीं माना जा सकता।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध फैसले ‘स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश बनाम पुजारी उत्थान एवं कल्याण समिति’ का हवाला देते हुए दो टूक कहा:

  1. मंदिर में स्थापित देवता ही संपत्ति के वास्तविक और अंतिम स्वामी होते हैं।

  2. पुजारी का काम केवल पूजा-अर्चना करना और संपत्ति की देखरेख (Care-taking) करना है, वह मालिक नहीं है।

  3. यदि किसी निजी मकान या निजी जमीन पर देवता स्थापित हैं, तो उस मंदिर की देखभाल करने वाले पारंपरिक व्यक्ति को ही प्रबंधन में हमेशा प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

📋 मुख्य सचिव को निर्देश: सभी कलेक्टरों के लिए लागू होगी गाइडलाइन

हाई कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव (Chief Secretary) को निर्देशित किया है कि वे सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के इन दिशा-निर्देशों के अनुरूप राज्य के सभी जिला कलेक्टरों को एक स्पष्ट सर्कुलर जारी करें।

अब से किसी भी मंदिर पर कोई सरकारी प्रबंधन योजना (Management Scheme) लागू करने से पहले कलेक्टरों को अनिवार्य रूप से और विधिसम्मत तरीके से यह जांच करनी होगी कि वह मंदिर सार्वजनिक (Public) है या निजी (Private)। सिवनी के इस विवादित मामले में भी संबंधित प्राधिकारी को 3 महीने के भीतर जांच पूरी कर मंदिर की निजी प्रकृति को सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया है।

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